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14 मई 2022

एक साथ तीन प्रेत - जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा

लघु उपन्यास : एक साथ तीन प्रेत 
लेखक : जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा 
श्रेणी : जासूसी एंव भूत-प्रेत
पृष्ठ संख्या : 67
प्रकाशक : राधा पॉकेट बुक्स

यह लघु उपन्यास लेखक के "भाभी" उपन्यास में प्रकाशित हुआ था। उपन्यास के कथानक सूत्र के अनुसार जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा ने अपने एक पुराने रिटायर्ड मेजर मित्र सूरतवाला से सुनी हुई मेरठ छावनी की वर्षों पुरानी किवदंतियों के आधार पर इस लघु उपन्यास की रचना की है। 

उपन्यास के प्रारंभ से लिया गया एक छोटा सा अंश: 
 सुबह की सैनिक परेड छः बजे आरंभ होती थी और बिगुलवादक पहला बिगुल 5 बजे अपने घर की छत से ही बजाता था। फिर वह बिगुल सहित उस स्थान पर पहुंच जाता जहां बहुत पहले 1857 में उन अंग्रेजों के स्मारक थे और आज रेलवे लाइन पटरी है। 

कहानी कुछ इस प्रकार शुरू होती है कि एक सुबह एक जंगली भैंसा छावनी में अंग्रेज मेजर रॉबसन के बंगले के अहाते की दीवार तोड़कर फुलवारी को नष्ट करने लगता है। मेजर रॉबसन भैंसे को बंदूक से गोलियां मारकर खत्म कर देता है। अगली सुबह सैनिक परेड के निर्धारित समय पर बिगुलवादक बिगुल बजाकर परेड मैदान में बने अंग्रेजों के स्मारक वाले चबूतरे पर बैठ जाता है। अचानक एक पागल जंगली भैंसा उस पर आक्रमण कर देता है। बिगुलवादक घबराकर भागता है। तभी सामने से मेजर रॉबसन घोड़े पर आता है और जंगली भैंसे का सामना करता है। लड़ाई के दौरान क्रुद्ध भैंसा मेजर रॉबसन, बिगुलवादक और घोड़े को खत्म कर देता है। 

बिगुलवादक को रौंदते हुए भैंसे ने घोड़े पर अपने सींगों से वार करते हुए घोड़े का पेट फाड़ दिया। घोड़ा गिरा साथ ही रॉबसन भी।
और परिणाम...! 
तलवार के कुछ वार से भैंसा घायल तो अवश्य हुआ, परंतु उसने तीन जान ले लीं। 

मेजर रॉबसन की जवान और खूबसूरत पत्नी एवलिन यह समाचार सुनते ही बेहोश हो जाती है। छावनी का द्वितीय सीनियर अफसर कैप्टन नेल्सन पादरी को बुलाकर मेजर रॉबसन और बिगुलवादक को कब्र में दफनाने का प्रबंध करवाता है। परंतु अगली ही रात उनकी कब्रें हुई खुदी मिलती हैं। परेशान नेल्सन कब्रें ठीक करवाकर वहां 25 सैनिकों का पहरा लगा देता है। इधर अचानक एवलिन का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है और दिनोंदिन उसका चेहरा पीला पड़ने लगता है। डॉक्टर को एवलिन की बिगड़ती हालत का कारण समझ नहीं आ पाता। 

 ...साथ ही दवा के रूप में टानिक भी देता था। परंतु एवलिन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ रहा था, डॉक्टर ने नोट किया कि उसके चेहरे का पीलापन कम नही हो रहा था और कम हो रहा था उसका वजन। 

दो माह बाद कलकत्ता से जॉर्ज साइमन मेरठ छावनी में मेजर रॉबसन का स्थान लेने के लिए आता है। साइमन मेजर रॉबसन का भाई होता है। छावनी का कार्यभार संभालते ही वो एवलिन से मिलता है। जब एवलिन साइमन को अपनी बुरी दशा का कारण बताती है तो वो हैरान रह जाता है। साइमन ये भी देखता है कि नेल्सन और छावनी के सारे सैनिक अक्सर थके-थके से रहते हैं। नेल्सन से इसका कारण जानकर उसका दिमाग घूम जाता है। उसे समझ ही नहीं आता कि किस बात को माने और किस बात को नहीं! वो तुरंत एवलिन की सुरक्षा का और साथ ही फादर जेफरसन को छावनी में बुलवाने का प्रबंध करता है। 

जंगली भैंसे ने मेजर रॉबसन, बिगुलवादक और घोड़े को कैसे मार गिराया? 
मेजर रॉबसन और बिगुलवादक की कब्रें किसने खोदीं? 
एवलिन का स्वास्थ्य दिनोंदिन कैसे बिगड़ने लगा?  
नेल्सन और छावनी के सारे सैनिक थके हुए क्यों रहते थे? 
एवलिन और नेल्सन ने ऐसा क्या बताया कि साइमन स्तब्ध रह गया? 
कौन थे फादर जेफरसन? 
साइमन ने फादर जेफरसन को छावनी क्यों बुलाया? 
आखिर क्या रहस्य था इस सारे घटनाक्रम के पीछे? 
क्या साइमन, नेल्सन और फादर जेफरसन मिलकर इस गुत्थी को सुलझा पाए? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर ही प्राप्त कर पाएंगे। 

पात्रों की बात करें तो इस उपन्यास में मेजर रॉबसन, एवलिन, बिगुलवादक, कैप्टन नेल्सन, डॉक्टर जेम्स, जॉर्ज साइमन, फादर जेफरसन, दुर्गा बाबू, रामचंद्र, शंकर सिंह, संन्यासी जैसे पात्र पढ़ने को मिलते हैं। 
साइमन, फादर जेफरसन, नेल्सन और संन्यासी के पात्र मुझे काफी अच्छे लगे। अन्य सहायक पात्र अपनी जगह सही रहे।

मुझे कहानी पढ़ने में बहुत रोचक लगी। कहानी में जासूसी और भूत-प्रेत धाराओं का सम्मिश्रण बढ़िया बन पड़ा है। पात्रों का ताल-मेल भी लेखक ने अच्छा बनाए रखा है। आप एक बार इस लघु उपन्यास को जरूर पढ़ें।

कमेंट्स के द्वारा अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8.5/10

11 मई 2022

धमाकों का शहर - राज


उपन्यास: धमाकों का शहर
लेखक: राज
पेज संख्या: 272 
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स

हमारे पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार "राज" नाम राजा पॉकेट बुक्स द्वारा रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क था। किसी प्रेत लेखक द्वारा ये उपन्यास लिखे जाते थे और फिर राजा पॉकेट बुक्स द्वारा "राज" नाम से प्रकाशित किए जाते थे। 

         उपन्यास का कवर 

उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से लिया गया एक छोटा सा अंश: 

*कुछ मुल्कों की तो सरकारें तक उससे आतंकित थी। कहीं-कहीं उसने अपनी जड़ों को इतनी गहराई तक पहुंचा दिया था कि वहां की सरकारें उसके रहमोकरम पर थी।
वहीं कुख्यात हस्ती उस समय हिंदुस्तान में पड़ाव डाले हुए थी।
यहां भी उसके आपराधिक निजाम की जड़ें काफी गहराई तक पहुंची हुई थी।* 

उपन्यास का आरंभ होता है अंडरवर्ल्ड के बादशाह अम्बा और मंत्री जयंती प्रसाद की मुलाकात के दृश्य से जिसमे जयंती प्रसाद अपनी सेक्रेटरी अर्चना गोखले के साथ एक सहायता प्राप्त करने के लिए अम्बा के पास आता है। अम्बा उसे एक योजना बताता है जिससे उसका काम हो जाए। जयंती प्रसाद और अम्बा दोनों योजना के क्रियान्वन में लग जाते हैं। 

*उसके हाथ में एक रोल किया हुआ कागज था। 
*वह अम्बा के सामने सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
"टोनी!"
"यस बॉस!"
"मंत्रीजी को अपनी स्कीम समझाओ।" अम्बा ने आदेश दिया।...*

इधर एक अन्य जगह पर विवेक नंदी नाम का एक कैश कलेक्टर अपने बॉस जसराज मथानी के पास रोज की तरह पैसा जमा करवाने आता है पर बीस हजार रुपए कम निकलने पर मथानी क्रोधित हो उठता है। मथानी उसे रुपया वापस करने के लिए 24 घंटे की अवधि देता है। डरा हुआ विवेक रुपया प्राप्त करने की कोशिशों में लग जाता है मगर इसी बीच कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिससे विवेक नंदी की दुनिया ही उजड़ जाती हैं। 

*...चारों ओर का काफी बड़ा इलाका मानवरहित हो चुका था और उस मानवरहित इलाके में विनोद नंदी अकेला था।
वह उस ओर ही दौड़ रहा था जहां साक्षात मौत तांडव कर रही थी। 
लोग उससे दहशत खाकर भाग रहे थे, वह उसी ओर जा रहा था।*

वहीं रिसर्च एनालिसिस विंग (रॉ) की स्पेशल ब्रांच के ऑफिस में डायरेक्टर जयंत रमन्ना को देश पर मंडरा रहे एक गंभीर खतरे की सूचना मिलती है। वो अपने सबसे विश्वसनीय और योग्य एजेंट अजीत विश्वकर्मा को उसी समय मीटिंग के लिए बुला डालते हैं। पूरी जानकारी प्राप्त करने के बाद रमन्ना और अजीत विश्वकर्मा मिलकर एक प्लान बनाते हैं। फिर अजीत विश्वकर्मा इस खतरे को समाप्त करने के लिए एक गुप्त मिशन पर तुरंत ही पाकिस्तान के लिए रवाना हो जाता है ताकि वो उस खतरे का खत्म कर सके। परंतु घटनाक्रम कुछ इस तरह से आगे बढ़ता है कि अजीत और रमन्ना के साथ-साथ बाकी सब लोग भी खतरे में पड़ जाते हैं और सबकी जान पर बन आती है । 

*"मेरी भरसक कोशिश होगी सर कि" - विश्वकर्मा ने कहा - "मैं आपके विश्वास की रक्षा कर सकूं।"
"मगर यह काम उतना आसान नहीं है मिस्टर विश्वकर्मा" - रमन्ना ने गंभीर स्वर में कहा - "इसमें खतरे कदम-कदम पर तुम्हारा स्वागत करेंगे।"*

जयंती प्रसाद को ऐसी क्या सहायता चाहिए थी अम्बा से? 
क्या खतरनाक योजना थी अम्बा की? 
ऐसा क्या घटित हुआ था जिसने विवेक नंदी की दुनिया ही उजाड़ दी? 
डायरेक्टर जयंत रमन्ना को किस गंभीर खतरे की सूचना मिली थी? 
अजीत विश्वकर्मा को तुरंत किस मिशन पर निकलना पड़ा? 
क्या अजीत का मिशन सफल हो सका? 
ऐसा क्या हुआ कि सबकी जान खतरे में पड़ गई? 
क्या अजीत को किसी प्रकार की मदद प्राप्त हो पाई? 
इस सारे घटनाक्रम में कौन बचा और किसे अपनी जिंदगी गंवानी पड़ी? 
क्या हुआ जयंती प्रसाद और अम्बा का? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर प्राप्त कर सकते हैं। 

इस उपन्यास में मुख्य पात्र अजीत विश्वकर्मा है। विश्वकर्मा के अलावा अम्बा, जयंती प्रसाद, अर्चना गोखले, विनोद नंदी, मथानी, अखिलेश नंदी, स्वाति नंदी, सुलेमान कसूरी, दिलावर खान, चंपा, जयंत रमन्ना, कंचन जोशी, जाहिदा मालिक, डॉक्टर हैदर, असलम खान, मेजर अंसारी, रशीद, अजरा जैसे पात्र उपन्यास में मिलेंगे। 

मुझे मुख्य पात्र अजीत विश्वकर्मा की भूमिका ठीक-ठाक लगी। जयंत रमन्ना का किरदार अच्छा लगा। अन्य सहायक पात्रों में स्वाति नंदी, कंचन जोशी, सुलेमान कसूरी और जाहिदा सही लगे। 

उपन्यास की कहानी कुल मिलाकर साधारण ही लगी। लेखक ने कहानी को घुमावदार बनाने की कोशिश तो की है पर सफल नहीं हो पाए। कहानी नॉन-स्टॉप एक्शन से भरपूर है और कहीं-कहीं द्विअर्थी संवादों का भी उपयोग किया गया है। 
कुछ कमियां कहानी को कमजोर बना देती हैं जैसे कि पूरे शहर की संपूर्ण व्यवस्था को ही ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट और लाचार दिखा देना, पुलिस तथा सभी जांच एजेंसियों का बेखबर सोए रहना और फिर अचानक जाग उठना, घटनाओं के तालमेल में गड़बड़ इत्यादि! 

उपन्यास की प्रिंटिंग गुणवत्ता सही है और शाब्दिक गलतियां भी कम हैं।

अगर आपको अच्छी कहानी से अधिक रुचि नॉन-स्टॉप एक्शन एवं कुछ द्विअर्थी संवाद पढ़ने में है तो ये उपन्यास आपके लिए कुछ हद तक मनोरंजक हो सकता है अन्यथा निराशा होने की संभावना ही अधिक है।

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रेटिंग: 5/10

04 मई 2022

भाभी - जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा

उपन्यास : भाभी 
लेखक : जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा 
श्रेणी : सामाजिक / पारिवारिक
पृष्ठ संख्या : 173
प्रकाशक : राधा पॉकेट बुक्स

           राधा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित भाभी उपन्यास कवर

      हाल ही में नीलम जासूस कार्यालय से प्रकाशित उपन्यास 

उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से लिया गया एक छोटा सा अंश: 
 प्रत्येक सांझ की भांति आज प्रभा के चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान नही थी। 
आज वह पूरी तरह गंभीर थी। 
मुस्कुराते हुए मोहन ने कहा - "एक शेर सुनाना चाहता हूं - हंसते खेलते महफिल में आए थे 'फिराक'।
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए।"

उपन्यास का आरंभ गुलाब रेस्तरां के दृश्य से होता है जहां प्रेमी युगल मोहन और प्रभा अपनी शादी की तारीख निश्चित होने की खुशी मनाने के लिए मिलते हैं। बातचीत के दौरान मोहन अपनी भाभी पद्म, उनकी सादगी और उनके स्वभाव के बारे में प्रभा को बताता है। 

"भाभीजी क्या क्या जानती है, यह तो तुम तभी जानोगी जब इस घर में आ जाओगी। यह सही है कि घर बड़ा था और उसमें रसोई आदि के अतिरिक्त दस कमरे थे। परंतु साठ वर्ष पहले बना हुआ पुराने ढंग का घर था। धीरे-धीरे भाभीजी ने उसे एकदम आधुनिक ढंग का घर बनवा दिया है।"

मोहन अच्छी तनख्वाह पर दिल्ली में सरकारी नौकरी में सिविल इंजीनियर के पद पर कार्यरत है। मोहन के परिवार में उसका बड़ा भाई बलदेव, भाभी पद्म और उनकी छोटी सी बेटी मधु है। बलदेव की पुरानी दिल्ली में फैंसी कपड़ों की बड़ी दुकान है तथा घर पर फैंसी कपड़े बनाने का कारखाना है। 
मोहन की होने वाली पत्नी प्रभा एक बेहद संपन्न परिवार से है और बचपन से ही सुख-सुविधाओं में पली-बढ़ी है। प्रभा के परिवार में उसके माता-पिता, बड़ा भाई सुबोध, भाभी माया और उनके बच्चे हैं। 
शादी होने के बाद प्रभा मोहन के साथ घर आती है और पद्म प्रेमपूर्वक नई दुल्हन का स्वागत करती है। संपन्न परिवार की प्रभा पद्म और बलदेव की संतोषी प्रवृति और उनके सादगी भरे परिवार को देख एक बार तो विस्मित रह जाती है। 
रीति-रिवाज के अनुसार प्रभा पहला फेरा लगाने मायके जाती है और उसके बाद नियमित रूप से मायके जाने लगती है। परंतु मायके के हर चक्कर के साथ ही प्रभा के व्यवहार में कुछ बदलाव आने लगता है और शीघ्र ही परिस्थितियां अलग मोड़ लेने लगती हैं। 

परंतु क्या हमेशा ही वातावरण शांत रहना था?
कहा जाता है कि जब रेगिस्तान में जबरदस्त आंधी आने को होती है, उससे पूर्व साधारण हवा भी लगभग बंद हो जाती है। अगर कहा जाए कि कुछ ऐसा ही था तो गलत न होगा।

बढ़िया व्यापार होने के बावजूद बलदेव और पद्म संतोष और सादगी भरे जीवन में कैसे प्रसन्न थे? 
मायके के हर चक्कर के साथ ही प्रभा के व्यवहार में बदलाव क्यों और कैसे आने लगा? 
क्या परिणाम निकला प्रभा के व्यवहार में हो रहे निरंतर बदलाव का? 
कैसा था प्रभा का परिवार और कैसे थे उनके विचार? 
शादी के बाद क्या बदलाव आया मोहन की जिंदगी में? 
बदलती हुई परिस्थितियों का बलदेव और पद्म पर क्या असर पड़ा? 
फिर बलदेव और पद्म ने क्या किया? 
ऐसे हालात में क्या प्रभा का परिवार कुछ कर पाया?
इन सब प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर ही प्राप्त कर पाएंगे। 

पात्रों की बात करें तो इस उपन्यास में प्रभा, मोहन, बलदेव, पद्म, मधु, सुबोध, माया, नरेश कुमार सेन, सकलानी, यासीन, भोला पंडित, अनवर, मेहता, अजीज, थामस, बिशन सिंह, सोराबजी और डॉक्टर चाची जैसे पात्र पढ़ने को मिलेंगे। 
पद्म और बलदेव के किरदार बहुत अच्छे बन पड़े हैं। मोहन और प्रभा भी सही लगे। सहायक पात्रों में नरेश कुमार सेन, माया और सोराबजी बढ़िया लगे।

उपन्यास की कहानी अच्छी है और पारिवारिक मूल्यों के महत्त्व को समझाती है। लेखक ने कहानी में भावुकता को सही तथा नियंत्रित रूप से दर्शाया है। उपन्यास की कहानी यह संदेश भी देती है कि चाहे कोई खुद को कितना ही चतुर माने, गलती उससे भी हो ही जाती है। लेखक के संवादों ने कहानी में कसावट बनाए रखी है और पात्रों को मजबूती प्रदान की है। 

मनोरंजन की दृष्टि से सामाजिक और पारिवारिक उपन्यास पढ़ने वाले पाठकों को ये उपन्यास बिल्कुल निराश नहीं करेगा।

मुझे उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर) का डिजाइन सही लगा। उपन्यास की प्रिंटिंग गुणवत्ता ठीक है परंतु कहीं-कहीं पर शाब्दिक गलतियां हैं। 

इस उपन्यास के अंत में लेखक ने 67 पृष्ठों का एक लघु उपन्यास "एक साथ तीन प्रेत" भी प्रस्तुत किया है। हॉरर और जासूसी श्रेणी का ये उपन्यास भी पठनीय है। इसकी समीक्षा हम अगले पोस्ट में प्रस्तुत करेंगे।

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रेटिंग: 7.5/10

30 मार्च 2022

विष मानव - अनिल मोहन


उपन्यास: विष मानव
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 304

                   विष मानव उपन्यास कवर
'विष मानव' चार उपन्यासों की श्रृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम भाग है। इस श्रृंखला के प्रथम तीन भागों 'देवदासी समीक्षा', 'इच्छाधारी समीक्षा' तथा 'नागराज की हत्या' की समीक्षा हमारे ब्लॉग पर पहले से ही उपलब्ध है। 

'नागराज की हत्या' उपन्यास के अंत में सांपनाथ की बस्ती के सभी राक्षस झोंपड़ी में त्रिवेणी उर्फ रुस्तम राव के ठहाके को सुनकर और उसके काले-नीले शरीर को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं।

विष मानव' उपन्यास से लिया गया एक अंश: 
**"मुझे बताइए आपको क्या परेशानी है ?" गंगू साथ चलते-चलते बोला "मैं आपको परेशान नहीं देख सकता। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आपकी चिंता को दूर कर सकूं।" 
"बहुत बुरा हुआ!" वायुलाल अपनी ही सोचों में बड़बड़ा उठा।
"क्या ?"**

उपन्यास 'विष मानव' का प्रथम दृश्य वायुलाल और गंगू के वार्तालाप से आरंभ होता है। इस दौरान वायुलाल गंगू से कहता है कि ऐसा कौन है जो उसके द्वारा सैकड़ों वर्षों में प्राप्त की गई शक्तियों से टकराने का साहस कर रहा है। वायुलाल अपनी शक्तियों से इस बारे में पता लगाने के लिए गंगू के साथ एक विशेष कमरे की तरफ बढ़ जाता है। 

 **वायुलाल और गंगू दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गए।
बाहर खड़े सेवकों ने वो दरवाजा पुनः बंद कर दिया।
वो बहुत बड़ा हॉल कमरा था जहां अजीबों तरह का सामान पड़ा नजर आ रहा था। दीवारों पर समझ में न आने वाले चित्र बने हुए था।**

उधर दक्षिण दिशा में काला द्वार के पास मोना चौधरी, जगमोहन और महाजन रात में बारी-बारी से पहरा दे रहे थे ताकि नागराज से किए वादे के अनुसार जैसे ही सुबह हो जाए, वो लोग तुरंत अपना काम पूरा कर सकें। काला द्वार से कुछ ही दूरी पर मौजूद जगमोहन, सोहनलाल और जलेबी भी अपनी योजना बना रहे होते हैं ताकि वो भी बिना किसी अड़चन के अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकें। 

**..... जगमोहन बोला "चालाकी इस्तेमाल करनी है।" 
"क्या मतलब ?"
"मुझे बता जग्गू !" जलेबी कह उठी।
जगमोहन धीमे स्वर में उन्हें बताने लगा।**

इधर बांके और नगीना के साथ क्रोध से भरी रानी देवराज चौहान के पास पहुंचने की कोशिश कर रही होती है। वहीं अपने पति को खोने से आहत नागरानी बदला लेने के लिए आतुर हो उठती है और सांपनाथ की बस्ती की ओर चल पड़ती है। 

**चंद क्षणों में ही नागरानी अपने खूबसूरत मानवीय रूप में उनके सामने खड़ी थी। परंतु इस वक्त वो क्रोध की आग में तप रही थी। गुस्से से उसका चेहरा धधक रहा था। आंखें लाल हो रही थी। शरीर आवेश से कांप कहा था। **

घटनाक्रम कुछ इस प्रकार से आगे बढ़ता है कि देवराज चौहान, रुस्तम राव, रानी और बाकी साथी तथा वायुलाल, मोना चौधरी और उसके साथियों के बीच एक ऐसे जानलेवा टकराव की स्थिति बन आती है जिसका परिणाम किसी एक पक्ष की पराजय से ही निकलना संभव था। 

"मैं जानता हूं कि वायुलाल मेरे रास्ते में ढेर सारी परेशानियां खड़ी करेगा।" रुस्तम राव ने देवराज चौहान को देखकर सिर हिलाया - "इस काम में वो अकेला नहीं होगा। उसके साथ मोना चौधरी भी अवश्य होगी। परंतु मेरी पूरी कोशिश होगी कि मैं ये ....."

वायुलाल अपने विशेष कमरे में किन शक्तियों का आह्वान करने के लिए गया?
रुस्तम राव का शरीर काला-नीला कैसे हो गया? 
क्या सचमुच विश्व पुरुष "नागराज" की हत्या हुई थी? 
क्या मोना चौधरी देवराज चौहान से बदला ले सकी? 
क्या जगमोहन, सोहनलाल और जलेबी की चालाकी काम आई? 
जब क्रोध से भरी रानी का सामना देवराज चौहान से हुआ तो क्या हुआ? 
क्या नागरानी अपना प्रतिशोध ले पाई? 
देवराज चौहान, रानी, रुस्तम राव और उसके साथी तथा वायुलाल, मोना चौधरी और उसके साथियों के बीच हुए  जानलेवा टकराव का क्या परिणाम हुआ? 
बलसारा और हंसनी ने क्या चालें चली? 
क्या इस टकराव का परिणाम इतना ही सीधा और सरल था जितना दिख रहा था या अंदर कुछ और रहस्य भी छुपा हुआ था? 
क्या था वायुलाल की शक्तियों का केंद्र? 
आखिर किस प्रकार खत्म हुआ देवराज चौहान और मोना चौधरी का इस बार का पूर्व जन्म का सफर? 
रानी और जलेबी का क्या हुआ? 
कौन था वो चांदी का बना एक फुट का रहस्यमयी बौना मानव? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको यह उपन्यास पढ़कर ही मिल पाएंगे!

अब पात्रों के बारे में बात की जाए तो इस उपन्यास में देवराज चौहान, जगमोहन, वायुलाल और रुस्तम राव बढ़िया लगे हैं। बलसारा, हंसनी, नजूमी, नागरानी, रहस्यमयी विश्व पुरुष नागराज, इच्छाधारी और रानी के पात्र भी अच्छे लगे। जहां इच्छाधारी, पारसनाथ और महाजन सही लगे, वहीं मोना चौधरी, बांकेलाल और नगीना सामान्य ही लगे। जलेबी और सोहनलाल ने कहानी में कुछ मजाक-मस्ती का दौर भी बनाए रखा है। कुछ नए सहायक पात्र जैसे रामभजन, जंगली सरदार भी इस उपन्यास में पढ़ने को मिलते हैं परंतु उनकी भूमिका नगण्य ही है।

उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर) का डिजाइन ठीक-ठाक है। इस उपन्यास में मुख्य पात्र के रूप में देवराज चौहान की तुलना में मोना चौधरी का किरदार उतना दमदार नहीं लगा जितना इस शृंखला के पहले के उपन्यासों में था। 
साथ ही कुछ संवाद इस उपन्यास में भी अनावश्यक रूप से लंबे एवं खिंचे हुए लगे - खासकर देवराज, उसके साथियों की जंगलियों से हुई भेंट वाले प्रसंग में ।

कुल मिलाकर उपन्यास मनोरंजक है और कहानी पाठकों को बांधे रखती है। उपन्यास का अंत रोमांचक और उत्सुकता से भरा है तथा श्रृंखला का समापन भी बहुत अच्छे ढंग से किया गया है। 

अंत में ये जरूर कहना चाहूंगा कि चार उपन्यासों की ये संपूर्ण श्रृंखला एक बार अवश्य पढ़ें। यह उपन्यास श्रृंखला अनिल मोहन द्वारा रचित यादगार उपन्यासों में से एक है।

कमेंट्स के द्वारा हमें अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं।क्या आपने भी इन चारो उपन्यासों की श्रृंखला को पढ़ा है। हमेशा की तरह हमें आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8.5/10

22 मार्च 2022

नागराज की हत्या - अनिल मोहन


उपन्यास: नागराज की हत्या
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 303

'नागराज की हत्या' चार उपन्यासों की श्रृंखला का तृतीय भाग है। इस श्रृंखला के प्रथम भाग 'देवदासी समीक्षा' तथा द्वितीय भाग 'इच्छाधारी समीक्षा' की समीक्षा हम पहले ही ब्लॉग पर शेयर कर चुके हैं। 

'इच्छाधारी' उपन्यास के अंत में देवराज चौहान, नगीना, रानी और बांकेलाल राठौर  सांपनाथ की बस्ती में पहुंच जाते है परंतु वहां उनकी भेंट सांपनाथ के स्थान पर तूतका से होती है। तूतका उन्हें बंदी बनाने की कोशिश करता है।

'नागराज की हत्या' उपन्यास से लिया गया एक अंश: 
** "इधरो तो अपणो जाणो की खैर न दिखो। देवराज चौहान को किधर से अम बचायो?" 
चंद कदमों के फासले पर थे राक्षस जाति के वे लोग। 
वहशी इरादे थे उनके। 
तूतका का आदेश मिल चुका था उन्हें। **

उपन्यास 'नागराज की हत्या' के प्रथम दृश्य में तूतका और उसके संगी राक्षस देवराज और उसके साथियों को मारने की कोशिश करते हैं परंतु रानी बीच में आ जाती है। तूतका से बात करने के बाद देवराज, रानी, नगीना और बांकेलाल सुनेरा की बस्ती में तूतका के साथ जाने की योजना बनाते हैं। 

** तूतका ने कहा - "आइए, उधर झोंपड़े में चलते हैं। वहीं बातें होंगी। शायद आप लोगों के लिए कहवे का इंतजाम हो जाए।"
देवराज चौहान, रानी, नगीना और बांकेलाल राठौर तूतका के पीछे चल पड़े। परंतु वे सतर्क थे कि... **

उधर नागलोक में विश्व पुरुष 'नागराज' अपनी पत्नी नागरानी से एक गंभीर वार्तालाप में व्यस्त होता है। वार्तालाप के दौरान नागरानी एक ऐसी समस्या बताती है जिसे सुनकर नागराज व्यथित हो जाता है और अपनी शक्तियों द्वारा इसका हल निकालने का प्रयत्न करता है। परंतु नागराज की शक्तियां इस समस्या का जो समाधान बताती है, वो समाधान नागराज को भी दुविधा में डाल देता है। 

** "तुम अपना दिल छोटा न करो नागरानी।"
"आप मुझे झूठा दिलासा दे रहे... ।"
"मैं कुछ भी झूठ नहीं कह रहा। जग से लड़ने की भावना  तुममें पैदा कर रहा... ।"
"मैं कायर नहीं हूं जो.. ।" **

वहीं वायुलाल के महल में मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन आपस में मंत्रणा करने के पश्चात अपनी यात्रा आरंभ कर चुके होते हैं। वे जंगल के रास्ते से अपनी यात्रा शुरू करते हैं ताकि सुनेरा की बस्ती का कठिन सफर शीघ्र ही तय किया जा सके तथा देवराज और उसके साथियों तक पहुंचा जा सके। 

** गरमी से बुरा हाल था। शाम तक ऐसा ही रहना था। 
वे तीनों आगे बढ़ रहे थे। 
पीछे न देख सके। 
पीछे शीशे के समान चमकता, पारदर्शी बवंडर दिखा, जो कि पंद्रह फीट के व्यास में... **

उपरोक्त स्थानों पर चल रही गतिविधियों के समानांतर ही अन्य स्थानों (सांपनाथ की बस्ती में, सुनेरा की बस्ती में, सुनेरा की बस्ती के बाहर, वायुलाल के महल में, नागराज  की घाटी में) पर भी घटनाचक्र तेजी से चलता है। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में ये सब घटनाएं एक दूसरे से जुड़ जाती हैं और हालात इस तरह उलझ जाते हैं कि लगभग सबकी जान खतरे में पड़ जाती हैं।

देवराज, रानी और उनके साथी सुनेरा की बस्ती में क्यों जाना चाहते थे?
कौन था विश्व पुरुष नागराज और क्या था उसका रहस्य?
नागरानी ने ऐसी क्या बात बताई जिसने नागराज को चिंतित कर दिया? 
क्या था वो समाधान जिस कारण नागराज भी दुविधा में पड़ गया? 
क्या योजना बनाई नागराज ने? 
क्या मोना चौधरी और देवराज चौहान का आमना-सामना हुआ? 
सुनेरा ने अपनी ओर से सुरक्षा के क्या प्रबंध कर रखे थे? 
नजूमी कौन था और क्या महत्त्व था उसका? 
कौन थे बलसारा और हंसनी तथा क्या थी उनकी भूमिका?
इच्छाधारी ने इस बार क्या गुल खिलाए? 
सुनेरा की बस्ती में फंसे सांपनाथ का क्या हुआ? 
जलेबी, जगमोहन और गुलचन्द के सामने क्या-क्या खतरे आए? 
क्या वायुलाल अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाया?  
देवराज, रानी, नगीना और बांकेलाल को किन-किन खतरों से जूझना पड़ा इस बार? 
त्रिवेणी उर्फ रुस्तम राव का क्या हुआ? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको यह उपन्यास पढ़कर ही मिल पाएंगे!

अब हम उपन्यास के पात्रों के बारे में बात करते हैं। मुख्य पात्रों और श्रृंखला के पिछले दोनों उपन्यासों में मौजूद अधिकांश सहायक पात्रों के अलावा आपको नजूमी, बलसारा, हंसनी, नगोरा, नागरानी जैसे नए सहायक पात्र पढ़ने को मिलेंगे। 
मुझे इस उपन्यास के सहायक पात्रों में सुनेरा, बलसारा और नागरानी अच्छे लगे। नागराज का किरदार सबसे अधिक प्रभावी लगा। जहां मुख्य पात्र देवराज चौहान, मोना चौधरी, वायुलाल और रानी अच्छे रहे, वहीं जगमोहन, गंगू और सोहनलाल भी पसंद आए। रुस्तम राव और इच्छाधारी के किरदार दिलचस्प रहे हैं। पारसनाथ, महाजन, नगीना और बांकेलाल की भूमिका इस उपन्यास में साधारण ही रही। सांपनाथ, नागनाथ, दुदका, तूतका इत्यादि पात्र अपनी-अपनी जगह ठीक लगे।

इस उपन्यास में आपको नागराज की वृहद शक्तियों का परिचय मिलेगा। सुनेरा और उसकी बस्ती के बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी। मोना चौधरी, रानी, पेशीराम और वायुलाल की कुछ और शक्तियों के बारे में पता चलेगा। जलेबी और सोहनलाल का जगमोहन को खिजाना होठों पर स्वतः ही मुस्कान ला देता है। बीच में इच्छाधारी भी अपना जलवा बिखेरने में सफल रहा है। 

उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर) का डिजाइन सामान्य सा ही लगा। कुछ जगहों पर संवाद काफी लंबे लिखे गए है जिन्हे लेखक द्वारा आसानी से कम किया जा सकता था। इस कमी को हटा दें तो कुल मिलाकर उपन्यास बहुत अच्छा है और पूरी श्रृंखला को मनोरंजक बना देता है। उपन्यास का अंत रोमांचक बन पड़ा है और अनिल मोहन की लेखनी का असर पाठकों को अगला उपन्यास तुरंत पढ़ने के लिए उत्साहित कर देता है। 

कमेंट्स के द्वारा हमें अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। हमेशा की तरह हमें आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8.5/10

14 मार्च 2022

तहकीकात पत्रिका - नीलम जासूस कार्यालय

पत्रिका: तहकीकात
श्रेणी: जासूसी तथा अपराध कथाएं
पेज संख्या: 150
मूल्य: 150 रुपए
प्रकाशक: नीलम जासूस कार्यालय
प्रधान संपादक: सुबोध भारतीय
संपादक: राम पुजारी
                              तहकीकात पत्रिका

साथियों! बहुत वर्ष पूर्व जासूसी पत्रिकाएं बेहद प्रचलन में हुआ करती थी। लगभग सभी लेखकों की जासूसी कहानियां, अपराध कथाएं एवं उपन्यास इन पत्रिकाओं में छपा करते थे। पाठक भी इन पत्रिकाओं को खूब चाव से पढ़ा करते थे। एक ही पत्रिका में पाठकों को अलग-अलग कहानियों और उपन्यासों का आनंद मिल जाया करता था। समय बीतने के साथ ऐसी सभी पत्रिकाएं बंद हो गई। सिर्फ गिनी-चुनी अपराध कथाओं से जुड़ी पत्रिकाएं ही अपना वर्चस्व बचा पाईं हैं परंतु उनकी बिक्री भी क्रमशः घटती जा रही है।

आज इस पोस्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी ही नई जासूसी पत्रिका 'तहकीकात' के बारे में जिसके प्रथम अंक (प्रवेशांक) को नीलम जासूस कार्यालय ने दिसंबर 2021 माह में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया है। संपादकीय परामर्शदाता के रूप में परशुराम शर्मा, वेद प्रकाश कांबोज, आबिद रिजवी, योगेश मित्तल और वीरेंद्र कुमार शर्मा जैसी अनुभवी हस्तियों ने पत्रिका में अपना योगदान दिया है।

चलिए, बात करें अब तहकीकात पत्रिका के प्रवेशांक तथा इसमें प्रस्तुत की गई लेखन सामग्री के बारे में! 
प्रवेशांक की शुरुआत सुबोध भारतीय ने "सुनहरे दौर की वापसी" नामक आलेख द्वारा की है। इसके पश्चात राम पुजारी का संपादकीय आता है। 
फिर आता है 'शुभकामना संदेश' जिसमे विभिन्न पाठकों और प्रख्यात उपन्यासकार अमित खान ने तहकीकात पत्रिका के लिए अपनी शुभकामनाएं दी हैं तथा इस पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। 
इसके बाद चार जासूसी-अपराध कथाएं पढ़ने को मिलती हैं:
1. चरित्रहीन (मौलिक कहानी अहमद यार खान द्वारा उर्दू में रचित - इश्तियाक खां द्वारा हिंदी अनुवाद)
2. हत्यारा कौन (मौलिक कहानी मलिक सफदर हयात द्वारा उर्दू में रचित - इश्तियाक खां द्वारा हिंदी अनुवाद)
3. शराबी कातिल (वेद प्रकाश कंबोज द्वारा रचित)
4. रहस्यमयी खबरी (अंग्रेजी कहानी 'ए बर्गलर्स घोस्ट' - विकास नैनवाल द्वारा हिंदी अनुवाद)
कहानियों के मध्य पुराने दिग्गज उपन्यासकार श्री वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास "चीते की आंख" की समीक्षा प्रकाशित की गई है जिसे गुरप्रीत सिंह (गुरप्रीत जी साहित्य देश, विवेकानंद पुस्तकालय बगीचा नामक दो ब्लॉग चलाते है तथा उन पर पुस्तको की समीक्षा उनके बारे में जानकारी लेखकों की जानकारी इत्यादि उपलब्ध करवाते है) ने लिखा है।

फिर आता है पत्रिका का अंतिम भाग "सत्यबोध परिशिष्ट"। परिशिष्ट में पहले लेखक रोशनलाल सुरीरवाला की लघु कहानी "चील कौवे" प्रस्तुत की गई है। 
फिर हस्तीमल हस्ती, बशीर बद्र और राजेश रेड्डी जैसे शायरों की गजलों को स्थान दिया गया हैंl। 
इसके बाद सुबोध भारतीय की कहानी "अहसान का कर्ज" आती है। 
तत्पश्चात गोविंद गुंजन का आलेख "किताबों के दिन" है जिसमे उन्होंने अपनी यादों और लोकप्रिय साहित्य की किताबों के महत्त्व के बारे में बताया है। 
फिर डा. राकेश कुमार सिंह और जितेंद्र नाथ ने पुराने हिंदी उपन्यासकार जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के दो उपन्यासों "सांझ का सूरज" और "रुक जाओ निशा" की समीक्षा प्रस्तुत की है।
पत्रिका का समापन हास्य रस से होता है। बीच-बीच में एक-दो जगहों पर व्यंग्य का पुट भी दिया गया है।

कुल मिलाकर पत्रिका मनोरंजक लगी। प्रवेशांक की दृष्टि से लेखन सामग्री में विविधता देखने को मिलती है। चार कहानियां पुरानी हैं पर रोचक हैं। वेद प्रकाश कांबोज की कहानी उनकी लेखनी की याद ताजा कर देती है। 
सत्यबोध परिशिष्ट भी बढ़िया बन पड़ा है। "चील कौवे" कहानी न सिर्फ मार्मिक है बल्कि आज भी प्रासंगिक है। 'अहसान का कर्ज़' कहानी भी अच्छी लगी।

आज के इंटरनेट के युग में भी नीलम जासूस कार्यालय ने एक नई जासूसी पत्रिका को प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। नीलम जासूस कार्यालय का यह कदम सराहना योग्य है। फिलहाल नीलम जासूस कार्यालय की योजना इसे द्विमासिक पत्रिका के तौर पर प्रकाशित करने की है। 

यहां पर मैं दो बातें बताना चाहूंगा जो पत्रिका में ठीक की जाएं तो पत्रिका और भी बेहतर हो जायेगी। 
पहली बात - पत्रिका का मूल्य 150 रुपए मुझे अधिक लगा। पत्रिका में विज्ञापनों को प्रकाशित कर और पाठकों का आधार बढ़ाकर आगामी अंकों के मूल्य को कम किया जा सकता है। इससे आर्थिक लाभ में भी बढ़ोतरी होगी।
दूसरी बात - प्रवेशांक के कागज की गुणवत्ता साधारण ही लगी। आम पत्रिका में मुख्यत जो पेज होते हैं उसकी तरह पेज नही है जिसके कारण मुझे लगता है पत्रिका का मूल्य ज्यादा लगा। आगामी अंकों में गुणवत्ता को और अच्छा किया जाना चाहिए। 

उम्मीद हैं कि तहकीकात पत्रिका के आगामी अंक और भी मनोरंजक होंगे। हमारी कामना है कि पत्रिका को पाठकों का भरपूर प्यार मिले और पत्रिका भविष्य में भरपूर सफलता प्राप्त करे। हमारी शुभकामनाएं नीलम जासूस कार्यालय के साथ हैं।

अपने विचारों से कमेंट्स के द्वारा हमें अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 7.5/10

08 मार्च 2022

इच्छाधारी - अनिल मोहन

उपन्यास: इच्छाधारी
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 304

इच्छाधारी - देवराज चौहान और मोना चौधरी का पूर्व जन्म में खतरनाक हादसों का सफर!!

'इच्छाधारी' चार उपन्यासों की श्रृंखला का द्वितीय भाग है। इस श्रृंखला का प्रथम भाग 'देवदासी' है जिसकी समीक्षा हम कुछ समय पूर्व ब्लॉग पर शेयर कर चुके हैं। 

'देवदासी' उपन्यास में पेशीराम की भविष्यवाणी के अनुसार देवराज चौहान, मोना चौधरी और उनके साथी एक बार फिर पूर्व जन्म में प्रवेश कर जाते हैं तथा अपने-अपने स्तर पर विभिन्न प्रकार के खतरों का सामना करते हैं। मुख्यतः विष्णु सहाय नामक व्यक्ति इन सबके पूर्व जन्म में प्रवेश का माध्यम बनता है।

'इच्छाधारी' उपन्यास से लिया गया एक अंश: 
** "ये बाग, ये नजारा सब कुछ उसी की विद्या के तिलिस्म की देन है। यहां कई जगह उसने अपनी पसंद के खतरे तैयार कर रखे हैं जो कि देखने में, समझ में नहीं आएंगे। उन खतरों में फंस जाने के बाद वहां से बच पाना आसान नहीं। अनजान आदमी को जान से हाथ धोना पड़ता है।"
देवराज चौहान और जगमोहन की नजरें बाग में दूर-दूर तक गईं। 
"यहां नजर आने वाले वृक्षों पर लटकते फल खाने वाला बच नहीं सकता" **

'देवदासी' उपन्यास के अंत से कहानी को आगे बढ़ाते हुए 'इच्छाधारी' उपन्यास का आरंभ होता है उस दृश्य से, जहां देवराज (पूर्व जन्म में देवा) और सवा सौ वर्ष बाद मंत्र कीलित कैद से आजाद हुई देवदासी रानी अपने पूर्व जन्म की यादों में चले जाते हैं। जगमोहन (पूर्व जन्म में जग्गू) को भी सब याद आ जाता है। तभी वायुलाल की आवाज वहां गूंजती है जो रानी के आजाद होने से बहुत गुस्से में है तथा देवा, रानी और जग्गू को उनके बुरे अंजाम की चेतावनी देता है। देवा और रानी वायुलाल की आवाज को उसकी चेतावनी का जवाब देते हैं और फिर रानी के कहे अनुसार सांपनाथ की बस्ती का रास्ता ढूंढने के लिए आगे बढ़ जाते हैं। 

** "..... पता कर लूंगी मैं जल्दी ही। हमें यहां से सांपनाथ की बस्ती की तरफ चल देना चाहिए। अब हमारा एक-एक पल कीमती है।"
"चलेंगे कैसे?" 
जवाब में रानी की निगाह बाग में घूमने लगी। इस वक्त उसके चेहरे के भाव बदल गए थे। सतर्कता में लग रही थी वो कि तभी..... **

दूसरी तरफ एक अंधे कुएं में नगीना (पूर्व जन्म में बेला), रुस्तम राव (पूर्व जन्म में त्रिवेणी) और बांकेलाल राठौर को होश आता है जहां वो इच्छाधारी की करामात से आ पहुंचे थे। अचानक उन्हें समय नामक एक लड़के की आवाज आती है जो उन्हें अंधे कुएं से बाहर निकालता है। बाहर निकल कर तीनों को पता चलता है कि वो लोग एक वीरान से गांव में हैं जहां सिर्फ समय ही एक आखिरी मनुष्य बचा है और गांव के बाकी सब लोगों को राक्षस खा चुके हैं। जल्दी ही राक्षस समय को खाने के लिए भी आने वाला था। नगीना, रुस्तम और बांकेलाल डरे हुए समय को मदद का आश्वासन देते हैं। शीघ्र ही राक्षस समय को खाने के लिए आ पहुंचता है। समय जाकर झोंपड़ी में छुप जाता है जबकि नगीना, रुस्तम और बांकेलाल राक्षस का सामना करते हैं। परंतु उनके इस युद्ध का ऐसा दिल दहला देने वाला परिणाम निकलता है जिसकी कोई सपने में भी उम्मीद नहीं कर सकता था।

** उधर रुस्तम राव आहिस्ता से पेड़ से उतरा और तलवार संभाले शिकारी चीते की तरह उसे देखता दबे पांव उसकी तरफ बढ़ने लगा। कमर में उसने कटार फंसा रखी थी।
वो राक्षस बार बार चीखकर समय को सामने आने को कह रहा था। 
बांकेलाल राठौर और नगीना अपनी-अपनी जगहों पर छिपे राक्षस की हरकतों को पहचानने की चेष्टा कर रहे थे। **

तीसरी तरफ एक अन्य स्थान पर वायुलाल का पुराना सेवक गंगू अपनी नौका में मोना चौधरी (पूर्व जन्म में मिन्नो), पारसनाथ और महाजन (पूर्व जन्म में नीलसिंह) को नदी पार करवा रहा होता है। सोहनलाल (पूर्व जन्म में गुलचंद) भी इनके संग होता है। नौका के नदी किनारे पहुंचते ही वायुलाल मोना चौधरी और उसके साथियों से मिलता है। वायुलाल पहले उन्हें पूर्व जन्म की घटनाएं और ताजा हालात के बारे में बताता है तथा फिर उन सबको अपने महल में ले जाने का प्रस्ताव देता है। 

** कश्ती के बीचों-बीच लकड़ी का खिड़कियों वाला कमरा था जिसके भीतर मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन मौजूद थे। कश्ती उन सीढ़ियों के पास पहुंच चुकी थी। 
मिन्नो दुबारा जन्म लेकर, वायुलाल के पास सवा सौ बरस बाद पुनः आ पहुंची थी। **

देवराज चौहान पर वायुलाल के क्रोध की क्या वजह थी? 
क्या थी देवदासी रानी की पूर्व जन्म की कहानी? 
सांपनाथ कौन था और क्या उद्देश्य था उसका? 
देवराज, रानी और जगमोहन आखिर किस प्रयोजन से सांपनाथ की बस्ती की ओर बढ़ रहे थे? 
समय कौन था और वो राक्षस उसके पीछे क्यों पड़ा हुआ था? 
नगीना, रुस्तम, बांकेलाल तथा राक्षस के मध्य हुए युद्ध का ऐसा क्या दिल दहला देने वाला परिणाम निकला जिसने पूरे घटनाचक्र की दिशा ही बदल कर रख दी? 
वायुलाल मोना चौधरी और उसके साथियों को अपने महल में क्यों ले जाना चाहता था? 
आखिर इच्छाधारी का प्रयोजन क्या था? 
सांपनाथ किस तरह की दुविधा में फंस गया था? 
देवता मोमबांबा कौन था और क्या थी उसकी भूमिका? 
नागनाथ कौन था और क्या करने की फिराक में था? 
क्या देवराज, रानी, जगमोहन की मुलाकात नगीना, रुस्तम और बांकेलाल से हो सकी? 
देवराज, रानी और जगमोहन क्या सांपनाथ की बस्ती तक पहुंच सके? 
सुनेरा कौन था और ऐसी क्या विशिष्ट वस्तु रखी हुई थी उसके पास? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास में मिलेंगे!

पात्रों के बारे में बात की जाए तो पिछले उपन्यास के अधिकांश पात्रों के अलावा इस उपन्यास में आपको हुगली, मुंगेरा, सांपनाथ, दुदका, सुमित्रा, कुड़की, हुंडी, मुद्रानाथ, तूतका, छिंदड़ा, देवता मोमबांबा, सुनेरा, नागनाथ की उपस्थिति मिलेगी। 
उपन्यास के नए पात्रों में मुझे सांपनाथ, दुदका, कुड़की और हुंडी अच्छे लगे। देवता मोमबांबा थोड़े रहस्यमयी प्रतीत हुए। रानी का पूर्व जन्म का प्रसंग, बांकेलाल और रुस्तम का राक्षस से खतरनाक युद्ध, वायुलाल की विद्या, सांपनाथ का जानलेवा संघर्ष - ये सब पढ़ने में आनंद आया। जलेबी एक बार फिर इस उपन्यास में आपको नजर आएगी।

मेरे विचार से उपन्यास तेज रफ्तार, दिलचस्प और पठनीय है। उपन्यास में पात्रों की भूमिका तथा उनके संवादों के साथ-साथ माया, जादू और तिलिस्म का भरपूर उपयोग किया गया है जो पाठकों को बांधे रखता है। जिस प्रकार से कहानी में रहस्यों को परत-दर-परत पिरोया गया है और फिर एक-एक कर रहस्यों की परतें खुलती जाती हैं, यह बहुत मनोरंजक लगा। कहानी किस समय पर क्या मोड़ ले लेगी, इसका अनुमान लगा पाना भी काफी कठिन हो जाता है।

निःसंदेह कुछ रहस्य तो श्रृंखला के अगले उपन्यास "नागराज की हत्या" में ही खुलेंगे, वहीं आने वाले कुछ और रहस्य आगे की कहानी में रोचकता भी पैदा करेंगे! 

उपन्यास पढ़ने के बाद मुझे ऐसा लगा कि उपन्यास का मुखपृष्ठ (कवर) कहानी के अनुसार डिजाइन नही किया गया है । 
मुझे इस उपन्यास की कहानी में दो कमियां लगीं:
प्रथम कमी - मुख्य पात्र देवराज चौहान और मोना चौधरी इस उपन्यास में अधिक एक्शन में नजर नहीं आते हैं। इस उपन्यास में दोनों अपने साथियों से ज्यादातर सिर्फ बातचीत ही करते रहते हैं। देवराज चौहान और मोना चौधरी को अक्सर एक्शन में देखने की उम्मीद रखने वाले पाठक यहां थोड़े निराश हो सकते हैं।
द्वितीय कमी - पारसनाथ, महाजन और मोना चौधरी बार-बार वायुलाल से एक ही तरह की बातें दोहराते रहते हैं जो कि थोड़ा उबाऊ लगा।

अपने विचारों से कमेंट्स के द्वारा हमें अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8/10

02 मार्च 2022

देवदासी - अनिल मोहन

उपन्यास: देवदासी
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 272
कदम कदम पर मौत से भरी दीवानगी! हर कोई सामने वाले का गला काटकर जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधना चाहता था!

'देवदासी' चार उपन्यासों की श्रृंखला का प्रथम भाग है। इस उपन्यास से एक बार फिर देवराज चौहान और मोना चौधरी का पूर्व जन्म का सफर आरंभ हो रहा है जहां कदम-कदम पर नए जानलेवा हादसे उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

उपन्यास के मध्य से लिया गया एक अंश: 
** कोई और होता तो मन ही मन हिल जाता रात का ऐसा माहौल देखकर। 
देवराज चौहान की गंभीर निगाह हर तरफ जा रही थी। 
"कैसा लग रहा है देवा?" अब वो आवाज फुसफुसाहट की अपेक्षा स्पष्ट कानों में पड़ी। 
देवराज चौहान ने आवाज की दिशा की तरफ देखा तो कोई न दिखा। 
"तुम.. तुम यहां मुझे अपना रूप दिखाने...." **


उपन्यास के आरंभिक दृश्य में अचानक पेशीराम उर्फ फकीर बाबा की आवाज सुनकर कार चला रहा देवराज चौहान चौंक जाता है। पेशीराम उसे आने वाले खतरे की सूचना देकर अदृश्य हो जाता है। 

** "वक्त कम है देवा। सारे ग्रह केंद्रबिंदु पर पहुंचने शुरू हो चुके हैं। वो कभी भी अपना असर...।" 
"मैं जहां जा रहा हूं, वहां मेरा पहुंचना बहुत जरूरी...!"
"जिद ना कर देवा। तेरे को...!"
"अगर कोई और बात होती तो मैं एक दिन क्या, तेरे कहने पर दस दिन बंगले में बैठ जाता। लेकिन..." **

तभी देवराज की कार रास्ते में खराब हो जाती है। देवराज कार के इंजन की जांच में लग जाता है। उसी समय एक ट्रक बहुत तेज गति से देवराज की ओर आता है। विष्णु सहाय नाम का एक आदमी सही समय पर आकर देवराज को धक्का देकर ट्रक के रास्ते से हटा देता है। देवराज तो बच जाता है परंतु उसकी कार क्षतिग्रस्त हो जाती है। देवराज सहाय का आभार प्रकट करता है। सहाय उसे अपनी कार में साथ चलने का प्रस्ताव देता है जिसे देवराज मान लेता है। बातचीत के दौरान सहाय अपनी एक समस्या देवराज को बताता है कि उसकी गांव में पड़ी जमीन को कोई भी ठेकेदार समतल नही कर पा रहा। सहाय देवराज से पूछता है कि क्या वो उसकी कोई सहायता कर सकता है! देवराज फोन करने की बात कहकर कार से उतर जाता है। 

** "चलता हूं।" कहने के साथ ही देवराज चौहान ने दरवाजा खोला। 
"मतलब कि तुम इस मामले में मेरी कोई सहायता नहीं कर सकते?" विष्णु सहाय ने एकाएक कहा। 
"कल फोन करके बताऊंगा।" **

घर पहुंचने पर देवराज जगमोहन से विष्णु सहाय और पेशीराम की चेतावनी के बारे में विचार-विमर्श करता है। दूसरी तरफ बांकेलाल राठौर और रुस्तम को रास्ते में एक घायल सब-इंस्पेक्टर महेशपाल मिलता है। महेशपाल उन दोनों से अपनी जान बचाने की विनती करता है क्योंकि उसके पीछे कुछ गुंडे लगे होते है। बांके और रुस्तम पहले तो साफ मना कर देते हैं, फिर गुंडों को देखने के बाद महेशपाल को अपने साथ ले लेते हैं ताकि उसे कुछ समय के लिए एक सुरक्षित ठिकाना दे सकें। 

** वो तीनों जैसे गुस्से से भरे, किसी को ढूंढ रहे थे। 
"लफड़ा होएला बाप!" 
बांकेलाल राठौर ने सीट पर पड़े पुलिस वाले को देखा। 
"भयो खाकी वर्दी!" बांकेलाल राठौर ने... **

इधर एक अन्य समानांतर दृश्य में बाजार में एक चोर मोना चौधरी का पर्स छीनकर भाग जाता है। मोना उसका पीछा करती है। रास्ते में एक हवलदार वीरेंद्र चोर को पकड़ लेता है। मोना अपना पर्स वापस मांगती है पर उसकी वीरेंद्र से बहस हो जाती है और वीरेंद्र उन दोनों को पुलिस स्टेशन ले जाता है। वहां इंस्पेक्टर लोकनाथ मोना को पहचान लेता है और एक प्रस्ताव देता है कि वो मोना को जाने देगा अगर मोना उसकी एक समस्या हल कर दे। मोना किसी तरह वहां से निकल आती है। 

** "जाओ।" लोकनाथ ने गंभीर स्वर में कहा - "मैं तुम्हे रोकूंगा नही।" 
मोना चौधरी ने दरवाजे की तरफ हाथ बढ़ाया कि लोकनाथ कह उठा।
"इंस्पेक्टर लोकनाथ कहते है मुझे। मन करे तो फोन कर देना।..." **

सब घटनाओं के तार कुछ इस प्रकार से आपस में जुड़ते हैं कि देवराज, जगमोहन, बांके, रुस्तम, सोहनलाल, नगीना और मोना, पारसनाथ, महाजन एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं और घटनाओं के चक्र में बुरी तरह उलझ जाते हैं। सब उसी रास्ते पर आगे बढ़ते चले जाते हैं जो उनके पूर्व जन्म की ओर जाता है।

विष्णु सहाय की गांव में खरीदी हुई जमीन समतल क्यों नही हो पा रही थी? 
क्या देवराज चौहान ने विष्णु सहाय की मदद की? 
इस बार देवराज, मोना और इनके साथियों के रास्ते एक कैसे हुए? 
कहां से आई प्रेमा और उसने क्या हरकतें की? 
पूर्व जन्म का रास्ता कैसे खुला और किसने खोला? 
कौन थी रानी और क्या इच्छा थी उसकी? 
वायुलाल कौन था और क्या उद्देश्य था उसका? 
जलेबी की क्या भूमिका थी और वो क्या चक्कर चला रही थी? 
सत्तू कौन था, कहां से आया और क्या चाहता था? 
इस बार पूर्व जन्म में देवराज और मोना का टकराव किस तरह के खतरों से होने वाला था? 
किस प्रकार देवराज, मोना और इनके साथी पूर्व जन्म में आने वाले खतरों का सामना कर सके? 
इन सब सवालों के उत्तर पाने के लिए आपको यह उपन्यास पढ़ना होगा!

चलिए, अब कहानी की बात की जाए! उपन्यास में पूर्व जन्म की कहानी की शुरुआत बढ़िया हुई है। कहानी घुमावदार होने के साथ-साथ तेज रफ्तार भी है। पूर्व जन्म के खतरों और रहस्यों के बारे में पढ़ना रोचक रहा। देवदासी उपन्यास का अंत अगले भाग "इच्छाधारी" को पढ़ने के प्रति एक उत्सुकता सी जगाता है।
इस उपन्यास में आपको दोनों मुख्य पात्रों देवराज चौहान, मोना चौधरी के अतिरिक्त जगमोहन, सोहनलाल, बांकेलाल राठौर, रुस्तम राव, नगीना, पारसनाथ, महाजन, विष्णु सहाय, जमींदार, सत्तू, प्रेमा, रानी, जलेबी, वायुलाल इत्यादि पात्र भी पढ़ने को मिलेंगे। 
देवराज और जगमोहन ने कहानी में बेहतरीन मनोरंजन किया है। मोना चौधरी अपने चिर-परिचित अंदाज में दिखी। उपन्यास में अधिकतर पात्रों के संवाद और उनकी भूमिका अच्छी बन पड़ी है खासकर बांकेलाल राठौर के संवाद, नगीना की एंट्री, रानी की बातें, सत्तू के तेवर और जलेबी का चक्कर। 

मुझे कहानी में एक कमी ये महसूस हुई कि लेखक ने देवराज और मोना को एक साथ पूर्वजन्म के रास्ते पर लाने के लिए जिस तरह से घटनाओं का आपस में तालमेल बिठाया, वो कुछ कमजोर लगा। 

उपन्यास का मुखपृष्ठ (कवर पेज) सामान्य ही लगा। उपन्यास में शाब्दिक गलतियां काफी कम हैं जिस कारण उपन्यास पढ़ते समय और भी अच्छा महसूस होता है। 

मेरे अनुसार अनिल मोहन के प्रशंसकों के लिए तो ये उपन्यास पठनीय है ही। अगर माया, जादू और तिलिस्म में रुचि है तो अन्य पाठक भी इस उपन्यास को पढ़कर अपना मनोरंजन कर सकते हैं।

हमें अपने विचारों से कमेंट्स के द्वारा अवश्य अवगत करवाएं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8/10

22 फ़रवरी 2022

लौट आया नरपिशाच - देवेंद्र प्रसाद

उपन्यास: लौट आया नरपिशाच 
श्रेणी: हॉरर (डर, भूत-प्रेत-पिशाच)
लेखक: देवेंद्र प्रसाद 
पेज संख्या: 194 (किंडल)

                         बुक कवर 

लेखक देवेंद्र प्रसाद ने वर्ष 2020 में "हॉरर/डर" श्रेणी में "नरपिशाच समीक्षा" नामक पुस्तक (कहानी संग्रह) लिखी थी जिसकी समीक्षा हम पहले ही पोस्ट कर चुके हैं। "लौट आया नरपिशाच" इसी कहानी संग्रह को और अधिक विस्तार देते हुए लेखक द्वारा उपन्यास के रूप में लिखा गया है।

उपन्यास से लिया गया एक छोटा सा अंश: 
रात के बारह बज चुके थे। कोहरा शाम से ही छाने लगा था। अंधेरे ने काली चादर फैलाकर अपना साम्राज्य कायम कर लिया था। चर्च के कब्रिस्तान के साथ-साथ पूरा इलाका अंधेरे में डूब चुका था। हवाओं का उग्र रूप इस कदर हावी था , जैसे वह आज कोई बड़ी अनहोनी का न्योता दे रहा हो। 
वह उस वीराने में जो इकलौता चर्च था, वो उस कब्रिस्तान में पड़ता था... 

इस उपन्यास का आरंभ होता है वर्ष 1995 में कब्रिस्तान के साथ बने एक जर्जर चर्च के दृश्य से जहां फादर डिकोस्टा अपने बच्चे एंथनी के साथ रहते हैं और चर्च की सेवा में नियुक्त है। अमावस्या की रात में बेहद खराब मौसम के मध्य अचानक दरवाजे पर तेज थपथपाहट सुनकर फादर डिकोस्टा दरवाजा खोलता है पर सामने किसी को न पाकर हैरान हो जाता है। अचानक दूर कहीं रोने की आवाज सुनकर मन ही मन थोड़ा डरा हुआ फादर डिकोस्टा उस दिशा में आगे जाता है। रोने की आवाज वाली जगह पर पहुंचते ही फादर डिकोस्टा के साथ एक ऐसा वीभत्स मंजर घटित होता है कि उनकी जान पर बन आती है। 

क्षण भर में ही वह दृश्य उनकी आँखों में कैद हो चुका था। उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं और उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि जैसे उसके प्राण हलक में आकर फँस गए हों। उसने जो देखा था, उस पर विश्वास करना किसी के लिए भी आसान नहीं था। इसी वजह से उसके पाँव वहीं के वहीं जम गए थे। 

24 साल बाद वर्ष 2019 में एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी का मालिक विश्वनाथ सिंह पाटिल, केविन मार्टिन नाम के एक डिटेक्टिव को चौहड़पुर नामक जगह पर एक गुप्त मिशन पर भेजता है। केविन का मिशन चौहड़पुर में एक भयानक नरपिशाच के बारे में फैली हुई अफवाहों की सच्चाई का पता लगाना है जो कि अनेक वर्षों से वहां डर और आतंक का कारण माना जाता है। 

विश्वनाथ सिंह पाटिल बोला, “लुक केविन , तुम्हें अब सबसे बड़ी चुनौती देने जा रहा हूँ। बात यह है कि तुम्हें जहाँ भेजा जा रहा है , उस जगह तुम्हारी जान जाने का भी खतरा भी हो सकता है क्योंकि वहाँ के आस-पास के कई गाँवों तक किसी नरपिशाच का साया है। 

अब तक 49 केस हल कर चुका केविन एक आत्मविश्वास से परिपूर्ण और आधुनिक विज्ञान में विश्वास करने वाला डिटेक्टिव है। केविन चौहड़पुर के लिए ड्राइवर लखविंदर सिंह की टैक्सी बुक करता है। चौहड़पुर पहुंचकर नकली नाम मार्टिन डिसूजा का इस्तेमाल कर चौहड़पुर के भव्य सेंट पॉल चर्च के फादर से मिलता है। फादर उसका परिचय एक युवती जेनेलिया से करवाते हैं जो चर्च की सार-संभाल में फादर की सहायता करती है। 

वहाँ फ़ादर एंथनी डिकोस्टा और केविन के सिवा कोई भी नहीं था। उन सभी के जाने के साथ ही एक युवती ने वहाँ प्रार्थना भवन में प्रवेश किया। उसे देखते ही फ़ादर एंथनी डिकोस्टा बोले, “केविन! इनका नाम जेनेलिया है और यहाँ इसी चर्च में पहली मंजिल पर ही रहती हैं।" 

यहीं से केविन अपनी जांच पड़ताल शुरू कर देता है ताकि इन सब अफवाहों की जड़ तक जल्दी से जल्दी पहुंच सके। जैसे-जैसे केविन इस मामले को समझने और हल करने की कोशिश करता है, वैसे-वैसे ही वो और अधिक उलझता चला जाता है और उसे एक अनजाने खतरे का आभास होने लगता है । जहां कुछ लोग उसके शक के दायरे में आते हैं, वही कुछ घटनाएं ऐसी भी घटती हैं जो उसका दिमाग घुमाकर रख देती हैं।

उन्होंने उसकी नब्ज टटोली तो उसमें भी कोई हलचल नहीं पाई। वह काफी चिंतित हो गए। वह लगभग आश्चर्य और डर के मिश्रित स्वर में बोला , “इसका हर अंग किसी मुर्दे की तरह बिल्कुल ही सुन्न है। यह संभव नहीं हो सकता , बिल्कुल भी नहीं।” 

आखिर क्या हुआ था फादर डिकोस्टा के साथ उस रात? 
फादर डिकोस्टा के बच्चे एंथनी का क्या हुआ? 
केविन की चौहड़पुर तक की यात्रा में क्या-क्या घटित हुआ? 
चौहड़पुर में इस मिशन पर काम करते समय ऐसा क्या हुआ जिसने केविन को उलझाकर रख दिया? 
क्या था सेंट पॉल चर्च का इतिहास? 
क्या रहस्य था काली बिल्ली का? 
क्या था वो अनजान खतरा जिसका आभास तो केविन को हो रहा था पर वो उसे समझ नही पा रहा था? 
कौन थी जेनेलिया और क्या थी उसकी कहानी? 
क्या वास्तव में चौहड़पुर में कोई नरपिशाच आतंक मचा रहा था या फिर ये मात्र एक अफवाह थी? 
अगर वास्तव में कोई नरपिशाच था तो क्या केविन उस नरपिशाच का खात्मा कर सका?
क्या चौहड़पुर जैसी अंजान जगह पर केविन को कहीं से कोई सहायता प्राप्त हो पाई? 
इन सब सवालों के उत्तर पाने के लिए आपको यह उपन्यास पढ़ना होगा!

आप इस उपन्यास में मुख्य पात्र केविन मार्टिन के अलावा कई और पात्रों से रूबरू होंगे जैसे कि फादर डिकोस्टा, एंथनी, विश्वनाथ पाटिल, लखविंदर सिंह, विजय, आलिया, थॉमस, जेनेलिया, जॉनी, विलियम तथा साथ ही कुछ और रहस्मयी पात्रों से भी। उपन्यास में मुझे केविन, लखविंदर सिंह और फादर के पात्र बढ़िया लगे। जेनेलिया तथा थॉमस के पात्र भी कहानी के हिसाब से उपयुक्त लगे। अन्य पात्र सामान्य लगे।

अब उपन्यास की बात करें तो हॉरर श्रेणी में यह एक बढ़िया उपन्यास है। कहानी अच्छी है और कई अलग-अलग मोड़ों से गुजरती हुई रोमांचक तरीके से समाप्त होती है। खासकर कहानी की शुरुआत, कहानी में केविन की लखविंदर सिंह के साथ टैक्सी में यात्रा वाला भाग तथा कहानी का अंतिम भाग तो मजेदार बन पड़ा है। उपन्यास का लेखकीय भी पठनीय है। 

उपन्यास में मुझे सिर्फ एक ही कमी लगी कि कुशाग्र बुद्धि केविन चौहड़पुर में केस की जांच-पड़ताल करने में कई महीनों का समय लगा देता है, जिस कारण कहानी का ये प्रसंग कुछ खिंच सा जाता है। ये जरा सही नहीं लगा। इसके अलावा कहानी कहीं भी अपनी पकड़ नही खोती है।

यह उपन्यास वर्ष 2021 में प्रथम बार प्रकाशित हुआ था। उपन्यास के किंडल एडिशन की गुणवत्ता अच्छी है और शाब्दिक गलतियां भी बेहद कम हैं। 

मेरा विश्वास है कि हॉरर उपन्यासों के प्रेमी पाठक इस उपन्यास को पढ़कर निराश नहीं होंगे। 

कमेंट्स के द्वारा अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 7.5/10

19 फ़रवरी 2022

पहरेदार - अनिल मोहन

उपन्यास: पहरेदार
लेखक: अनिल मोहन
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
पेज संख्या:240

         एक उपन्यास और दो कहानियाँ - एक पूरी, एक अधूरी।

अनिल मोहन द्वारा लिखित उपन्यास 'पहरेदार' एक ऐसा उपन्यास है जिसमे दो‌ अलग-अलग कहानियाँ है जो कि देवराज चौहान के कारण एक बार आपस में मिलती हैं और फिर अलग-अलग हो जाती हैं।
यहां पर विशेष बात ये है कि मुख्य कहानी जो कि एक इंस्पेक्टर सूरज यादव पर केन्द्रित है, वो तो इसी उपन्यास में संपूर्ण हो जाती है परंतु देवराज चौहान वाली कहानी अधूरी ही रह जाती है।

उपन्यास  से लिया गया एक अंश:
* गृहमंत्री जी ने इंटरकॉम पर अपने सिक्योरिटी चीफ इंस्पेक्टर सूरज यादव को बुलाया। 
इंस्पेक्टर सूरज यादव दिल्ली पुलिस का होनहार, बेहद सख्त और अपने फर्ज को जान पर भी खेलकर अंजाम देने वालों में से था। सूरज यादव की काबलियत को पहचानने पर ही, उसका रिकॉर्ड देखने के पश्चात ही गृहमंत्री जी ने उसे अपनी सेवा में लिया था। उनकी सुरक्षा में ढेर सारे खतरनाक कमांडोज थे। लेकिन गृहमंत्री जी को इंस्पेक्टर सूरज यादव पर पूरा भरोसा था। *

'पहरेदार' एक ऐसे जाबांज इंस्पेक्टर की कहानी है जो सत्य के लिए गृहमंत्री तक को गोली मारने से पीछे नहीं हटता। CBI का एक एजेंट सूरज यादव उन ‌लोगों की तलाश में है जो भारत की आंतरिक ‌सुरक्षा से जुङी महत्वपूर्ण फाइलें अन्य देशों तक पहुंचाते हैं। 

इसी सिलसिले में जांच करते हुए सूरज यादव देश के गृहमंत्री से भी जा टकराता है। सूरज यादव की जिंदगी का यही निर्णय, गृहमंत्री से टकराना, उसके जीवन में तूफान खड़ा कर देता है। सूरज यादव गृहमंत्री पर इल्जाम तो लगा देता है पर उसे सही साबित नहीं कर पाता। इस चक्कर में उसकी नौकरी पर भी तलवार लटक जाती है । दूसरी तरफ गृहमंत्री से छीने गये महत्वपूर्ण कागजात भी सूरज डकैती मास्टर देवराज चौहान को गलतफहमी में सौंप देता है।

यही से ये कहानी एक नया मोड़ ले लेती है और सूरज यादव के मित्र इंस्पेक्टर मेहता की जान भी चली जाती है। अपने मित्र की मौत का बदला लेने के लिए, स्वयं को बेगुनाह साबित करने के लिए और असली मुजरिम को सामने लाने के लिए सूरज यादव जा टकराता है कानून के दुश्मनों से!!

द्वितीय कहानी है देवराज चौहान द्वारा एक गोल्ड वाॅल्ट को लूटने की लेकिन यह कहानी इस उपन्यास में पूर्ण ही नहीं होती‌। उपन्यास में इस कहानी का सिर्फ कुछ आधार ही बताया गया है।

"एक वजह से गोल्ड वाॅल्ट में आज तक डकैती करने की किसी की हिम्मत नहीं हुयी और वह वजह थी बीस फीट की गैलरी। सारी सुरक्षा व्यवस्था तोङकर अगर गोल्ड वाॅल्ट के भीतर पहुंच भी जाया जाए तो बीस फीट की गैलरी रूपी मौत के रास्ते को पार करके वाल्ट के उस दरवाजे तक नहीं पहुंचा जा सकता, जिसके पास करोड़ों अरबों की दौलत मौजूद है।"

क्या इंस्पेक्टर सूरज यादव अपनी नौकरी को बचा सका?
क्या सूरज यादव को वो कागजात देवराज चौहान से हासिल हो सके?
आखिर इस षड्यंत्र के पीछे कौन था जो देश के महत्वपूर्ण कागजात गद्दारों को दे रहा था?
क्या देवराज चौहान ने उन कागजातो का फायदा उठाया या उन्हे सही हाथो में पहुंचाया?
इन सभी सवालों के आपको जवाब मिलेंगे पहरेदार उपन्यास को पढ़ कर..

उपन्यास में एक जासूस की जिंदगी को लेकर बहुत अच्छी बात कही गई है -
"हम लोग जिस धंधे में हैं, उसमें तभी तक जिंदगी बची रह सकती है जब तक मन की बात मन में रहे। सीक्रेट एजेंट उस वक्त तलवार की धार पर आ बैठता है जब उसकी मूवमेंट की खबर दुश्मनों को मिलने लगती है।"

उपन्यास में अगर गलतियों की बात करें तो बहुत ज्यादा गलतियाँ नजर आती है जो कि एक अच्छी-खासी कहानी को भी खराब कर देती है:

1. इस उपन्यास को जबरन देवराज चौहान सीरीज का उपन्यास बनाने की कोशिश की गयी है। जबकि इसे सिर्फ थ्रिलर के तौर पर प्रस्तुत किया जाता तो भी  बढ़िया था।
2. उपन्यास में दो कहानियाँ हैं - मुख्य कहानी सूरज यादव की व दूसरी कहानी देवराज चौहान की। सूरज यादव की कहानी इस उपन्यास में खत्म हो जाती है, वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।
3. उपन्यास में खलनायक का किरदार बहुत कम व बहुत कमजोर दिखाया गया है। गृहमंत्री से दुश्मनी करने वाला मात्र एक सामान्य सा व्यक्ति बन कर रह गया।
4. सूरज यादव CBI का एक होनहार एजेंट है, पर वह गृहमंत्री वाले केस में निर्णय ऐसे लेता है जैसे कोई अति उत्साहित नवयुवक हो।
5. अगर ये प्वाइंट बताता हूं तो उपन्यास के बारे में स्पॉइलर होगा जो की नही होना चाहिए। अगर आप उपन्यास को पढ़ते हैं तो अंत के क्लाइमेक्स में आप उसे देख सकते है।

अनिल मोहन के पहरेदार उपन्यास का द्वितीय भाग  सुलग उठा बारूद है, लेकिन दोनों उपन्यासों का मुझे आपस में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
जहां  पहरेदार  में सूरज यादव की कहानी खत्म हो जाती है वहीं देवराज चौहान की कहानी  सुलग उठा बारूद में समाप्त होती है। सुलग उठा बारूद उपन्यास अभी तक अप्रकाशित है। जिसके बारे में आपको अगली पोस्ट में सूचित कर देंगे।

उपरोक्त लिखित गलतियों को नजरअंदाज करते हुए अगर समग्र दृष्टि से देखे तो कहानी के स्तर पर प्रस्तुत उपन्यास बहुत रोचक है। रोचकता भी ऐसी कि पाठक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता। यहाँ तक कि देवराज चौहान के आगमन से उपन्यास में रोचकता और भी बढ जाती है।
अनिल मोहन व देवराज चौहान के प्रशंसकों के लिए यह एक पठनीय उपन्यास है।

रेटिंग: 7/10

14 फ़रवरी 2022

27 सेकेंड - अनिल मोहन


उपन्यास: 27 सेकंड 
उपन्यास सीरीज: देवराज चौहान सीरीज
लेखक: अनिल मोहन 
पेज संख्या: 270
 
                         उपन्यास कवर 

"उस तबाही को आने में सिर्फ 27 सेकंड ही बचे थे"
उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर पेज) पर प्रिंट की गई उपरोक्तलिखित टैग लाइन एक उत्सुकता सी जगाती है!

उपन्यास से लिया गया एक छोटा सा अंश: 
** "गुड! जैसा हमने प्लान बनाया था, वैसा ही हो रहा है।" घड़ी में से निकली आवाज कानों में पड़ी।
"यस सर।" 
"कार पर नजर रख रहे हो?" 
"जब तक वो चिप उसके कपड़ों में है, वो मुझे स्क्रीन पर नजर आता रहेगा।" **

इस उपन्यास का आरंभ होता है मार्केट की गैलरी के एक दृश्य से, जहां कुछ गुंडों से बचकर भाग रहा एक डरा-घबराया हुआ आदमी एक मोड़ पर मुड़ते ही वहां खड़े देवराज चौहान से टकरा जाता है और दोनो नीचे गिर पड़ते हैं। देवराज उससे भागने का कारण पूछता है और कारण जानने के बाद उस व्यक्ति को बचाने के लिए देवराज उसे छुपा देता है। जगमोहन के वापिस आते ही वो तीनों वहां से निकल जाते हैं। 

** "नही। मैने कोई गलत काम नहीं...।"
"कार में बैठ जाओ।" 
वो अनिश्चित सा खड़ा देवराज चौहान को देखता रहा। देवराज चौहान उसे। 
कुछ पल बीते कि वो व्यक्ति एकाएक कार की तरफ दौड़ा और पीछे वाला दरवाजा खोलकर फुर्ती से भीतर जा बैठा। दरवाजा बंद कर लिया। **

आगे वार्तालाप के दौरान वो व्यक्ति अपना नाम हर्षा यादव बताता है। एक सुरक्षित जगह पहुंचकर हर्षा दोनो को अपनी साथी मीनाक्षी से मिलवाता है। कुछ हिचकिचाहट के बाद हर्षा पूरा मामला देवराज और जगमोहन को बताना शुरू करता है। इस दौरान हर्षा जैसे ही जॉर्ज लूथरा और उसकी एक खतरनाक साजिश के बारे में बताता है, देवराज और जगमोहन चौंक उठते है। जॉर्ज लूथरा का नाम तथा पूरा मामला सुनने के पश्चात देवराज गंभीर हो जाता है। फिर देवराज इस बारे में कुछ करने का हर्षा और मीनाक्षी को आश्वासन देता है। 

** "फोन पर खबर कर देंगे।" जगमोहन ने कहा।
"कब तक?"
"एक-दो दिन में।" देवराज चौहान उठता हुआ बोला - "तुम्हारे पास हमारा फोन आ जाएगा कि काम हो सकता है या नही। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।" **

वहीं दूसरी तरफ सिक्का नाम का एक आदमी सोहनलाल से मिलता है और एक डकैती के सिलसिले में बात करने के लिए देवराज चौहान से मिलना चाहता है। सोहनलाल सिक्का की बात सुनने के बाद उसे कहता है कि पहले वो देवराज से इस बारे में बात करेगा और फिर उससे मिलेगा। सिक्का सोहनलाल की बात मान लेता है। सोहनलाल जगमोहन और देवराज चौहान से इस बारे में बात करने के लिए मिलता है। 

** सिक्का ने उसकी आंखों में झांका। 
"क्या मतलब?" 
"अगर इस काम के लिए देवराज चौहान तैयार हुआ तो फिर बात करूंगा तेरे से।" 
"तो ऐसा बोल।" मुस्करा पड़ा सिक्का - "देवराज चौहान तैयार... **

तो साथियों, यहां से शुरू होता है एक जानलेवा टकराव जिसमें दोनों तरफ से शातिर खिलाड़ी मैदान में उतर आते हैं और एक दूसरे को पराजित करने के लिए चाल पर चाल चलते हैं। टकराव आगे बढ़ने के साथ चुनौतियां और जान जाने का खतरा भी हर पल बढ़ता चला जाता है।

कौन थे हर्षा यादव और मीनाक्षी? वो गुंडे हर्षा के पीछे क्यों लगे थे? 
जॉर्ज लूथरा कौन था? उसका नाम सुनकर देवराज चौहान और जगमोहन चौंक क्यों उठे? 
हर्षा यादव और मीनाक्षी की पूरी बात सुनने के बाद देवराज चौहान ने क्या योजना बनानी आरंभ की? 
सिक्का किस डकैती के सिलसिले में सोहनलाल के माध्यम से देवराज चौहान से मिलना चाहता था? 
आखिर ये 27 सेकंड का क्या चक्कर था? ये 27 सेकंड  इतने महत्त्वपूर्ण क्यों थे और किस योजना में किसके द्वारा इनका उपयोग किया जाना था? 
क्या अंजाम हुआ इस जानलेवा टकराव का? 
किस-किस को अपनी जिंदगी गंवानी पड़ी इस टकराव में?
देवराज और जगमोहन के लिए खतरा इतना अधिक कैसे बढ़ गया? 
इस टकराव के समानांतर ही ऐसा और क्या घटित हो रहा था जिसे स्वयं देवराज, जगमोहन और सोहनलाल भी समझ नही पा रहे थे?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको यह उपन्यास पढ़कर मिल सकते हैं। 

कुल मिलाकर उपन्यास पढ़ने में बढ़िया लगा। उपन्यास में कई जगह रोमांचक मोड़ आते हैं। कहानी तेज गति और सस्पेंस से परिपूर्ण है। देवराज, जगमोहन और सोहनलाल का दुश्मन से टकराव अच्छा बन पड़ा है। दुश्मन द्वारा चली जाने वाली चालें और चालें चलने का तरीका पसंद आया। 

उपन्यास में आप देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल के साथ हर्षा यादव, रामदेव, मीनाक्षी, विनायक, सिक्का, जॉर्ज लूथरा, राजन, विम्मी, धींगड़ा, मुसीबर खान, पाटे खान, नूरा, साजन सिंह, राजा, सूरी इत्यादि पात्रों से मिलेंगे। हर्षा और मीनाक्षी के पात्र बढ़िया लगे। अन्य पात्र भी अपनी जगह ठीक लगे।

उपन्यास का मुखपृष्ठ (कवर पेज) कहानी के अनुरूप ही डिजाइन किया गया है। सफेद कागज पर उपन्यास की प्रिंटिंग अच्छी की गई है और शाब्दिक गलतियां भी अधिक नहीं हैं। 

मेरे विचार से अनिल मोहन का यह उपन्यास पाठकों को एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए। उपन्यास पढ़ते समय कहीं ठहराव या बोरियत का अनुभव होने की संभावना कम ही है।

कमेंट्स के द्वारा हमें अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8/10

08 फ़रवरी 2022

हिंदी पल्प फिक्शन में प्रेत लेखन का नंगा सच - योगेश मित्तल


पुस्तक: हिंदी पल्प फिक्शन में प्रेत लेखन का नंगा सच 
पुस्तक श्रेणी: आत्मकथा 
लेखक: योगेश मित्तल 
पृष्ठ संख्या: 268 
प्रकाशक नीलम जासूस कार्यालय 
पुस्तक लिंक: प्रेत लेखन

                       प्रेत लेखन का नंगा सच पुस्तक 

प्रिय साथियों! इस पोस्ट में हम आपको "हिंदी पल्प फिक्शन में प्रेत लेखन का नंगा सच" पुस्तक के बारे में बताने जा रहे हैं। सबसे पहले तो प्रेत लेखन का मतलब समझ लेते हैं। 
प्रेत लेखन (घोस्ट राइटिंग) - जब एक लेखक किसी और प्रख्यात लेखक के नाम से उसके उपन्यास लिखता है अथवा किसी प्रकाशक द्वारा रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क लेखक के नाम से उपन्यास लिखता है तो उस लेखक को स्वयं की कोई पहचान नहीं मिल पाती है। ऐसे लेखक को प्रेत लेखक अथवा भूत लेखक कहते हैं और ऐसे लेखन को प्रेत लेखन कहा जाता है। 

यह पुस्तक लोकप्रिय हिंदी साहित्य (लुगदी उपन्यास) क्षेत्र में एक लंबे समय से उपन्यास लिखते आ रहे लेखक योगेश मित्तल द्वारा लिखी गई है। 
जी हां! वैसे तो ये पुस्तक एक आत्मकथा है परंतु पढ़ते समय कई जगह ये एक उपन्यास का रूप ले लेती है। पुस्तक का नाम तो हटकर है ही, लेखक का नाम पढ़कर भी एकबारगी उत्सुकता जाग उठती है। जहां लोकप्रिय हिंदी साहित्य (लुगदी उपन्यास) के कई पाठक इनका नाम जानते होंगे, वही बहुत से पाठकों को जिज्ञासा भी हो रही होगी कि ये योगेश मित्तल कौन है ! 

तो साथियों! योगेश मित्तल स्वयं एक बहुत लंबे अरसे तक प्रेत लेखक के रूप में कार्यरत रहे हैं। जहां इन्होंने अनेकों उपन्यासकारों और प्रकाशकों द्वारा रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क के लिए प्रेत लेखक के रूप में पूरे के पूरे उपन्यास लिखे हैं, वहीं बहुत से ऐसे उपन्यासों में अपना योगदान भी दिया है जहां लेखकों ने कम पन्नों के उपन्यास लिखे थे अथवा किन्ही कारणवश वे उपन्यास पूरा नहीं कर पाए थे। 

इस आत्मकथा के जरिए योगेश जी ने हिंदी लोकप्रिय साहित्य के इतिहास के पन्नों में से एक ऐसे काले और बेहद कड़वे सच "प्रेत लेखन" को सामने लाने का प्रयास किया है जिससे प्रकाशकों ने अपने समय में बहुत लाभ उठाया परंतु इसी प्रेत लेखन ने बहुत से प्रतिभाशाली लेखकों को गुमनामी के अंधेरे से बाहर नहीं निकलने दिया। इसके बारे में लेखन जगत और प्रकाशन जगत के बहुत से लोग जानते तो थे परंतु बोलने, स्वीकारने और कोई ठोस कदम उठाने की हिम्मत शायद ही किसी में थी। 

अब आते हैं पुस्तक पर! अपनी आत्मकथा का आरंभ योगेश जी ने "अनकही" से किया है जिसमें उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना रखी है तथा स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया है कि इस आत्मकथा में उनके प्रेत लेखन जीवन का कितना हिस्सा मौजूद है। पुस्तक में योगेश मित्तल के बारे में कुछ प्रसिद्ध उपन्यासकारों के निजी विचारों को भी जगह दी गई है।
इसके बाद योगेश जी ने अपने बचपन, अपने परिवार, घर की स्थिति और आस-पड़ोस के बारे में बताया है! फिर विस्तारपूर्वक बताया है कि कैसे उनके लेखकीय जीवन की शुरुआत हुई, लुगदी साहित्य से किस प्रकार उनका नाता जुड़ा, किस प्रकार वो बहुत से प्रकाशकों और लेखकों से मित्रतापूर्ण तथा घनिष्ठ संबंध स्थापित कर पाए, कैसे दिल्ली और मेरठ के प्रकाशन संस्थानों ने सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ! 
इन्ही सब अनुभवों के मध्य योगेश जी ने ये भी अच्छे से बताया है कि प्रेत लेखन क्यों और कैसे आरंभ हुआ, कैसे प्रेत लेखन से प्रकाशकों ने बड़ा लाभ उठाया, कैसे प्रेत लेखन बहुत से लेखकों के लिए नुकसानदायक साबित हुआ, कैसे वो स्वयं प्रेत लेखन से जुड़े, कैसे प्रेत लेखन के प्रचलन में लेखकों का भी मूक योगदान था, कैसे लुगदी साहित्य का पतन हुआ इत्यादि। साथ ही पुस्तक में योगेश जी ने कई प्रसिद्ध लेखकों के प्रति अपने भावनात्मक विचार व्यक्त किए हैं और यह भी बताया है कि किस प्रकार उनका जीवन कहीं न कहीं इन लेखकों से प्रभावित हुआ। कुछ गिनी-चुनी जगहों पर योगेश जी ने प्रकाशन संस्थानों में छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों की चर्चा भी की है।

कुल मिलाकर पुस्तक पढ़ने में मनोरंजक है और लुगदी साहित्य से संबंधित ऐसी बहुत सी जानकारियां देती है जो शायद आपने पहले नहीं पढ़ी होंगी। पुस्तक में ऐसे बहुत सारे प्रेत लेखकों और उनसे संबंधित उपन्यासों के नाम मिलेंगे जो आपने पहले सुने नही होंगे। पुस्तक पढ़ने पर आप एक बार तो हैरान होंगे कि स्वयं योगेश मित्तल जी ने कितना अधिक प्रेत लेखन किया है और किन-किन लेखकों के लिए प्रेत लेखन किया है! ये भी जानने को मिलेगा कि कैसे कुछ प्रसिद्ध उपन्यासकारों को भी आरंभ में प्रेत लेखन करना पड़ा था। 

पुस्तक में कमी ये लगी कि कुछ बातों को लेखक ने कई जगहों पर दोहराया है जो कि थोड़ा उबाऊ लगा। लेखक के बचपन के एक-दो प्रसंग थोड़े छोटे किए जा सकते थे। 

पुस्तक में शाब्दिक गलतियां कुछ ही जगहों पर हैं अतः पुस्तक पढ़ते समय प्रवाह में कुछ खास व्यवधान पैदा नहीं करती।

यह पुस्तक प्रेत लेखन के बारे में रोचक जानकारी उपलब्ध करवाती है और साथ ही लेखक के जीवन से भी क्रमवार परिचित करवाती है। मेरी राय में इस पुस्तक को एक बार अवश्य पढ़ें।

लेखक ने पुस्तक में यह भी कहा है कि वो इसका दूसरा भाग भी लिख सकते हैं अगर प्रथम भाग को पाठकों का समुचित प्यार मिले!

पुस्तक के बारे में ये मेरे निजी विचार है आपके और मेरे विचारो में दोहराय होना कोई बड़ी बात नहीं है। कॉमेंट्स द्वारा अपने विचारों से हमें अवश्य अवगत करवाएं।

रेटिंग: 7.5/10

31 जनवरी 2022

मौत का नाच - सुरेंद्र मोहन पाठक


उपन्यास : मौत का नाच
उपन्यास सीरीज : विमल सीरीज
लेखक : सुरेंद्र मोहन पाठक 
पेज संख्या : 258 (किंडल)
उपन्यास किंडल लिंक : उपन्यास लिंक

                     उपन्यास कवर

विमल का विस्फोटक संसार - अपनी दर-दर भटकती जिंदगी में सुकून और ठहराव तलाशते सरदार सुरेंदर सिंह सोहल उर्फ विमल की विस्तृत दास्तान का तेरहवां अध्याय !!

बखिया पुराण की दूसरी कड़ी - उपन्यास "मौत का नाच" से लिया गया एक छोटा सा अंश: 
"उसी चक्कर में बम्बई अण्डरवर्ल्ड में ऐसी गैंगवार छिड़ी, जिसकी दूसरी मिसाल सारे हिन्दुस्तान में मिलनी मुश्किल थी । बहुत खून बहा, बहुत लोगों की जाने गयीं, बहादुर के कई आदमियों के साथ उसके दो भाई भी मारे गये लेकिन अन्तिम जीत बहादुर की हुई । उसे जीत ने उसका सिक्का सारी बम्बई के गैंगस्टरों पर जमा दिया । सबने बहादुर के सामने घुटने टेक देने में ही अपना कल्याण समझा । बहादुर की बम्बई में जय-जयकार हो गयी । वह बहादुर से राजबहादुर बखिया और राजबहादुर बखिया से काला पहाड़ बन गया" 

पिछले उपन्यास "विमल का इंसाफ" में विमल नीलम के साथ मिलकर कंपनी के विरुद्ध अपनी लड़ाई छेड़ देता है और योजनाबद्ध तरीके से कंपनी को नुकसान पहुंचाने लगता है। बदले में कंपनी भी विमल पर अपना वार करती है। इसी बीच तुकाराम और उसके भाइयों की सहायता प्राप्त होने से विमल का मनोबल और बढ़ जाता है।

बखिया पुराण की कहानी को आगे बढ़ाते हुए इस उपन्यास "मौत का नाच" का आरंभ होता है कंपनी के एक ओहदेदार मोटलानी के ऑफिस रिसेप्शन के दृश्य से, जहां विमल बैठा हुआ मोटलानी से मिलने की प्रतीक्षा कर रहा है। मोटलानी से मुलाकात समाप्त करने के पश्चात विमल जॉन रोडरीगुएज को फोन करता है तथा उसे एक और खबर सुनाता है। 

रोडरीगुएज ने धीरे से रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया।
तो सोहल झूठ नहीं बोल रहा था ।
“वाट ए मैन !” - उसके मुंह से निकला - “वाट ए मैन !" 

विमल से किए वादे के अनुसार तुकाराम अपने भाइयों के साथ मिलकर नीलम को सुरक्षित करने की तरकीब सोच रहा होता है। इधर पुलिस कमिश्नर भी इस गैंगवार को रोकने के लिए अपने स्तर पर पूरा प्रयास कर रहा होता है। 

कमिश्नर की तजुर्बेकार और पारखी निगाहों ने एक क्षण में भांप लिया कि वह लड़की कॉलगर्ल नहीं हो सकती थी । उस उम्र की कॉलगर्ल की सूरत पर जो बेबाकी और निडरता के भाव दिखाई देने चाहिए थे, वे कमिश्नर को नहीं दिखाई दे रहे थे । लड़की ऊपर से दिलेरी दिखा रही थी लेकिन..." 

विमल जी-जान से राजबहादुर बखिया उर्फ काला पहाड़ को ऐसी करारी चोट पहुंचाने का प्रयास कर रहा होता है कि उसका साम्राज्य पूरी तरह से डिग जाए। अब तो बखिया भी विमल से अपने नुकसान का बदला लेने और विमल के खून से होली खेलने के लिए बुरी तरह से मचल रहा होता है। 

“कसम है बखिया को अपने पुरखों की !” - बखिया ने एक खून जमा देने वाली हुंकार भरी - “वह सोहल की वो मैली आंख नोच लेगा जो ‘कम्पनी’ की तरफ उठी, वह वो हाथ काट देगा जो कम्पनी के ओहदेदारों के लिए मौत का फरमान बने, वह सोहल की बोटी-बोटी काटकर चील-कौवों को खिला देगा, वह सोहल की और सोहल के हिमायतियों की हस्ती मिटा देगा..... " 

विमल ने ऐसा क्या किया कि रोडरीगुएज जैसे खतरनाक इंसान के मुंह से स्वतः ही विमल की प्रशंसा में शब्द निकल पड़े? 
तुकाराम और उसके भाइयों ने क्या तरकीब सोची? 
क्या विमल बखिया की कोई दुखती रग ढूंढ सका और उसे करारी चोट दे पाया? 
लगातार खतरनाक होती जा रही इस गैंगवार में बखिया और कंपनी के ओहदेदारों ने विमल के विरुद्ध क्या-क्या चालें चली? 
बखिया का रौद्र रूप क्या परिणाम लाया? क्या बखिया विमल को तगड़ा नुकसान पहुंचा सका? 
तुकाराम और उसके भाई विमल का किस हद तक साथ दे पाने में सफल हुए? 
पुलिस कमिश्नर ने अपने स्तर पर और क्या-क्या प्रयास किए? 

इन सभी प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर प्राप्त कर सकते हैं। 

बखिया पुराण की कहानी को जारी रखता हुआ यह उपन्यास बहुत दिलचस्प है। कहानी घुमावदार और सस्पेंस से परिपूर्ण है। दोनो पक्षों द्वारा एक के बाद एक चली जाने वाली चालें और उन चालों के जवाब कहानी को रोमांचक बना देते हैं। उपन्यास में विमल, तुकाराम और उसके भाइयों का बखिया और उसके ओहदेदारों से टकराव बहुत अच्छा बन पड़ा है। इस उपन्यास में आपका सही परिचय होगा - अंडरवर्ल्ड में राजबहादुर बखिया की शक्ति और उसके दुश्मन पर छा जाने वाले व्यक्तित्व से! 

पिछले उपन्यास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके पात्रों के अलावा आप इस उपन्यास में बखिया के बाकी ओहदेदारों अमीरजादा आफताब खान, रतनलाल जोशी, इकबाल सिंह, शांतिलाल, मैक्सवेल परेरा तथा अन्य सहायक पात्रों तिलकराज, जजाबेल, पटवर्धन, चंद्रगुप्त, माधव, मारियो, सोमानी, बाबू आदि से मिलेंगे।

यह उपन्यास वर्ष 1984 में प्रथम बार प्रकाशित हुआ था। उपन्यास के रिप्रिंट एडिशन की गुणवत्ता अच्छी है और शाब्दिक गलतियां भी नगण्य मात्र हैं।

जैसा कि हमने पिछले पोस्ट में भी बताया था - अगर आप उपन्यास पढ़ना शुरू करेंगे तो एक ही बार में उपन्यास को पूरा करना चाहेंगे - न सिर्फ उपन्यास को बल्कि पूरी बखिया पुराण को भी! 

अंत में एक बात और कहना चाहूंगा:-
"न भूतो न भविष्यति:" - बखिया पुराण जैसे उपन्यास पढ़कर ये कहावत विमल सीरीज पर बिल्कुल सटीक बैठती है।

कमेंट्स के द्वारा अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 9/10

25 जनवरी 2022

विमल का इंसाफ - सुरेंद्र मोहन पाठक

उपन्यास : विमल का इंसाफ
उपन्यास सीरीज : विमल सीरीज
लेखक : सुरेंद्र मोहन पाठक 
पेज संख्या : 264 (किंडल)
एमेजॉन लिंक : उपन्यास लिंक

विमल का विस्फोटक संसार - अपनी दर-दर भटकती जिंदगी में सुकून और ठहराव तलाशते सरदार सुरेंदर सिंह सोहल उर्फ विमल की विस्तृत दास्तान का बारहवां अध्याय !!

                            उपन्यास कवर 

जहां पिछले उपन्यास "हार जीत" ने बखिया पुराण की नींव रखी थी, वही इस उपन्यास 'विमल का इंसाफ' में बखिया पुराण की महागाथा आरंभ होती है। 

बखिया पुराण - विमल सीरीज के अंतर्गत चार उपन्यासों में फैली हुई एक रोमांचक और जबरदस्त महागाथा! 
बखिया पुराण के चारों उपन्यास विमल सीरीज में सबसे सफल और पाठकों द्वारा बेहद सराहे गए उपन्यासों की सूची में शामिल है। 
1984 के समय में बखिया पुराण को रचकर लोकप्रिय हिंदी साहित्य में बतौर क्राइम एवं थ्रिलर लेखक, सुरेंद्र मोहन पाठक ने प्रसिद्धि के एक नए शिखर को छू लिया था।

उपन्यास "विमल का इंसाफ" से लिया गया एक छोटा सा अंश: 

“पहले मेरी पूरी बात सुनो, स्टूपिड ।” - विमल क्रूर स्वर में बोला ।
“यस, सर ।” - रिसैप्शनिस्ट हड़बड़ा गया - “सारी, सर ।”
“जवाब देना है । कोई मेरी बाबत पूछताछ करे तो उसे सही, मुनासिब और मुकम्मल जवाब देना है ।”
“लेकिन सर, आपने तो कहा था कि…..” 

इस उपन्यास का आरंभ पिछले उपन्यास 'हार जीत' के अंतिम दृश्य से ही होती है। सुइट नंबर 42 में डोगरा का खून करने के बाद विमल होटल नटराज की चौथी मंजिल के गलियारे में खड़ा होता है। डोगरा को मारने से पूर्व विमल को उससे पचास हजार रुपयों की राशि की जगह सिर्फ ढाई हजार रुपए ही मिल पाते हैं। 

 उसके खून से कालीन का लाल रंग और लाल हो गया था और उसका भेजा उसके इर्द-गिर्द सारे कालीन पर बिखरा पड़ा था।
लाश पर निगाह डाले बिना उसने आगे बढकर पलंग के पहलू में रखी एक मेज पर पड़ा टेलीफोन उठाया ।
तुरन्त दूसरी ओर से टेलीफोन आपरेटर की आवाज आई |
“मेरा नाम..... 

विमल के लिए ये राशि अब तक नाक का सवाल बन चुकी होती है। वो सुलेमान से फोन पर बात करता है और कंपनी से बाकी के साढ़े सैंतालीस हजार रुपए चुकाने की मांग करता है, क्योंकि मरते समय डोगरा कंपनी का ओहदेदार था और सालों पहले इलाहाबाद में वो पचास हजार रुपया डोगरा ने कंपनी में ही जमा करवाया था। 

“आपकी जाती हैसियत में आपसे नहीं बल्कि आपकी कम्पनी के एक ओहदेदार की हैसियत में आपसे। आपकी कम्पनी के नाम से जानी जाने वाली आर्गेनाइजेशन से।आपके बाप बखिया से।”
“लेकिन क्यों ?”
"क्योंकि डोगरा मर चुका है और मरते वक्त वह इतनी रकम
* का मेरा कर्जदार था। क्योंकि जिस रकम का वह मेरा देनदार था, वह उसने आपको सौंपी थी।” 

सुलेमान विमल की इस मांग को मानने से मना कर देता है और दोनो में बहस हो जाती है। इस बहस के दौरान सुलेमान विमल के सामने कंपनी की ताकत और बंबई में कंपनी के दबदबे का बखान करता है। प्रत्युत्तर में विमल सुलेमान को चेतावनी देता है कि अगर उसे कंपनी से उसके हक के साढ़े सैंतालीस हजार रुपए नहीं मिले तो वो बंबई में कंपनी को पूरी तरह से ध्वस्त कर देगा। 

अगर यह रकम सीधे से मुझे हासिल न हुई तो आपका यह बम्बई शहर मौत का ऐसा नाच देखेगा जैसा कभी किसी ने कहीं न देखा होगा । मैं यहां जहन्नुम का वो नजारा पेश करूगा कि आपकी और आपकी समूची आर्गेनाइज़ेशन की आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठेगी । मैं
राजबहादुर बखिया की ईंट से ईंट बजा दूंगा। 

सुलेमान की ना सुनने के पश्चात विमल नीलम के साथ मिलकर योजना बनाता है और कंपनी के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू कर देता है। भला कंपनी जैसी शक्तिशाली, सुदृढ़ और सुसंगठित आपराधिक संस्था भी कहां चुप बैठने वाली थी! एक-दूसरे को परास्त करने के लिए दोनो पक्ष चाल पर चाल चलने लगते हैं। शीघ्र ही ये लड़ाई एक ऐसी खतरनाक गैंगवार में बदल जाती है जिससे पूरी बंबई का अंडरवर्ल्ड थर्रा उठता है और बच्चे-बच्चे की आंखें इस गैंगवार पर आ टिकती हैं।

 जो जिहाद तुमने “कम्पनी’ के खिलाफ छेड़ा है, बम्बई के अण्डरवर्ल्ड के बच्चे-बच्चे को उसकी वाकफियत है । अण्डरवर्ल्ड में तुम्हारी भी कोई कम जय-जयकार नहीं है | क्रिमिनल वर्ल्ड में तुम“वन मैन आर्गेनाइजेशन’ के नाम से जाने जाते हो । अण्डरवर्ल्ड की निगाह में बखिया को अपना मैच अभी मिला है इसलिए हर कोई सांस रोक इस मुकाबले के नतीजों का इन्तजार कर रहा है । 

बंबई में कंपनी जैसी खतरनाक क्राइम आर्गेनाइजेशन के खिलाफ किसी को सर उठाता देखकर पुलिस भी एक बार सोच में पड़ जाती है। बंबई की सड़कों पर खून-खराबा बढ़ता देखकर पूरे पुलिस विभाग के साथ स्वयं पुलिस कमिश्नर भी सक्रिय हो जाता है और सारे घटनाक्रम की तह तक पहुंचने में जुट जाता है।

.... खुद पुलिस कमिश्नर बोरीवली पहुंचा। वह घटना आम दिनों से हुई होती तो शायद कमिश्नर तक उसकी खबर भी नहीं पहुंचती, लेकिन उन दिनों शहर में सोहल की ऐसी हवा थी कि शहर में घटी हर असाधारण घटना का रिश्ता स्वयंमेव ही सोहल और उसकी बखिया की आर्गेनाइजेशन के खिलाफ छेड़ी गई गैंगवार से जोड़ लिया जाता था । 

विमल ने कंपनी से टकराने और उसे ध्वस्त करने का निर्णय क्यों लिया?
कंपनी से टकराने के लिए विमल और नीलम ने क्या योजना बनाई?  
सोहल बनाम कंपनी की लड़ाई ने इतनी खतरनाक गैंगवार का रूप कैसे ले लिया? 
क्या कंपनी विमल और नीलम पर पलटवार कर सकी? 
क्या विमल और नीलम अपने ऊपर मंडराते अंजान खतरों से स्वयं को बचा पाए?  
क्या कंपनी के खिलाफ इस लड़ाई में विमल और नीलम को कोई सहायता प्राप्त हो सकी?
विमल और कंपनी की इस गैंगवार में पुलिस की क्या भूमिका रही? 
कौन-कौन शिकार हुआ दिल दहला देने वाली इस गैंगवार का? 
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़कर मिलेंगे। 

विमल सीरीज का यह उपन्यास बहुत बढ़िया लिखा गया है। मेरी राय में अगर आप उपन्यास पढ़ना शुरू करेंगे तो एक ही बार में उपन्यास को पूरा करना चाहेंगे - न सिर्फ उपन्यास को बल्कि बखिया पुराण को भी! 

चूंकि बखिया पुराण की कहानी विस्तृत है इसलिए कहानी में पात्रों की संख्या भी अधिक है। पात्रों की बात करें तो आप इस उपन्यास में विमल और नीलम के साथ सुलेमान, घोरपड़े, शिवाजी राव, मिसेज पिंटो, संध्या, दंडवते, जॉन रोडरीगुएज, पालकीवाला, तुकाराम, शांतिलाल, जीवाराम, बालेराम, देवाराम, कांति देसाई, मोटलानी, जिमी जैसे पात्रों की उपस्थिति पाएंगे। खलनायक पात्रों में से जॉन रोडरीगुएज, सुलेमान और दंडवते की भूमिका बढ़िया लगी। घोरपड़े और मिसेज पिंटो भी कहानी के अनुसार सही लगे। संध्या का किरदार छोटा पर काफी अच्छा है। तुकाराम और उसके भाई कहानी में और जान डाल देते हैं। विमल कंपनी के खिलाफ जबरदस्त एक्शन में नजर आता है और अपने पांसे बहुत अच्छे से फेंकता है।

उपन्यास में सिर्फ एक ही कमी लगी कि कंपनी के अधिकतर आदमी कोई भी काम करने से पहले या काम के दौरान काफी बातचीत (डायलोगबाजी) करते हैं जिस कारण कुछ जगहों पर उनके संवाद अनावश्यक रूप से खिंचे हुए प्रतीत होते हैं।

यह उपन्यास वर्ष 1984 में प्रथम बार प्रकाशित हुआ था। उपन्यास के रिप्रिंट एडिशन की गुणवत्ता अच्छी है। शाब्दिक गलतियां भी छोटी-मोटी ही हैं अतः कहानी पढ़ने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती। 

कमेंट्स के द्वारा अपने विचारों से हमें अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।

रेटिंग: 9/10

19 जनवरी 2022

हार जीत - सुरेंद्र मोहन पाठक


उपन्यास : हार जीत 
उपन्यास सीरीज : विमल सीरीज
लेखक : सुरेंद्र मोहन पाठक 
पेज संख्या : 272 (किंडल)

विमल का विस्फोटक संसार - अपनी दर-दर भटकती जिंदगी में सुकून और ठहराव तलाशते सरदार सुरेंदर सिंह सोहल उर्फ विमल की विस्तृत दास्तान का ग्यारहवां अध्याय जिसने आधार रखा बखिया पुराण का !!

                            किंडल पर उपलब्ध उपन्यास कवर 

पिछले उपन्यास "खाली वार" के अंत में विमल की जान बाल-बाल बचती है और सुनील की सहायता से नीलम विमल को तारकपुर से चंडीगढ़ ले जाती है। 

उपन्यास "हार जीत" से लिया गया एक छोटा सा अंश : 
नीलम की सूरत में विमल को कोई तो सहारा हासिल था, लेकिन जगमोहन तो इतनी बड़ी दुनिया में एकदम तनहा था। पता नहीं उसकी जिन्दगी किस हौलनाक अंजाम तक पहुँचने वाली थी—या शायद पहुँच भी चुकी थी।
सिडनी फोस्टर के अपहरण का सिलसिला ऐन मौके पर बैकफायर न कर गया होता तो आज दोनों की जिन्दगियाँ सँवर चुकी होतीं।

इस उपन्यास की शुरुआत होती है चंडीगढ़ के एक फ्लैट के दृश्य से जहां पर विमल बालकनी में बैठा हुआ पिछले वाकया के बारे में सोच रहा है। नीलम चंडीगढ़ में विमल का लगातार उपचार करवाती है और उसकी पूरी देखभाल करती है। दो महीने में विमल का स्वास्थ्य क्रमशः सुधर जाता है और वो चलने-फिरने के लायक हो जाता है। 
इस दौरान विमल की भावनाएं नीलम के लिए और गहरी होती जाती हैं। बातों-बातों में विमल अपने अतीत के बारे में नीलम को सब कुछ बता देता है और निर्णय लेता है कि पहले वो अपने काले अतीत का सामना करेगा जिस कारण वो अपराध की इतनी गहरी दलदल में धंस गया था और फिर नीलम के साथ नया जीवन शुरू करेगा। नीलम भी विमल के साथ एक नया जीवन आरंभ करना चाहती है परंतु वो पहले विमल से पूछती है कि क्या वाकई विमल अपने अतीत का सामना करने के लिए तैयार है? विमल का उत्तर जानने के पश्चात वो विमल का साथ देने के लिए तैयार हो जाती है। 

मैं अपनी लाचार, हर वक्‍त किसी न किसी से रहम की फरियाद करती, किसी न किसी के रहमोकरम की मोहताज जिन्दगी से तंग आ चुका हूँ। वाहेगुरु मुझे शक्‍ति दे, सामर्थ्य दे, मुझमें उन लोगों से गिन-गिनकर बदले लेने की कूवत पैदा करे, जिन्होंने हमेशा मेरे साथ ज्‍यादती की है। वाहेगुरु सच्‍चे पातशाह, अगर मेरी जिन्दगी के खाते में मेरी चन्द साँसें और लिखी हैं तो वे साँसें किसी तकदीर की मार खाए, हालात से लाचार, सारी द अपने-आप से हारे, रहम के काबिल इंसान की न हों। वे साँसें तेरे ऐसे मुरीद की हों, ऐसे खालसा की हों, जिसकी एक हुँकार से दुश्‍मनों के कलेजे काँप जायें। अगर मैं इन्सान हूँ तो इन्सान ही बनकर रहूँ, मैं बादलों की तरह गरजूँ, बिजली बनकर चमकूँ, और आँधी-तूफान की तरह कुल जहान पर छा जाऊँ। मेरी आने वाली जिन्दगी में हार के लिए कोई जगह न हो। जगह हो तो फतह के लिए—सिर्फ फतह के लिए !"

कुछ जरूरी तैयारियां करने के पश्चात दोनों इलाहाबाद के सफर पर निकल पड़ते है - जी हां! वही इलाहाबाद, जहां पर एक मेहनती और ईमानदार अकाउंटेंट सरदार सुरेंदर सिंह सोहल को जबरदस्ती अपराधी घोषित करके सलाखों के पीछे धकेल दिया गया था। 

अगले रोज वे दोनों इलाहाबाद के लिए रवाना हो गये।
तब उन दोनों का हुलिया, पोशाक और रख-रखाव ऐसा था, जैसे उनकी ताजी-ताजी शादी हुई हो और वे हनीमून के लिए निकले हों।

पर विमल को तो खुद भी नही पता था कि अपने काले अतीत का सामना करने के चक्कर में वो कितने खतरनाक सफर पर निकल पड़ा था और ये खतरनाक सफर सिर्फ इलाहाबाद पर ही खत्म नहीं होने वाला था बल्कि उसे आगे बंबई भी ले जाने वाला था!

क्या थी पूरी कहानी विमल के काले अतीत की? 
विमल क्यूं अपने काले अतीत का सामना करना चाहता था? 
विमल का अपने अतीत से कब, कहां और कैसे सामना हुआ?
क्या विमल अपने काले अतीत से हुए टकराव में जीत पाया? 
बंबई में ऐसा क्या हुआ कि अपने अतीत से विमल का टकराव एक खतरनाक युद्ध में बदल गया जिसने विमल की पूरी जिंदगी ही बदल दी?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर प्राप्त कर सकते हैं। 

मेरी राय में विमल सीरीज का यह उपन्यास रोमांचक और पठनीय है। उपन्यास की कहानी मनोरंजक है। उपन्यास में विमल अपना प्रभाव बनाए रखता है और योजनाबद्ध तरीके से काम करता है। कई जगहों पर कहानी घुमाव भी लेती है। कहानी में जहां कई दृश्य भावनाओं से परिपूर्ण बन पड़े हैं तो वहीं एक्शन और रोमांच से भरपूर दृश्य भी हैं। इस उपन्यास में पाठकों को विमल के अतीत को विस्तृत जानकारी मिलती है। 

पात्रों की बात करें तो आप विमल और नीलम के अलावा बनारसी, मौलाना, कुमुद, मिसेज साराभाई, बसंत साराभाई, सुरजीत, सखाराम, रुस्तम भाई, डोगरा, घोरपड़े, पीटर, सुलेमान, मिसेज पिंटो तथा और भी कई पात्रों से इस उपन्यास में मिलेंगे। जहां कहानी में नीलम का किरदार महत्त्वपूर्ण है वही घोरपड़े, सुरजीत, मिसेज साराभाई, डोगरा और मिसेज पिंटो के पात्र भी काफी अच्छे लगे।

यह उपन्यास वर्ष 1982 में प्रथम बार प्रकाशित हुआ था । 
उपन्यास का रीप्रिंट एडिशन त्रुटिरहित है ।

कमेंट्स के द्वारा अपनी राय से हमें अवश्य अवगत करवाएं | हमे आपकी बहुमूल्य राय का इंतजार रहेगा ।

रेटिंग: 8/10