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23 जनवरी 2022

असली केशव पंडित - शगुन शर्मा

प्रिय साथियों ! अप्रकाशित उपन्यासों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज आपको इस पोस्ट में हम बताने जा रहे हैं एक और अप्रकाशित उपन्यास "असली केशव पंडित" के बारे में जो कि शगुन शर्मा का है !

                असली केशव पंडित उपन्यास का विज्ञापन 

विज्ञापन के अनुसार यह उपन्यास शगुन शर्मा के एक महाविशेषांक के रूप में तुलसी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित होने वाला था। विज्ञापन में उपन्यास की कहानी का आधार दो केशव पंडित को दर्शाया गया है - एक असली केशव और दूसरा नकली केशव। साथ ही विजय, विकास और अल्फांसे के किरदार भी कहानी में उपस्थित हैं। विज्ञापन के हिसाब से अगर देखा जाए तो इस कहानी में असली केशव पंडित, विजय, विकास और अल्फांसे जैसे दिग्गजों की जबरदस्त दिमागी टक्कर नकली केशव पंडित के साथ होती है। 

अगर ये उपन्यास महाविशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ होता तो इस दिमागी टक्कर को पढ़ना शायद रोचक रहता। शायद इसलिए क्योंकि केशव पंडित का एक अच्छा और दिमागी दांव-पेंच से भरपूर उपन्यास लिखना इतना आसान नहीं है।

उपरोक्त लिखित जानकारी के अलावा हमारे पास इस उपन्यास के बारे में अन्य कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

अगर आप इस उपन्यास के बारे में कोई और जानकारी रखते हैं तो कमेंट्स के माध्यम से हमारे साथ जरूर शेयर करें।

13 नवंबर 2021

अग्निकुंड - शगुन शर्मा



प्रिय साथियों ! अप्रकाशित उपन्यासों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज आपको इस पोस्ट में हम बताने जा रहे हैं शगुन शर्मा के अब तक अप्रकाशित उपन्यास "अग्निकुंड" के बारे में ! 

                 चिंगारी उपन्यास के अंत में छपा विज्ञापन

शगुन शर्मा दिवंगत हिंदी उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा जी  के इकलौते पुत्र हैं | इनके अब तक ३० से अधिक उपन्यास तुलसी पेपर बुक्स से प्रकाशित हो चुके हैं | इनका अंतिम प्रकाशित उपन्यास चिंगारी था | 

    चिंगारी उपन्यास में छपे लेखकीय से अग्निकुंड की झलक

चिंगारी उपन्यास के अंत में आगामी उपन्यास के तौर पर अग्निकुंड का एड दिया गया था | चिंगारी उपन्यास के लेखकीय में शगुन शर्मा ने अग्निकुंड उपन्यास की एक झलक कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की थी :-
अग्निकुंड अपराध की खूंखार दुनिया में सबसे ऊंचे सिंहासन पर बैठे एक ऐसे स्वयंभू न्यायाधीश की खूनी दास्तान है, जिसकी काली अदालत मात्र एक रुपये में इन्साफ बेचने के लिए जानी जाती थी | एक रुपया खर्च करके कोई भी उसकी अदालत से इन्साफ खरीद सकता था | उसकी अदालत का एक ही उसूल था - आँख के बदले आँख और सिर के बदले सिर | उस न्यायाधीश का दावा था कि उसकी अदालत में बेगुनाह को कभी सजा नहीं मिलेगी और गुनहगार को कभी माफ़ी नहीं मिलेगी, यहां तक कि उसकी अदालत के इन्साफ से यमराज भी नहीं बच सकता था !

अग्निकुंड उपन्यास अगर प्रकाशित होता तो उपन्यास की ये झलक जहां एक तरफ पाठक के मन में उत्सुकता जगाती वहीं सहज ही एक प्रश्न भी पैदा करती कि क्या शगुन शर्मा इस उपन्यास को उतना रोचक और मनोरंजक बना पाते जितना उन्होंने लेखकीय में दावा किया था | बहरहाल अब इस प्रश्न का उत्तर तो तभी मिल पायेगा जब अग्निकुंड उपन्यास प्रकाशित होगा ! इस उपन्यास के प्रकाशित न होने का कारण अब तक अज्ञात है |

अगर आपको इस बारे में कोई जानकारी हो तो हमें कमेंट्स के माध्यम से अवगत करवा सकते हैं |