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14 मार्च 2022

तहकीकात पत्रिका - नीलम जासूस कार्यालय

पत्रिका: तहकीकात
श्रेणी: जासूसी तथा अपराध कथाएं
पेज संख्या: 150
मूल्य: 150 रुपए
प्रकाशक: नीलम जासूस कार्यालय
प्रधान संपादक: सुबोध भारतीय
संपादक: राम पुजारी
                              तहकीकात पत्रिका

साथियों! बहुत वर्ष पूर्व जासूसी पत्रिकाएं बेहद प्रचलन में हुआ करती थी। लगभग सभी लेखकों की जासूसी कहानियां, अपराध कथाएं एवं उपन्यास इन पत्रिकाओं में छपा करते थे। पाठक भी इन पत्रिकाओं को खूब चाव से पढ़ा करते थे। एक ही पत्रिका में पाठकों को अलग-अलग कहानियों और उपन्यासों का आनंद मिल जाया करता था। समय बीतने के साथ ऐसी सभी पत्रिकाएं बंद हो गई। सिर्फ गिनी-चुनी अपराध कथाओं से जुड़ी पत्रिकाएं ही अपना वर्चस्व बचा पाईं हैं परंतु उनकी बिक्री भी क्रमशः घटती जा रही है।

आज इस पोस्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी ही नई जासूसी पत्रिका 'तहकीकात' के बारे में जिसके प्रथम अंक (प्रवेशांक) को नीलम जासूस कार्यालय ने दिसंबर 2021 माह में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया है। संपादकीय परामर्शदाता के रूप में परशुराम शर्मा, वेद प्रकाश कांबोज, आबिद रिजवी, योगेश मित्तल और वीरेंद्र कुमार शर्मा जैसी अनुभवी हस्तियों ने पत्रिका में अपना योगदान दिया है।

चलिए, बात करें अब तहकीकात पत्रिका के प्रवेशांक तथा इसमें प्रस्तुत की गई लेखन सामग्री के बारे में! 
प्रवेशांक की शुरुआत सुबोध भारतीय ने "सुनहरे दौर की वापसी" नामक आलेख द्वारा की है। इसके पश्चात राम पुजारी का संपादकीय आता है। 
फिर आता है 'शुभकामना संदेश' जिसमे विभिन्न पाठकों और प्रख्यात उपन्यासकार अमित खान ने तहकीकात पत्रिका के लिए अपनी शुभकामनाएं दी हैं तथा इस पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। 
इसके बाद चार जासूसी-अपराध कथाएं पढ़ने को मिलती हैं:
1. चरित्रहीन (मौलिक कहानी अहमद यार खान द्वारा उर्दू में रचित - इश्तियाक खां द्वारा हिंदी अनुवाद)
2. हत्यारा कौन (मौलिक कहानी मलिक सफदर हयात द्वारा उर्दू में रचित - इश्तियाक खां द्वारा हिंदी अनुवाद)
3. शराबी कातिल (वेद प्रकाश कंबोज द्वारा रचित)
4. रहस्यमयी खबरी (अंग्रेजी कहानी 'ए बर्गलर्स घोस्ट' - विकास नैनवाल द्वारा हिंदी अनुवाद)
कहानियों के मध्य पुराने दिग्गज उपन्यासकार श्री वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास "चीते की आंख" की समीक्षा प्रकाशित की गई है जिसे गुरप्रीत सिंह (गुरप्रीत जी साहित्य देश, विवेकानंद पुस्तकालय बगीचा नामक दो ब्लॉग चलाते है तथा उन पर पुस्तको की समीक्षा उनके बारे में जानकारी लेखकों की जानकारी इत्यादि उपलब्ध करवाते है) ने लिखा है।

फिर आता है पत्रिका का अंतिम भाग "सत्यबोध परिशिष्ट"। परिशिष्ट में पहले लेखक रोशनलाल सुरीरवाला की लघु कहानी "चील कौवे" प्रस्तुत की गई है। 
फिर हस्तीमल हस्ती, बशीर बद्र और राजेश रेड्डी जैसे शायरों की गजलों को स्थान दिया गया हैंl। 
इसके बाद सुबोध भारतीय की कहानी "अहसान का कर्ज" आती है। 
तत्पश्चात गोविंद गुंजन का आलेख "किताबों के दिन" है जिसमे उन्होंने अपनी यादों और लोकप्रिय साहित्य की किताबों के महत्त्व के बारे में बताया है। 
फिर डा. राकेश कुमार सिंह और जितेंद्र नाथ ने पुराने हिंदी उपन्यासकार जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के दो उपन्यासों "सांझ का सूरज" और "रुक जाओ निशा" की समीक्षा प्रस्तुत की है।
पत्रिका का समापन हास्य रस से होता है। बीच-बीच में एक-दो जगहों पर व्यंग्य का पुट भी दिया गया है।

कुल मिलाकर पत्रिका मनोरंजक लगी। प्रवेशांक की दृष्टि से लेखन सामग्री में विविधता देखने को मिलती है। चार कहानियां पुरानी हैं पर रोचक हैं। वेद प्रकाश कांबोज की कहानी उनकी लेखनी की याद ताजा कर देती है। 
सत्यबोध परिशिष्ट भी बढ़िया बन पड़ा है। "चील कौवे" कहानी न सिर्फ मार्मिक है बल्कि आज भी प्रासंगिक है। 'अहसान का कर्ज़' कहानी भी अच्छी लगी।

आज के इंटरनेट के युग में भी नीलम जासूस कार्यालय ने एक नई जासूसी पत्रिका को प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। नीलम जासूस कार्यालय का यह कदम सराहना योग्य है। फिलहाल नीलम जासूस कार्यालय की योजना इसे द्विमासिक पत्रिका के तौर पर प्रकाशित करने की है। 

यहां पर मैं दो बातें बताना चाहूंगा जो पत्रिका में ठीक की जाएं तो पत्रिका और भी बेहतर हो जायेगी। 
पहली बात - पत्रिका का मूल्य 150 रुपए मुझे अधिक लगा। पत्रिका में विज्ञापनों को प्रकाशित कर और पाठकों का आधार बढ़ाकर आगामी अंकों के मूल्य को कम किया जा सकता है। इससे आर्थिक लाभ में भी बढ़ोतरी होगी।
दूसरी बात - प्रवेशांक के कागज की गुणवत्ता साधारण ही लगी। आम पत्रिका में मुख्यत जो पेज होते हैं उसकी तरह पेज नही है जिसके कारण मुझे लगता है पत्रिका का मूल्य ज्यादा लगा। आगामी अंकों में गुणवत्ता को और अच्छा किया जाना चाहिए। 

उम्मीद हैं कि तहकीकात पत्रिका के आगामी अंक और भी मनोरंजक होंगे। हमारी कामना है कि पत्रिका को पाठकों का भरपूर प्यार मिले और पत्रिका भविष्य में भरपूर सफलता प्राप्त करे। हमारी शुभकामनाएं नीलम जासूस कार्यालय के साथ हैं।

अपने विचारों से कमेंट्स के द्वारा हमें अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 7.5/10

09 अक्टूबर 2021

तहकीकात पत्रिका

कुछ समय पहले आप सभी ने हमारे ब्लॉग पर नीलम जासूस कार्यालय का साक्षात्कार पढ़ा था। जिन्होंने ये साक्षात्कार नही पढ़ा वो इसे यहां से पढ़ सकते हैं। नीलम जासूस कार्यालय साक्षात्कार



जैसा कि उस समय नीलम जासूस कार्यालय ने आपने साक्षात्कार में कहा था कि भविष्य में वह नए लेखकों को भी मौका देंगे, तो अब काफी सारे नए लेखकों के पास मौका है अपनी कहानी प्रकाशित करवाने का।

अब नीलम जासूस कार्यालय ने एक नई द्विमासिक पत्रिका शुरू की है। कोई भी नए और पुराने लेखक अपनी रचनाएं इस पत्रिका में प्रकाशित करवाने के लिए उन्हे भेज सकते हैं । 

आपकी रचना निम्नलिखित मापदंडो के अनुसार होनी चाहिए:-

1 :- नई द्विमासिक पत्रिका “तहक़ीक़ात” के लिए थ्रिल, सस्पेन्स और जासूसी कहानियाँ / रचनाएँ आमंत्रित हैं।
2 :- रचनाएँ मौलिक और अप्रकाशित हों।
3 :- यूनिकोड हिन्दी फॉन्ट में टाइप की गई हों (साफ पठनीय हस्तलिखित रचनाएँ भी स्वीकार्य हैं।)।
4 :- शब्द-सीमा : कम से कम 3500 .
5 :- संपादक मण्डल द्वारा चयनित रचनाओं को प्रकाशित किया जाएगा।
6 :- लेखक अपना परिचय, मोबाइल न., ईमेल व अपनी नवीनतम फोटो साथ भेजें।
7 :- संपादक मण्डल का निर्णय अंतिम होगा।


उदाहरण के लिए तहकीकात पत्रिका का प्रथम भाग यहां आपके सामने है। इसका मूल्य 150 रुपए है और पेज संख्या 150 से ज्यादा है। जैसे पहले के समय में जासूसी पत्रिका, सत्यकथा, इत्यादि पत्रिकाएं आती थी, तहकीकात भी उन्ही की तरह है।

अपनी रचनाएँ निम्न ईमेल आई डी और व्हाट्सएप्प न. पर भेजें। ज्यादा जानकारी के लिए आप निम्न आईडी पर संपर्क कर सकते है। चयनित रचनाओं के लेखकों से नीलम जासूस कार्यालय आपके दिए हुए एड्रेस और कॉन्टेक्ट न. से आपको संपर्क करेंगे।

Email: tehkikatnjk@gmail.com
Whatsapp (सुबोध भारतीय): 9311377466

17 जून 2021

साक्षात्कार - नीलम जासूस कार्यालय

आज आप सबके लिए पेश है नीलम जासूस कार्यालय, दिल्ली के ओनर श्री सुबोध भारतीय जी के साथ हुई हमारी दिलचस्प बातचीत और कुछ सवाल जवाब जैसे आज के जमाने में एक प्रकाशक को क्या-क्या करना पड़ता है इत्यादि !!

1. सबसे पहले तो आप आपने परिचय दीजिए और आपने प्रकाशन संस्थान के बारे में बताए ? 
बंधू, मेरा नाम सुबोध भारतीय है, दिल्ली में ही जन्मा, पला, बड़ा हूँ। स्वभावतः में एक कलाकार हूँ, मेरी रूचि गायन, पाठन के अतिरिक्त लेखन में भी है, मुझे आप एक छोटा मोटा लेखक भी कह सकते हैं। वैसे में पिछले ४० वर्षों से मुद्रण व्यवसाय से जुड़ा हुआ हूँ। मेरी प्रकाशन संस्था का नाम नीलम जासूस कार्यालय है, जो लोकप्रिय साहित्य के सुनहरे दौर की वापसी के लिए कटि बद्ध है.


2. आप एक साल में लगभग कितनी किताबें पब्लिश करते हैं ? आप सिर्फ हिंदी साहित्य को ही प्रकाशित करते हैं या इंग्लिश साहित्य भी प्रकाशित करते हैं ?
अभी हमें एक साल नहीं हुआ है 10 महीने से भी कम समय में हम अब तक 40 किताबें प्रकाशित कर चुके हैं। इरादा तो 100 पुस्तकों का था पर Lockdown से काफी बाधा पहुंची है। 

हम हिंदी के साथ इंग्लिश में भी पुस्तकें प्रकाशित करने का इरादा रखते है। कोई पुस्तक हमारे अनुरूप होगी तो ज़रूर प्रकाशित करेंगे। 

3. आपके हिसाब से हिंदी साहित्य की कितनी कॉपी बिक जाती है ?
अभी हम नए हैं इस लिए ये कहना मुश्किल है की कितनी कॉपी बिक जाती है पर अब तक के अनुभव से इतना पता चला है की किताबें अब हज़ारों में नहीं सैकड़ों में बिकती हैं। जैसे अब फिल्मो की सिल्वर या गोल्डन जुबली नहीं होती सिर्फ कुछ दिन चलती हैं। 

4. आज के नए जमाने में आप पुराने समय में लुगदी साहित्य बोले जाने वाले उपन्यासों के प्रकाशन और इनकी पब्लिसिटी को कैसे मैनेज करते हैं ?
लुगदी साहित्य के लिए हम उन लेखकों को अप्रोच करते हैं जो आज कल नहीं छप रहे पर पुस्तक प्रेमी उनको अब भी दुबारा पढ़ना चाहते हैं। इसी लिए जर्जर अवस्था में, गले हुए कागज़ वाला 10 रूपये वाला नावेल 200 रूपये में खरीद रहे है। उसी या उस से कम कीमत में हम उन प्रेमियों को नया शानदार कागज़ पर छपा हुआ नावेल दे रहे हैं। वही हमारे लिए मौखिक पब्लिसिटी का आधार बन जाता है। सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म मार्केटिंग में काम आते हैं और उसके बाद रिटेलर भी अपने नखरे छोड़ कर हमें अप्रोच करता है।

5. नई पीढ़ी के लेखकों और पुरानी पीढ़ी के लेखकों में आपको क्या फर्क लगता है ?
सबसे बड़ा फ़र्क़ हमारे जीवन मूल्यों और भाषा का है। पुराने दिग्गज लेखक अश्लीलता परोसने से बचते थे, अगर ऐसा करना मजबूरी हो सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करते थे। उस समय के लेखकों की भाषा साहित्यिक श्रेणी में रखी जा सकती है पर आज तो भाषा का पूरा स्वरुप अंग्रेजी प्रधान हो गया है। नयी पीढ़ी के कम लेखकों में ही गहरायी है । 

6. काफी सारे पुराने प्रकाशन अब बंद हो गए हैं या बंद होने के कगार पर है फिर आप इसे कैसे मैनेज कर रहे है ?
हम सिर्फ पुराने लुगदी साहित्य प्रेमियों के दम पर प्रकाशन कर पा रहे हैं। उनका अपने प्रिय लेखकों के साथ भावनात्मक लगाव है। ज़्यादातर पाठक 45 वर्ष से अधिक के हैं, उनकी बालपन या जवानी की यादें इस साहित्य से जुडी हुई हैं। उस दौर में रेडियो,टेलीविज़न के बाद सबसे बड़ा टाइम पास ये नोवेल्स ही हुआ करते थे।

7. सुना है आपका प्रकाशन भी पुराना है पर काफी समय बंद रहा और अब आपने इसकी फिर से शुरुआत की है इसमें आपको क्या क्या समस्या आई ?
मेरे पिता स्वर्गीय सत्य पाल वार्ष्णेय अपने समय के सुविख्यात प्रकाशक थे जिनका दौर 1959 से 1969 तक चला। वेद प्रकाश कम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, कुमार कश्यप आदि लेखक इनके लिए नियमित नए उपन्यास लिखा करते थे। बचपन में मै इन सभी लेखकों के उपन्यास पढ़ा करता था। मगर जब होश संभाला तो पिताजी का प्रकाशन संस्थान बंद हो चुके थे, कुछ पारिवारिक बंटवारे और कुछ परिस्थितियों के कारण। मन में एक सोया हुआ अरमान रहा अपने पिता की प्रकाशन संस्था नीलम जासूस कार्यालय को पुनर्जीवित करने का। कम्बोज जी, शर्माजी के सुपुत्र वीरेंदर भाई के साथ परशुराम शर्माजी के सहयोग और प्रोत्साहन से ईश्वर ने ये सुनहरा अवसर दिया अपना सपना साकार करने का, सभी का आभारी हूँ। मेषु कम्बोज और राम पुजारी मेरे सगे छोटे भाइयों से भी बढ़ कर हैं जो हर पल मेरे साथ खड़े रहते है।

जहां तक समस्या की बात आयी हमें थोड़ा संदेह था की अब इनके ग्राहक नहीं होंगे या बहुत कम होंगे तब व्यावसायिक रूप से ये शुद्ध घाटे का सौदा होता। पर पहले सेट की घोषणा के साथ ही जिस तरह का रिस्पांस मिला हमारे हौसले बुलंद हो गए। अब तो हमारे पाठकों का वर्ग दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है।

8. उपन्यासों की कला/विद्या को जीवित रखने और फिर से पापुलर करने के लिए क्या क्या किया जाना चाहिए.. और इसमें एक प्रकाशक को क्या भूमिका निभानी चाहिए आपकी नजरों में ?
प्रकाशक का खुद एक अच्छा पाठक होना ज़रूरी है पहली बात, तभी वो सही उपन्यासों का चयन कर पाएंगे । दूसरे जब १० या २० रूपये की पुरानी कीमत वाला उपन्यास जब आप १५० या २०० रूपये की कीमत में आप बेचना चाहते हैं तो आपको सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी देनी होगी जिस से पाठक उसकी कीमत के बारे में कोई शिकवा ही न कर सके। तीसरी बात सब्र की है ये धंधा अब पूरी तरह से बदल चुका है धैर्य से बाज़ार का रुख देखना होगा। सोशिल मीडिया का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल ही दोबारा पाठकों को जोड़ पायेगा जो इस साहित्य को फिर से पॉपुलर कर सकता है। 

जहा तक प्रकाशक की भूमिका की बात है उसे नीयत साफ़ रखनी होगी, लेखकों और पाठकों दोनों के प्रति। वैसे आज के युग में प्रकाशन ऐसा ही है-एक आग का दरिया है और डूब के जाना है । 

9. इंटरनेट के आने से किताबो को क्या फायदा या नुकसान उठाना पड़ा ?
सबसे बड़ा नुकसान लोगों का किताबों से फोकस हट गया। मनोरंजन के असंख्य साधन उपलब्ध हो गए। नयी पीढ़ी को तुरंत वाला मनोरंजन चाहिए जो नेट से मिल जाता है, यही किताबों के बड़े नुकसान का कारण है।

10. आजकल काफी सारे पाठक हिंदी साहित्य से विमुख हो रहे है और इंग्लिश साहित्य, वेब सीरीज, स्मार्ट फोन की ओर जा रहे है आपकी नजरों में इसका क्या कारण है ?
इसका जवाब वही है - आज सबको हर चीज़ इंस्टेंट चाहिए जो इंटरनेट देता है | समय बदल रहा है और इस भागती दौड़ती दुनिया में किताब पड़ना तो एक ठहराव है जो इस युग के अधिकांश लोगों को नहीं भाता। 

11. आपके हिसाब से हिंदी साहित्य को दुबारा शिखर पर कैसे लाया जा सकता है ?
मुश्किल है पर असंभव नहीं है। इसकी शुरुआत स्कूली शिक्षा ही करनी होगी। आज जब किसी अभिभावक का बच्चा हिंदी में कम नंबर लता है तो वह शर्मिंदा होने की बजाय गर्व से इस बात को बताता है। जब बच्चा पूछता है डैडी उनहत्तर कितने होते हैं तो वह गर्व से हँसता हैं। ये अप्रोच गलत है आप जापान या चीन में ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते वो लोग अपनी मातृभाषा से प्यार और गर्व करते हैं।

12. क्या आपकी राय में सरकार को हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार में कोई कदम उठाना चाहिए ? अगर हा तो क्या कदम उठाए जाने चाहिए ?
सरकार को हिंदी का साहित्य सस्ता और सुलभ करना चाहिए। जो सार्वजानिक लाइब्रेरी की परंपरा थी उसका विस्तार करना चाहिए तथा हिंदी का प्रसार करने वाले प्रकाशकों को सस्ती दर पर कागज़ उपलब्ध करना चाहिए। 

13. सभी प्रकाशक शुरू के दो तीन महीने अपनी किताबो को हार्डकॉपी या पेपरबैक में देते है। उसके बाद किंडल एडिशन.. आप अपनी प्रकाशन की बुक का किंडल एडिशन क्यों नहीं देते जबकि काफी सारे प्रकाशक मानते है ई-बुक में आमदनी ज्यादा है ।
सबसे पहले आपको ये बात समझनी होगी की हार्ड कॉपी जब तक एक निश्चित मात्रा में नहीं बिकेगी प्रकाशक की लागत वापस नहीं आएगी। दुसरी बात लेखक को रॉयल्टी तभी मिलनी शुरू होगी जब प्रकाशक प्रॉफिट में आएगा। इस से पहले अगर ई-बुक निकाल दी गयी तो वो मुफ्त में वायरल हो कर सारे व्यापर को ध्वस्त कर देगी। जो पुस्तक अपनी लागत निकाल कर लेखक को भी रॉयल्टी दे चुकी है और अब उसकी हार्ड कॉपी भी मुश्किल से बिक रही है उसी पुस्तक की ई-बुक  निकालनी चाहिये। 

प्रकाशक यदि कॉपीराइट फ्री लेखकों के किंडल एडिशन या ई-बुक निकालता है उसको जो भी मिल रहा है सब प्रॉफिट ही है। न प्रिंटिंग और कागज़ की लागत और न ही लेखकों को रॉयल्टी देनी पड़ेगी।

सुबोध भारतीय जी का शुक्रगुजार हूँ कि इन्होंने अपना बहुमूल्य समय हमे दिया और हमारे सवालों का जवाब दिया । अपने व्यस्त टाइम टेबल और तीन-तीन उपन्यासों के प्रकाशन कार्य में व्यस्त होते हुए भी जो इन्होंने हमारे लिए समय निकाला, उसके लिए इनका हार्दिक आभार।

नीलम जासूस ने पुराने दिग्गज लेखकों को रिप्रिंट करना शुरू किया है । नीलम जासूस भविष्य में नए लेखकों को मौका भी देना चाहता है । बशर्ते लेखक की लेखनी में दम होना चाहता है। हाल फिलहाल में नीलम जासूस से सुरेश चौधरी जी का नया उपन्यास 'दंगा' आ रहा है ।
साथ ही नीलम जासूस कार्यालय आप सभी के लिए इसी हफ्ते तीन उपन्यास लेकर आ रहा है । अगर आपके नजदीकी बुक स्टॉल पर ना उपलब्ध हो तो आप नीलम जासूस कार्यालय से संपर्क करके इन उपन्यासों को ले सकते है।

सुबोध भारतीय
मोबाइल नंबर (व्हाट्सएप): 9310032466
नीलम जासूस कार्यालय - नई बोतल में पुरानी शराब




सुनहरे दौर के नगीने