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03 अगस्त 2022

अनिल मोहन (प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार)

अनिल मोहन - हिंदी उपन्यास जगत में एक ऐसा नाम जिसे किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। 
                   अनिल मोहन जी

अनिल मोहन हिंदी उपन्यास जगत (लुगदी साहित्य) में एक बेहद प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। जासूसी, थ्रिलर एवं फैंटेसी पर आधारित उपन्यास लिखना इनकी विशेषता है। इनका पूरा नाम अनिल मोहन भारद्वाज है और ये दिल्ली में विकासपुरी क्षेत्र के निवासी हैं। 

हिंदी उपन्यास जगत में एक समय ऐसा भी था जब सिर्फ सुरेंदर मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा और अनिल मोहन की तिकड़ी ही मुख्यतः छाई हुई थी। उस समय मार्केट में बिकने वाले हिंदी उपन्यासों में अधिकांश उपन्यास इन तीनों के ही होते थे। उस दौरान अनिल मोहन के किसी भी उपन्यास की छपते ही 50,000 प्रतियां बिक जाती थीं। 

अनिल मोहन जी को लिखने का शगल तो शुरू से ही था परंतु कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते- होते उनका ये शगल उन्हें हिंदी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में खींच लाया। परंतु उस समय किसी भी नए लेखक के लिए शुरुआत में ही स्वयं के नाम से उपन्यास प्रकाशित करवा पाना बहुत कठिन होता था। प्रकाशक पहले नए लेखक को प्रेत लेखन में अवसर देकर परखता था। फिर अगर लेखक की लेखनी में दम हो, उसकी किस्मत अच्छी हो और प्रकाशक भी बढ़िया हो तो कुछ वर्षों में लेखक का स्वंय के नाम से उपन्यास प्रकाशित हो जाता था। बहुत से लेखकों का तो अपना उपन्यास प्रकाशित करवाने का सपना अधूरा ही रह गया था।

हमारे पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार अनिल जी ने भी अपने लेखन कैरियर के प्रथम 11 से 12 वर्षों तक प्रेत लेखन ही किया था और सिर्फ प्रेत लेखक के रूप में ही उन्होंने लगभग 300 से अधिक उपन्यास लिखे थे। उन्होंने अपना पहला उपन्यास इब्ने कफ़ी के नाम से लिखा, प्रेत लेखक के रूप में उन्होंने विभिन्न प्रकाशकों के लिए काम किया और कई ट्रेड नाम वाले लेखकों के नाम से प्रेत लेखन किया जैसे कि  नागपाल, राजवंश, मेजर बलवंत, मीनाक्षी माथुर कर्नल रंजीत इत्यादि। 

आखिरकार 1988 में वो समय भी आया जब अनिल जी का प्रथम उपन्यास "सबसे बड़ा हत्यारा" उनके नाम से प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास जब मार्केट में आया तो पाठकों ने इसे पसंद किया। इसके बाद अपने हर उपन्यास के प्रकाशन के साथ अनिल जी पाठकों के दिल में अपनी जगह बनाते गए और सफलता की सीढियां चढ़ते चले गए। अनिल जी के स्वयं के नाम से अब तक 250 से भी अधिक उपन्यास विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित किये जा चुके हैं। इनके काफी उपन्यास रीप्रिंट हो चुके हैं तथा इन्होंने कई उपन्यास अमेजन की वेबसाइट पर किंडल एडिशन में भी रिलीज किए हैं। कुछ प्रकाशकों ने इनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए इनकी अनुमति के बिना इनके कुछ उपन्यासों के रीप्रिंट तथा ऑडियोबुक्स रिलीज करने की कोशिश भी की थी जिसे अनिल मोहन ने कानूनी कार्रवाई के माध्यम से रुकवा दिया था।

अनिल मोहन के पसंदीदा लेखक अंग्रेजी उपन्यासकार जेम्स हेडली चेस हैं। अनिल जी एक वर्ष में 9 से 10 उपन्यास तक लिख देते थे। काफी वर्षों तक उन्होंने उपन्यास लिखने की ऐसी गति बरकरार रखी जिस कारण उनके द्वारा लिखे उपन्यासों की संख्या अधिक है। 

विभिन्न पाठकों के साथ अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स (व्हाट्सएप, टेलीग्राम, फोन, मुलाकात इत्यादि) पर हुए वार्तालाप के दौरान हमने ये पाया कि कई पुराने पाठकों के अनुसार अनिल मोहन ने प्रेत लेखन सहित कुल मिलाकर लगभग 700 से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं। हमारे लिए इस आंकड़े की पुष्टि करना कठिन है क्योंकि उस जमाने में हिंदी उपन्यासों का रिकॉर्ड अधिक गंभीरता से सहेजकर नही रखा जाता था। स्वयं अनिल जी के लिए भी उनके द्वारा लिखे गए उपन्यासों के नाम तथा उनकी संख्या की सही पुष्टि कर पाना कठिन होगा।

अनिल मोहन द्वारा रचे गए मुख्य पात्रों की लिस्ट में देवराज चौहान, मोना चौधरी, अर्जुन भारद्वाज, आर. डी. एक्स. (राघव धर्मा एक्स्ट्रा की तिकड़ी), विजय बेदी और जुगल किशोर के नाम उपस्थित हैं। साथ ही यादगार सहायक पात्रों की लिस्ट में सोहनलाल, जगमोहन, पारसनाथ, महाजन, महादेव, वानखेड़े, नगीना, गजाला, फकीर पेशीराम जैसे नाम शामिल हैं। 

अगर उपन्यास श्रृंखलाओं की बात करें तो अनिल मोहन ने देवराज चौहान, मोना चौधरी, अर्जुन भारद्वाज, आर डी एक्स, जुगल किशोर तथा विजय बेदी सीरीज के उपन्यास लिखे हैं। ये सब उपन्यास मुख्यत: जासूसी, थ्रिलर और फैंटेसी श्रेणी के हैं। इनमें से देवराज चौहान तथा मोना चौधरी सीरीज के उपन्यास पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं। अनिल जी ने सबसे अधिक उपन्यास देवराज चौहान श्रृंखला में लिखे हैं जो कि इनकी सबसे सफल श्रृंखला है। उपरोक्त लिखित उपन्यास श्रृंखलाओं के अलावा अनिल मोहन ने बिना किसी श्रृंखला वाले थ्रिलर उपन्यास भी लिखे हैं।

आपको अनिल मोहन द्वारा रचित काफी सारे उपन्यास ऐसे मिलेंगे जो पार्ट्स में लिखे गए हैं। एक ही कहानी 2, 3 या उससे भी ज्यादा उपन्यासों में जाकर पूरी होती है। उनकी ऐसी कई कहानियां अभी तक पूरी नहीं हो पाई क्योंकि बचे हुए पार्ट्स वाले उपन्यास या तो प्रकाशित नहीं हुए या फिर अनिल जी कहानी के बचे हुए पार्ट्स लिख ही नहीं पाए। इसका कारण चाहे जो भी रहा हो, अधूरी बची कहानियों को पूर्ण करने की उम्मीद आज भी कई पाठक अनिल मोहन से लगाए बैठे हैं।

पात्रों के अनुसार अनिल मोहन जी के उपन्यासों की लिस्ट निम्नलिखित हैं:

महादेव :-
घर का शेर
मोहरा
दौलत के खिलाड़ी
फायर
जहाज नंबर 302
लूटमार
दूसरा चेहरा
फिरौती

 वानखेडे:-
दिन दहाड़े लूट
जान के दुश्मन
खूंखार
जांबाज
डकैती
टक्कर
विधि का विधान
दौलत का ताज
आतंक का पहाड़
एक रुपये की डकैती
301 करोड़ की चाबी
डकैती के बाद
गिरोहबाज
पहरेदार
जालिम
विस्फोट
अंडरग्राउंड
हथियार
एक डकैती ऐसी भी
तबाही
दौलत मेरी मुठी में
एक दिन का हिटलर
फायर
बदमाशों की टोली
कमांडो
सरकारी शैतान
मिशन डकैती मास्टर
डकैती तेरे नाम की
ठेकेदार
यारी दौलत से
दौ लत मेरी माँ
गुर्गा
हैवान
आर.डी.एक्स 
गुरु का गुरु
हाईजैकर
संगीन डकैती
वर्दी का नशा
मुखबिर
बबूसा
डकैती का अलार्म
कॉन्ट्रैक्ट
लाइसेंस टू किल
मिशन प्राइम मिनिस्टर
हांगकांग में डकैती
किस्मत का सुलतान

सोहनलाल:-
पाप का घड़ा
बारूद का ढेर
डंके की चोट
दोलत के दांत
धोखाधड़ी
पहरेदार
हमला
जालिम
बादशाह
विस्फोट
अंडरग्राउंड
तबाही
एक दिन का हिटलर
जहाज नंबर 302
जीत का ताज
ताज के दावेदार
कमांडो
कौन लेगा ताज
रफ्तार
डाका
पहली चोट
सरकारी शैतान
दूसरी चोट
तीसरी चोट
महामाया की माया
चौकीदार
मिशन डकैती मास्टर
डकैती तेरे नाम की
ठेकेदार
यारी दौलत से
जुआरी
दोलत मेरी माँ
27 सेकंड
देवदासी
इच्छाधारी
हिस्सेदार
नागराज की हत्या
विष मानव
दौलत का जहाज
मास्टर
गुड्डी
मंत्र
गुर्गा
केकड़ा
गिरोह
आर.डी.एक्स 
गुरु का गुरु
माई का लाल
हाईजैकर
जथुरा
पोटेबाबा
यू टर्न
महाकाली
बंधक
सबसे बड़ा हमला
किस्मत का सुल्तान
नसीब के पत्ते
नागमणि
नरबलि
100 माइल्स
डॉन जी
नागिन
सबसे बड़ा गुंडा
वर्दी का नशा
मैं हूं देवराज चौहान
जिंदा आंखें
मुखबिर
मिस्ड कॉल
बबूसा
बबूसा और राजा देव
डकैती का जादूगर
लाइसेंस टू किल
वो कौन था
हांगकांग में डकैती

गजाला:-
ज्वालामुखी
खूंखार
जांबाज
आतंक का पहाड़
जिन्न
हाईजैकर


उनके श्रृंखलाबद्ध रूप में लिखे गए उपन्यासों की लिस्ट निम्नलिखित है :-

2 उपन्यास वाली श्रृंखलाएं:-
हमला, जालिम
ज्वालामुखी, खूंखार
100 माइल्स, डाॅन जी
सबसे बड़ा गुण्डा, मैं हूँ देवराज चौहान
एक रुपये की डकैती, डकैती के बाद
बारूद से मत खेलो, दौलत के दांत
अंडरवर्ल्ड, गैंगवार
अनोखी दुल्हन, दुल्हन मेरी मुट्ठी में
दौलत मेरी माँ, जीना इसी गली में
पहरेदार, सुलग उठा बारूद
फिक्स्ड गेम, डबल प्ला‌‌न
ऑपरेशन टू किल, ऑपेरशन 24 कैरेट
खबरी, अघोरी

3 उपन्यास वाली श्रृंखलाएं:-
दिल्ली का दादा, दरिंदे, हिंसक
जथूरा, पोतेबाबा, महाकाली
बंधक, सबसे बड़ा हमला, वांटेड अली
नागिन, नरबलि, नागमणि
डकैती का जादूगर, हांगकांग में डकैती, लाइसेंस टू किल
ताज के दावेदार, कौन लेगा ताज, जीत का ताज
पूर्वजन्म, यज्ञ, मायाजाल

4 उपन्यास वाली श्रृंखलाएं:-
पहली चोट, दूसरी चोट, तीसरी चोट, महामाया की माया
गोला बारूद, भूखा शेर, आदमखोर, निशानेबाज
सरगना, मास्टर, गुड्डी, मंत्र
देवदासी, इच्छाधारी, नागराज की हत्या, विष मानव
नब्बे करोड़, 36 दिन, सच का सिपाही, डमरू

6 उपन्यास वाली श्रृंखला:-
बबूसा, बबूसा और राजादेव, बबूसा खतरे में, बबूसा का चक्रव्यूह, बबूसा और सोमाथ, बबूसा और खुंबरी


अगर आपके पास अनिल मोहन जी के बारे में कोई और जानकारी उपलब्ध हो तो कॉमेंट्स के माध्यम से हमारे साथ शेयर करें। हमेशा की तरह हमें आपके कॉमेंट्स की प्रतीक्षा रहेगी।

30 मार्च 2022

विष मानव - अनिल मोहन


उपन्यास: विष मानव
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 304

                   विष मानव उपन्यास कवर
'विष मानव' चार उपन्यासों की श्रृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम भाग है। इस श्रृंखला के प्रथम तीन भागों 'देवदासी समीक्षा', 'इच्छाधारी समीक्षा' तथा 'नागराज की हत्या' की समीक्षा हमारे ब्लॉग पर पहले से ही उपलब्ध है। 

'नागराज की हत्या' उपन्यास के अंत में सांपनाथ की बस्ती के सभी राक्षस झोंपड़ी में त्रिवेणी उर्फ रुस्तम राव के ठहाके को सुनकर और उसके काले-नीले शरीर को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं।

विष मानव' उपन्यास से लिया गया एक अंश: 
**"मुझे बताइए आपको क्या परेशानी है ?" गंगू साथ चलते-चलते बोला "मैं आपको परेशान नहीं देख सकता। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आपकी चिंता को दूर कर सकूं।" 
"बहुत बुरा हुआ!" वायुलाल अपनी ही सोचों में बड़बड़ा उठा।
"क्या ?"**

उपन्यास 'विष मानव' का प्रथम दृश्य वायुलाल और गंगू के वार्तालाप से आरंभ होता है। इस दौरान वायुलाल गंगू से कहता है कि ऐसा कौन है जो उसके द्वारा सैकड़ों वर्षों में प्राप्त की गई शक्तियों से टकराने का साहस कर रहा है। वायुलाल अपनी शक्तियों से इस बारे में पता लगाने के लिए गंगू के साथ एक विशेष कमरे की तरफ बढ़ जाता है। 

 **वायुलाल और गंगू दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गए।
बाहर खड़े सेवकों ने वो दरवाजा पुनः बंद कर दिया।
वो बहुत बड़ा हॉल कमरा था जहां अजीबों तरह का सामान पड़ा नजर आ रहा था। दीवारों पर समझ में न आने वाले चित्र बने हुए था।**

उधर दक्षिण दिशा में काला द्वार के पास मोना चौधरी, जगमोहन और महाजन रात में बारी-बारी से पहरा दे रहे थे ताकि नागराज से किए वादे के अनुसार जैसे ही सुबह हो जाए, वो लोग तुरंत अपना काम पूरा कर सकें। काला द्वार से कुछ ही दूरी पर मौजूद जगमोहन, सोहनलाल और जलेबी भी अपनी योजना बना रहे होते हैं ताकि वो भी बिना किसी अड़चन के अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकें। 

**..... जगमोहन बोला "चालाकी इस्तेमाल करनी है।" 
"क्या मतलब ?"
"मुझे बता जग्गू !" जलेबी कह उठी।
जगमोहन धीमे स्वर में उन्हें बताने लगा।**

इधर बांके और नगीना के साथ क्रोध से भरी रानी देवराज चौहान के पास पहुंचने की कोशिश कर रही होती है। वहीं अपने पति को खोने से आहत नागरानी बदला लेने के लिए आतुर हो उठती है और सांपनाथ की बस्ती की ओर चल पड़ती है। 

**चंद क्षणों में ही नागरानी अपने खूबसूरत मानवीय रूप में उनके सामने खड़ी थी। परंतु इस वक्त वो क्रोध की आग में तप रही थी। गुस्से से उसका चेहरा धधक रहा था। आंखें लाल हो रही थी। शरीर आवेश से कांप कहा था। **

घटनाक्रम कुछ इस प्रकार से आगे बढ़ता है कि देवराज चौहान, रुस्तम राव, रानी और बाकी साथी तथा वायुलाल, मोना चौधरी और उसके साथियों के बीच एक ऐसे जानलेवा टकराव की स्थिति बन आती है जिसका परिणाम किसी एक पक्ष की पराजय से ही निकलना संभव था। 

"मैं जानता हूं कि वायुलाल मेरे रास्ते में ढेर सारी परेशानियां खड़ी करेगा।" रुस्तम राव ने देवराज चौहान को देखकर सिर हिलाया - "इस काम में वो अकेला नहीं होगा। उसके साथ मोना चौधरी भी अवश्य होगी। परंतु मेरी पूरी कोशिश होगी कि मैं ये ....."

वायुलाल अपने विशेष कमरे में किन शक्तियों का आह्वान करने के लिए गया?
रुस्तम राव का शरीर काला-नीला कैसे हो गया? 
क्या सचमुच विश्व पुरुष "नागराज" की हत्या हुई थी? 
क्या मोना चौधरी देवराज चौहान से बदला ले सकी? 
क्या जगमोहन, सोहनलाल और जलेबी की चालाकी काम आई? 
जब क्रोध से भरी रानी का सामना देवराज चौहान से हुआ तो क्या हुआ? 
क्या नागरानी अपना प्रतिशोध ले पाई? 
देवराज चौहान, रानी, रुस्तम राव और उसके साथी तथा वायुलाल, मोना चौधरी और उसके साथियों के बीच हुए  जानलेवा टकराव का क्या परिणाम हुआ? 
बलसारा और हंसनी ने क्या चालें चली? 
क्या इस टकराव का परिणाम इतना ही सीधा और सरल था जितना दिख रहा था या अंदर कुछ और रहस्य भी छुपा हुआ था? 
क्या था वायुलाल की शक्तियों का केंद्र? 
आखिर किस प्रकार खत्म हुआ देवराज चौहान और मोना चौधरी का इस बार का पूर्व जन्म का सफर? 
रानी और जलेबी का क्या हुआ? 
कौन था वो चांदी का बना एक फुट का रहस्यमयी बौना मानव? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको यह उपन्यास पढ़कर ही मिल पाएंगे!

अब पात्रों के बारे में बात की जाए तो इस उपन्यास में देवराज चौहान, जगमोहन, वायुलाल और रुस्तम राव बढ़िया लगे हैं। बलसारा, हंसनी, नजूमी, नागरानी, रहस्यमयी विश्व पुरुष नागराज, इच्छाधारी और रानी के पात्र भी अच्छे लगे। जहां इच्छाधारी, पारसनाथ और महाजन सही लगे, वहीं मोना चौधरी, बांकेलाल और नगीना सामान्य ही लगे। जलेबी और सोहनलाल ने कहानी में कुछ मजाक-मस्ती का दौर भी बनाए रखा है। कुछ नए सहायक पात्र जैसे रामभजन, जंगली सरदार भी इस उपन्यास में पढ़ने को मिलते हैं परंतु उनकी भूमिका नगण्य ही है।

उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर) का डिजाइन ठीक-ठाक है। इस उपन्यास में मुख्य पात्र के रूप में देवराज चौहान की तुलना में मोना चौधरी का किरदार उतना दमदार नहीं लगा जितना इस शृंखला के पहले के उपन्यासों में था। 
साथ ही कुछ संवाद इस उपन्यास में भी अनावश्यक रूप से लंबे एवं खिंचे हुए लगे - खासकर देवराज, उसके साथियों की जंगलियों से हुई भेंट वाले प्रसंग में ।

कुल मिलाकर उपन्यास मनोरंजक है और कहानी पाठकों को बांधे रखती है। उपन्यास का अंत रोमांचक और उत्सुकता से भरा है तथा श्रृंखला का समापन भी बहुत अच्छे ढंग से किया गया है। 

अंत में ये जरूर कहना चाहूंगा कि चार उपन्यासों की ये संपूर्ण श्रृंखला एक बार अवश्य पढ़ें। यह उपन्यास श्रृंखला अनिल मोहन द्वारा रचित यादगार उपन्यासों में से एक है।

कमेंट्स के द्वारा हमें अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं।क्या आपने भी इन चारो उपन्यासों की श्रृंखला को पढ़ा है। हमेशा की तरह हमें आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8.5/10

22 मार्च 2022

नागराज की हत्या - अनिल मोहन


उपन्यास: नागराज की हत्या
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 303

'नागराज की हत्या' चार उपन्यासों की श्रृंखला का तृतीय भाग है। इस श्रृंखला के प्रथम भाग 'देवदासी समीक्षा' तथा द्वितीय भाग 'इच्छाधारी समीक्षा' की समीक्षा हम पहले ही ब्लॉग पर शेयर कर चुके हैं। 

'इच्छाधारी' उपन्यास के अंत में देवराज चौहान, नगीना, रानी और बांकेलाल राठौर  सांपनाथ की बस्ती में पहुंच जाते है परंतु वहां उनकी भेंट सांपनाथ के स्थान पर तूतका से होती है। तूतका उन्हें बंदी बनाने की कोशिश करता है।

'नागराज की हत्या' उपन्यास से लिया गया एक अंश: 
** "इधरो तो अपणो जाणो की खैर न दिखो। देवराज चौहान को किधर से अम बचायो?" 
चंद कदमों के फासले पर थे राक्षस जाति के वे लोग। 
वहशी इरादे थे उनके। 
तूतका का आदेश मिल चुका था उन्हें। **

उपन्यास 'नागराज की हत्या' के प्रथम दृश्य में तूतका और उसके संगी राक्षस देवराज और उसके साथियों को मारने की कोशिश करते हैं परंतु रानी बीच में आ जाती है। तूतका से बात करने के बाद देवराज, रानी, नगीना और बांकेलाल सुनेरा की बस्ती में तूतका के साथ जाने की योजना बनाते हैं। 

** तूतका ने कहा - "आइए, उधर झोंपड़े में चलते हैं। वहीं बातें होंगी। शायद आप लोगों के लिए कहवे का इंतजाम हो जाए।"
देवराज चौहान, रानी, नगीना और बांकेलाल राठौर तूतका के पीछे चल पड़े। परंतु वे सतर्क थे कि... **

उधर नागलोक में विश्व पुरुष 'नागराज' अपनी पत्नी नागरानी से एक गंभीर वार्तालाप में व्यस्त होता है। वार्तालाप के दौरान नागरानी एक ऐसी समस्या बताती है जिसे सुनकर नागराज व्यथित हो जाता है और अपनी शक्तियों द्वारा इसका हल निकालने का प्रयत्न करता है। परंतु नागराज की शक्तियां इस समस्या का जो समाधान बताती है, वो समाधान नागराज को भी दुविधा में डाल देता है। 

** "तुम अपना दिल छोटा न करो नागरानी।"
"आप मुझे झूठा दिलासा दे रहे... ।"
"मैं कुछ भी झूठ नहीं कह रहा। जग से लड़ने की भावना  तुममें पैदा कर रहा... ।"
"मैं कायर नहीं हूं जो.. ।" **

वहीं वायुलाल के महल में मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन आपस में मंत्रणा करने के पश्चात अपनी यात्रा आरंभ कर चुके होते हैं। वे जंगल के रास्ते से अपनी यात्रा शुरू करते हैं ताकि सुनेरा की बस्ती का कठिन सफर शीघ्र ही तय किया जा सके तथा देवराज और उसके साथियों तक पहुंचा जा सके। 

** गरमी से बुरा हाल था। शाम तक ऐसा ही रहना था। 
वे तीनों आगे बढ़ रहे थे। 
पीछे न देख सके। 
पीछे शीशे के समान चमकता, पारदर्शी बवंडर दिखा, जो कि पंद्रह फीट के व्यास में... **

उपरोक्त स्थानों पर चल रही गतिविधियों के समानांतर ही अन्य स्थानों (सांपनाथ की बस्ती में, सुनेरा की बस्ती में, सुनेरा की बस्ती के बाहर, वायुलाल के महल में, नागराज  की घाटी में) पर भी घटनाचक्र तेजी से चलता है। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में ये सब घटनाएं एक दूसरे से जुड़ जाती हैं और हालात इस तरह उलझ जाते हैं कि लगभग सबकी जान खतरे में पड़ जाती हैं।

देवराज, रानी और उनके साथी सुनेरा की बस्ती में क्यों जाना चाहते थे?
कौन था विश्व पुरुष नागराज और क्या था उसका रहस्य?
नागरानी ने ऐसी क्या बात बताई जिसने नागराज को चिंतित कर दिया? 
क्या था वो समाधान जिस कारण नागराज भी दुविधा में पड़ गया? 
क्या योजना बनाई नागराज ने? 
क्या मोना चौधरी और देवराज चौहान का आमना-सामना हुआ? 
सुनेरा ने अपनी ओर से सुरक्षा के क्या प्रबंध कर रखे थे? 
नजूमी कौन था और क्या महत्त्व था उसका? 
कौन थे बलसारा और हंसनी तथा क्या थी उनकी भूमिका?
इच्छाधारी ने इस बार क्या गुल खिलाए? 
सुनेरा की बस्ती में फंसे सांपनाथ का क्या हुआ? 
जलेबी, जगमोहन और गुलचन्द के सामने क्या-क्या खतरे आए? 
क्या वायुलाल अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाया?  
देवराज, रानी, नगीना और बांकेलाल को किन-किन खतरों से जूझना पड़ा इस बार? 
त्रिवेणी उर्फ रुस्तम राव का क्या हुआ? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको यह उपन्यास पढ़कर ही मिल पाएंगे!

अब हम उपन्यास के पात्रों के बारे में बात करते हैं। मुख्य पात्रों और श्रृंखला के पिछले दोनों उपन्यासों में मौजूद अधिकांश सहायक पात्रों के अलावा आपको नजूमी, बलसारा, हंसनी, नगोरा, नागरानी जैसे नए सहायक पात्र पढ़ने को मिलेंगे। 
मुझे इस उपन्यास के सहायक पात्रों में सुनेरा, बलसारा और नागरानी अच्छे लगे। नागराज का किरदार सबसे अधिक प्रभावी लगा। जहां मुख्य पात्र देवराज चौहान, मोना चौधरी, वायुलाल और रानी अच्छे रहे, वहीं जगमोहन, गंगू और सोहनलाल भी पसंद आए। रुस्तम राव और इच्छाधारी के किरदार दिलचस्प रहे हैं। पारसनाथ, महाजन, नगीना और बांकेलाल की भूमिका इस उपन्यास में साधारण ही रही। सांपनाथ, नागनाथ, दुदका, तूतका इत्यादि पात्र अपनी-अपनी जगह ठीक लगे।

इस उपन्यास में आपको नागराज की वृहद शक्तियों का परिचय मिलेगा। सुनेरा और उसकी बस्ती के बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी। मोना चौधरी, रानी, पेशीराम और वायुलाल की कुछ और शक्तियों के बारे में पता चलेगा। जलेबी और सोहनलाल का जगमोहन को खिजाना होठों पर स्वतः ही मुस्कान ला देता है। बीच में इच्छाधारी भी अपना जलवा बिखेरने में सफल रहा है। 

उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर) का डिजाइन सामान्य सा ही लगा। कुछ जगहों पर संवाद काफी लंबे लिखे गए है जिन्हे लेखक द्वारा आसानी से कम किया जा सकता था। इस कमी को हटा दें तो कुल मिलाकर उपन्यास बहुत अच्छा है और पूरी श्रृंखला को मनोरंजक बना देता है। उपन्यास का अंत रोमांचक बन पड़ा है और अनिल मोहन की लेखनी का असर पाठकों को अगला उपन्यास तुरंत पढ़ने के लिए उत्साहित कर देता है। 

कमेंट्स के द्वारा हमें अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। हमेशा की तरह हमें आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8.5/10

19 मार्च 2022

सुलग उठा बारूद - अनिल मोहन

प्रिय साथियों ! अप्रकाशित उपन्यासों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज एक बार फिर आपके समक्ष हाजिर हूं एक और अप्रकाशित उपन्यास के साथ। 

आपको इस पोस्ट में हम बताने जा रहे हैं एक और अप्रकाशित उपन्यास "सुलग उठा बारूद" के बारे में जो कि अनिल मोहन का है !

             उपन्यास सुलग उठा बारूद का विज्ञापन 

उस गैलरी के आखिरी कोने में वॉल्ट के स्ट्रॉन्ग रूम का दरवाजा था और दरवाजे तक पहुंचने के बीस फीट लंबे रास्ते पर बारूद भी बिछा था, जिस पर पैर रखते ही शरीर लोथड़ों में बदल जाना था और बीस फीट लंबे सुलगते बारूद को पार किए बिना वॉल्ट के दरवाजे तक पहुंचना असंभव था जिसके पार करोड़ों अरबों की अथाह दौलत मौजूद थी। जबकि उस दौलत को पाने के लिए देवराज चौहान अपना कदम आगे बढ़ा चुका था। आज उसे गोल्ड वॉल्ट में डकैती डालनी ही थी... और

उपरोक्त विज्ञापन के अनुसार अनिल मोहन का देवराज चौहान श्रृंखला का ये उपन्यास एक जबरदस्त डकैती को अंजाम देने पर आधारित है। विज्ञापन का आधार डकैती में मुख्य रुकावट बनी हुई बारूद बिछी बीस फीट की गैलरी रखा गया है जिसे पार कर पाना आसान काम नही था। वहीं पर देवराज चौहान अपना मन इस वॉल्ट को लूटने का बना चुका था। 

इस उपन्यास का पूर्व भाग "पहरेदार उपन्यास समीक्षा" था जिसके बारे में हम अपने विचार आपसे पहले ही सांझा कर चुके हैं । 

अगर ये उपन्यास प्रकाशित हुआ होता तो देवराज चौहान द्वारा इस बीस फीट की गैलरी को पार कर पाना और फिर गोल्ड वॉल्ट में डकैती करना अपने-आप में बेहद मजेदार और रोचक होता। साथ ही इतना तो स्पष्ट ही है कि उपन्यास में बारूद बिछी गैलरी के अलावा कुछ और कड़े सुरक्षा इंतजाम भी किए ही गए होंगे जिनका विज्ञापन में सस्पेंस बनाए रखने के लिए कोई जिक्र नहीं किया है। 

हालांकि ये उपन्यास प्रकाशित नही हो पाया परंतु इसका क्या कारण रहा, इस बारे में हमारे पास कोई जानकारी नहीं है।

उपरोक्त लिखित जानकारी के अलावा हमारे पास इस उपन्यास के बारे में अन्य कोई जानकारी इस समय उपलब्ध नहीं है। 

अगर आप इस उपन्यास के बारे में कोई और जानकारी रखते हैं तो कमेंट्स के माध्यम से हमारे साथ जरूर शेयर करें।

08 मार्च 2022

इच्छाधारी - अनिल मोहन

उपन्यास: इच्छाधारी
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 304

इच्छाधारी - देवराज चौहान और मोना चौधरी का पूर्व जन्म में खतरनाक हादसों का सफर!!

'इच्छाधारी' चार उपन्यासों की श्रृंखला का द्वितीय भाग है। इस श्रृंखला का प्रथम भाग 'देवदासी' है जिसकी समीक्षा हम कुछ समय पूर्व ब्लॉग पर शेयर कर चुके हैं। 

'देवदासी' उपन्यास में पेशीराम की भविष्यवाणी के अनुसार देवराज चौहान, मोना चौधरी और उनके साथी एक बार फिर पूर्व जन्म में प्रवेश कर जाते हैं तथा अपने-अपने स्तर पर विभिन्न प्रकार के खतरों का सामना करते हैं। मुख्यतः विष्णु सहाय नामक व्यक्ति इन सबके पूर्व जन्म में प्रवेश का माध्यम बनता है।

'इच्छाधारी' उपन्यास से लिया गया एक अंश: 
** "ये बाग, ये नजारा सब कुछ उसी की विद्या के तिलिस्म की देन है। यहां कई जगह उसने अपनी पसंद के खतरे तैयार कर रखे हैं जो कि देखने में, समझ में नहीं आएंगे। उन खतरों में फंस जाने के बाद वहां से बच पाना आसान नहीं। अनजान आदमी को जान से हाथ धोना पड़ता है।"
देवराज चौहान और जगमोहन की नजरें बाग में दूर-दूर तक गईं। 
"यहां नजर आने वाले वृक्षों पर लटकते फल खाने वाला बच नहीं सकता" **

'देवदासी' उपन्यास के अंत से कहानी को आगे बढ़ाते हुए 'इच्छाधारी' उपन्यास का आरंभ होता है उस दृश्य से, जहां देवराज (पूर्व जन्म में देवा) और सवा सौ वर्ष बाद मंत्र कीलित कैद से आजाद हुई देवदासी रानी अपने पूर्व जन्म की यादों में चले जाते हैं। जगमोहन (पूर्व जन्म में जग्गू) को भी सब याद आ जाता है। तभी वायुलाल की आवाज वहां गूंजती है जो रानी के आजाद होने से बहुत गुस्से में है तथा देवा, रानी और जग्गू को उनके बुरे अंजाम की चेतावनी देता है। देवा और रानी वायुलाल की आवाज को उसकी चेतावनी का जवाब देते हैं और फिर रानी के कहे अनुसार सांपनाथ की बस्ती का रास्ता ढूंढने के लिए आगे बढ़ जाते हैं। 

** "..... पता कर लूंगी मैं जल्दी ही। हमें यहां से सांपनाथ की बस्ती की तरफ चल देना चाहिए। अब हमारा एक-एक पल कीमती है।"
"चलेंगे कैसे?" 
जवाब में रानी की निगाह बाग में घूमने लगी। इस वक्त उसके चेहरे के भाव बदल गए थे। सतर्कता में लग रही थी वो कि तभी..... **

दूसरी तरफ एक अंधे कुएं में नगीना (पूर्व जन्म में बेला), रुस्तम राव (पूर्व जन्म में त्रिवेणी) और बांकेलाल राठौर को होश आता है जहां वो इच्छाधारी की करामात से आ पहुंचे थे। अचानक उन्हें समय नामक एक लड़के की आवाज आती है जो उन्हें अंधे कुएं से बाहर निकालता है। बाहर निकल कर तीनों को पता चलता है कि वो लोग एक वीरान से गांव में हैं जहां सिर्फ समय ही एक आखिरी मनुष्य बचा है और गांव के बाकी सब लोगों को राक्षस खा चुके हैं। जल्दी ही राक्षस समय को खाने के लिए भी आने वाला था। नगीना, रुस्तम और बांकेलाल डरे हुए समय को मदद का आश्वासन देते हैं। शीघ्र ही राक्षस समय को खाने के लिए आ पहुंचता है। समय जाकर झोंपड़ी में छुप जाता है जबकि नगीना, रुस्तम और बांकेलाल राक्षस का सामना करते हैं। परंतु उनके इस युद्ध का ऐसा दिल दहला देने वाला परिणाम निकलता है जिसकी कोई सपने में भी उम्मीद नहीं कर सकता था।

** उधर रुस्तम राव आहिस्ता से पेड़ से उतरा और तलवार संभाले शिकारी चीते की तरह उसे देखता दबे पांव उसकी तरफ बढ़ने लगा। कमर में उसने कटार फंसा रखी थी।
वो राक्षस बार बार चीखकर समय को सामने आने को कह रहा था। 
बांकेलाल राठौर और नगीना अपनी-अपनी जगहों पर छिपे राक्षस की हरकतों को पहचानने की चेष्टा कर रहे थे। **

तीसरी तरफ एक अन्य स्थान पर वायुलाल का पुराना सेवक गंगू अपनी नौका में मोना चौधरी (पूर्व जन्म में मिन्नो), पारसनाथ और महाजन (पूर्व जन्म में नीलसिंह) को नदी पार करवा रहा होता है। सोहनलाल (पूर्व जन्म में गुलचंद) भी इनके संग होता है। नौका के नदी किनारे पहुंचते ही वायुलाल मोना चौधरी और उसके साथियों से मिलता है। वायुलाल पहले उन्हें पूर्व जन्म की घटनाएं और ताजा हालात के बारे में बताता है तथा फिर उन सबको अपने महल में ले जाने का प्रस्ताव देता है। 

** कश्ती के बीचों-बीच लकड़ी का खिड़कियों वाला कमरा था जिसके भीतर मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन मौजूद थे। कश्ती उन सीढ़ियों के पास पहुंच चुकी थी। 
मिन्नो दुबारा जन्म लेकर, वायुलाल के पास सवा सौ बरस बाद पुनः आ पहुंची थी। **

देवराज चौहान पर वायुलाल के क्रोध की क्या वजह थी? 
क्या थी देवदासी रानी की पूर्व जन्म की कहानी? 
सांपनाथ कौन था और क्या उद्देश्य था उसका? 
देवराज, रानी और जगमोहन आखिर किस प्रयोजन से सांपनाथ की बस्ती की ओर बढ़ रहे थे? 
समय कौन था और वो राक्षस उसके पीछे क्यों पड़ा हुआ था? 
नगीना, रुस्तम, बांकेलाल तथा राक्षस के मध्य हुए युद्ध का ऐसा क्या दिल दहला देने वाला परिणाम निकला जिसने पूरे घटनाचक्र की दिशा ही बदल कर रख दी? 
वायुलाल मोना चौधरी और उसके साथियों को अपने महल में क्यों ले जाना चाहता था? 
आखिर इच्छाधारी का प्रयोजन क्या था? 
सांपनाथ किस तरह की दुविधा में फंस गया था? 
देवता मोमबांबा कौन था और क्या थी उसकी भूमिका? 
नागनाथ कौन था और क्या करने की फिराक में था? 
क्या देवराज, रानी, जगमोहन की मुलाकात नगीना, रुस्तम और बांकेलाल से हो सकी? 
देवराज, रानी और जगमोहन क्या सांपनाथ की बस्ती तक पहुंच सके? 
सुनेरा कौन था और ऐसी क्या विशिष्ट वस्तु रखी हुई थी उसके पास? 
इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास में मिलेंगे!

पात्रों के बारे में बात की जाए तो पिछले उपन्यास के अधिकांश पात्रों के अलावा इस उपन्यास में आपको हुगली, मुंगेरा, सांपनाथ, दुदका, सुमित्रा, कुड़की, हुंडी, मुद्रानाथ, तूतका, छिंदड़ा, देवता मोमबांबा, सुनेरा, नागनाथ की उपस्थिति मिलेगी। 
उपन्यास के नए पात्रों में मुझे सांपनाथ, दुदका, कुड़की और हुंडी अच्छे लगे। देवता मोमबांबा थोड़े रहस्यमयी प्रतीत हुए। रानी का पूर्व जन्म का प्रसंग, बांकेलाल और रुस्तम का राक्षस से खतरनाक युद्ध, वायुलाल की विद्या, सांपनाथ का जानलेवा संघर्ष - ये सब पढ़ने में आनंद आया। जलेबी एक बार फिर इस उपन्यास में आपको नजर आएगी।

मेरे विचार से उपन्यास तेज रफ्तार, दिलचस्प और पठनीय है। उपन्यास में पात्रों की भूमिका तथा उनके संवादों के साथ-साथ माया, जादू और तिलिस्म का भरपूर उपयोग किया गया है जो पाठकों को बांधे रखता है। जिस प्रकार से कहानी में रहस्यों को परत-दर-परत पिरोया गया है और फिर एक-एक कर रहस्यों की परतें खुलती जाती हैं, यह बहुत मनोरंजक लगा। कहानी किस समय पर क्या मोड़ ले लेगी, इसका अनुमान लगा पाना भी काफी कठिन हो जाता है।

निःसंदेह कुछ रहस्य तो श्रृंखला के अगले उपन्यास "नागराज की हत्या" में ही खुलेंगे, वहीं आने वाले कुछ और रहस्य आगे की कहानी में रोचकता भी पैदा करेंगे! 

उपन्यास पढ़ने के बाद मुझे ऐसा लगा कि उपन्यास का मुखपृष्ठ (कवर) कहानी के अनुसार डिजाइन नही किया गया है । 
मुझे इस उपन्यास की कहानी में दो कमियां लगीं:
प्रथम कमी - मुख्य पात्र देवराज चौहान और मोना चौधरी इस उपन्यास में अधिक एक्शन में नजर नहीं आते हैं। इस उपन्यास में दोनों अपने साथियों से ज्यादातर सिर्फ बातचीत ही करते रहते हैं। देवराज चौहान और मोना चौधरी को अक्सर एक्शन में देखने की उम्मीद रखने वाले पाठक यहां थोड़े निराश हो सकते हैं।
द्वितीय कमी - पारसनाथ, महाजन और मोना चौधरी बार-बार वायुलाल से एक ही तरह की बातें दोहराते रहते हैं जो कि थोड़ा उबाऊ लगा।

अपने विचारों से कमेंट्स के द्वारा हमें अवश्य अवगत करवाएं। हमे आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8/10

02 मार्च 2022

देवदासी - अनिल मोहन

उपन्यास: देवदासी
लेखक: अनिल मोहन
श्रेणी: माया, जादू, तिलिस्म तथा रोमांच
पेज संख्या: 272
कदम कदम पर मौत से भरी दीवानगी! हर कोई सामने वाले का गला काटकर जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधना चाहता था!

'देवदासी' चार उपन्यासों की श्रृंखला का प्रथम भाग है। इस उपन्यास से एक बार फिर देवराज चौहान और मोना चौधरी का पूर्व जन्म का सफर आरंभ हो रहा है जहां कदम-कदम पर नए जानलेवा हादसे उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

उपन्यास के मध्य से लिया गया एक अंश: 
** कोई और होता तो मन ही मन हिल जाता रात का ऐसा माहौल देखकर। 
देवराज चौहान की गंभीर निगाह हर तरफ जा रही थी। 
"कैसा लग रहा है देवा?" अब वो आवाज फुसफुसाहट की अपेक्षा स्पष्ट कानों में पड़ी। 
देवराज चौहान ने आवाज की दिशा की तरफ देखा तो कोई न दिखा। 
"तुम.. तुम यहां मुझे अपना रूप दिखाने...." **


उपन्यास के आरंभिक दृश्य में अचानक पेशीराम उर्फ फकीर बाबा की आवाज सुनकर कार चला रहा देवराज चौहान चौंक जाता है। पेशीराम उसे आने वाले खतरे की सूचना देकर अदृश्य हो जाता है। 

** "वक्त कम है देवा। सारे ग्रह केंद्रबिंदु पर पहुंचने शुरू हो चुके हैं। वो कभी भी अपना असर...।" 
"मैं जहां जा रहा हूं, वहां मेरा पहुंचना बहुत जरूरी...!"
"जिद ना कर देवा। तेरे को...!"
"अगर कोई और बात होती तो मैं एक दिन क्या, तेरे कहने पर दस दिन बंगले में बैठ जाता। लेकिन..." **

तभी देवराज की कार रास्ते में खराब हो जाती है। देवराज कार के इंजन की जांच में लग जाता है। उसी समय एक ट्रक बहुत तेज गति से देवराज की ओर आता है। विष्णु सहाय नाम का एक आदमी सही समय पर आकर देवराज को धक्का देकर ट्रक के रास्ते से हटा देता है। देवराज तो बच जाता है परंतु उसकी कार क्षतिग्रस्त हो जाती है। देवराज सहाय का आभार प्रकट करता है। सहाय उसे अपनी कार में साथ चलने का प्रस्ताव देता है जिसे देवराज मान लेता है। बातचीत के दौरान सहाय अपनी एक समस्या देवराज को बताता है कि उसकी गांव में पड़ी जमीन को कोई भी ठेकेदार समतल नही कर पा रहा। सहाय देवराज से पूछता है कि क्या वो उसकी कोई सहायता कर सकता है! देवराज फोन करने की बात कहकर कार से उतर जाता है। 

** "चलता हूं।" कहने के साथ ही देवराज चौहान ने दरवाजा खोला। 
"मतलब कि तुम इस मामले में मेरी कोई सहायता नहीं कर सकते?" विष्णु सहाय ने एकाएक कहा। 
"कल फोन करके बताऊंगा।" **

घर पहुंचने पर देवराज जगमोहन से विष्णु सहाय और पेशीराम की चेतावनी के बारे में विचार-विमर्श करता है। दूसरी तरफ बांकेलाल राठौर और रुस्तम को रास्ते में एक घायल सब-इंस्पेक्टर महेशपाल मिलता है। महेशपाल उन दोनों से अपनी जान बचाने की विनती करता है क्योंकि उसके पीछे कुछ गुंडे लगे होते है। बांके और रुस्तम पहले तो साफ मना कर देते हैं, फिर गुंडों को देखने के बाद महेशपाल को अपने साथ ले लेते हैं ताकि उसे कुछ समय के लिए एक सुरक्षित ठिकाना दे सकें। 

** वो तीनों जैसे गुस्से से भरे, किसी को ढूंढ रहे थे। 
"लफड़ा होएला बाप!" 
बांकेलाल राठौर ने सीट पर पड़े पुलिस वाले को देखा। 
"भयो खाकी वर्दी!" बांकेलाल राठौर ने... **

इधर एक अन्य समानांतर दृश्य में बाजार में एक चोर मोना चौधरी का पर्स छीनकर भाग जाता है। मोना उसका पीछा करती है। रास्ते में एक हवलदार वीरेंद्र चोर को पकड़ लेता है। मोना अपना पर्स वापस मांगती है पर उसकी वीरेंद्र से बहस हो जाती है और वीरेंद्र उन दोनों को पुलिस स्टेशन ले जाता है। वहां इंस्पेक्टर लोकनाथ मोना को पहचान लेता है और एक प्रस्ताव देता है कि वो मोना को जाने देगा अगर मोना उसकी एक समस्या हल कर दे। मोना किसी तरह वहां से निकल आती है। 

** "जाओ।" लोकनाथ ने गंभीर स्वर में कहा - "मैं तुम्हे रोकूंगा नही।" 
मोना चौधरी ने दरवाजे की तरफ हाथ बढ़ाया कि लोकनाथ कह उठा।
"इंस्पेक्टर लोकनाथ कहते है मुझे। मन करे तो फोन कर देना।..." **

सब घटनाओं के तार कुछ इस प्रकार से आपस में जुड़ते हैं कि देवराज, जगमोहन, बांके, रुस्तम, सोहनलाल, नगीना और मोना, पारसनाथ, महाजन एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं और घटनाओं के चक्र में बुरी तरह उलझ जाते हैं। सब उसी रास्ते पर आगे बढ़ते चले जाते हैं जो उनके पूर्व जन्म की ओर जाता है।

विष्णु सहाय की गांव में खरीदी हुई जमीन समतल क्यों नही हो पा रही थी? 
क्या देवराज चौहान ने विष्णु सहाय की मदद की? 
इस बार देवराज, मोना और इनके साथियों के रास्ते एक कैसे हुए? 
कहां से आई प्रेमा और उसने क्या हरकतें की? 
पूर्व जन्म का रास्ता कैसे खुला और किसने खोला? 
कौन थी रानी और क्या इच्छा थी उसकी? 
वायुलाल कौन था और क्या उद्देश्य था उसका? 
जलेबी की क्या भूमिका थी और वो क्या चक्कर चला रही थी? 
सत्तू कौन था, कहां से आया और क्या चाहता था? 
इस बार पूर्व जन्म में देवराज और मोना का टकराव किस तरह के खतरों से होने वाला था? 
किस प्रकार देवराज, मोना और इनके साथी पूर्व जन्म में आने वाले खतरों का सामना कर सके? 
इन सब सवालों के उत्तर पाने के लिए आपको यह उपन्यास पढ़ना होगा!

चलिए, अब कहानी की बात की जाए! उपन्यास में पूर्व जन्म की कहानी की शुरुआत बढ़िया हुई है। कहानी घुमावदार होने के साथ-साथ तेज रफ्तार भी है। पूर्व जन्म के खतरों और रहस्यों के बारे में पढ़ना रोचक रहा। देवदासी उपन्यास का अंत अगले भाग "इच्छाधारी" को पढ़ने के प्रति एक उत्सुकता सी जगाता है।
इस उपन्यास में आपको दोनों मुख्य पात्रों देवराज चौहान, मोना चौधरी के अतिरिक्त जगमोहन, सोहनलाल, बांकेलाल राठौर, रुस्तम राव, नगीना, पारसनाथ, महाजन, विष्णु सहाय, जमींदार, सत्तू, प्रेमा, रानी, जलेबी, वायुलाल इत्यादि पात्र भी पढ़ने को मिलेंगे। 
देवराज और जगमोहन ने कहानी में बेहतरीन मनोरंजन किया है। मोना चौधरी अपने चिर-परिचित अंदाज में दिखी। उपन्यास में अधिकतर पात्रों के संवाद और उनकी भूमिका अच्छी बन पड़ी है खासकर बांकेलाल राठौर के संवाद, नगीना की एंट्री, रानी की बातें, सत्तू के तेवर और जलेबी का चक्कर। 

मुझे कहानी में एक कमी ये महसूस हुई कि लेखक ने देवराज और मोना को एक साथ पूर्वजन्म के रास्ते पर लाने के लिए जिस तरह से घटनाओं का आपस में तालमेल बिठाया, वो कुछ कमजोर लगा। 

उपन्यास का मुखपृष्ठ (कवर पेज) सामान्य ही लगा। उपन्यास में शाब्दिक गलतियां काफी कम हैं जिस कारण उपन्यास पढ़ते समय और भी अच्छा महसूस होता है। 

मेरे अनुसार अनिल मोहन के प्रशंसकों के लिए तो ये उपन्यास पठनीय है ही। अगर माया, जादू और तिलिस्म में रुचि है तो अन्य पाठक भी इस उपन्यास को पढ़कर अपना मनोरंजन कर सकते हैं।

हमें अपने विचारों से कमेंट्स के द्वारा अवश्य अवगत करवाएं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8/10

19 फ़रवरी 2022

पहरेदार - अनिल मोहन

उपन्यास: पहरेदार
लेखक: अनिल मोहन
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
पेज संख्या:240

         एक उपन्यास और दो कहानियाँ - एक पूरी, एक अधूरी।

अनिल मोहन द्वारा लिखित उपन्यास 'पहरेदार' एक ऐसा उपन्यास है जिसमे दो‌ अलग-अलग कहानियाँ है जो कि देवराज चौहान के कारण एक बार आपस में मिलती हैं और फिर अलग-अलग हो जाती हैं।
यहां पर विशेष बात ये है कि मुख्य कहानी जो कि एक इंस्पेक्टर सूरज यादव पर केन्द्रित है, वो तो इसी उपन्यास में संपूर्ण हो जाती है परंतु देवराज चौहान वाली कहानी अधूरी ही रह जाती है।

उपन्यास  से लिया गया एक अंश:
* गृहमंत्री जी ने इंटरकॉम पर अपने सिक्योरिटी चीफ इंस्पेक्टर सूरज यादव को बुलाया। 
इंस्पेक्टर सूरज यादव दिल्ली पुलिस का होनहार, बेहद सख्त और अपने फर्ज को जान पर भी खेलकर अंजाम देने वालों में से था। सूरज यादव की काबलियत को पहचानने पर ही, उसका रिकॉर्ड देखने के पश्चात ही गृहमंत्री जी ने उसे अपनी सेवा में लिया था। उनकी सुरक्षा में ढेर सारे खतरनाक कमांडोज थे। लेकिन गृहमंत्री जी को इंस्पेक्टर सूरज यादव पर पूरा भरोसा था। *

'पहरेदार' एक ऐसे जाबांज इंस्पेक्टर की कहानी है जो सत्य के लिए गृहमंत्री तक को गोली मारने से पीछे नहीं हटता। CBI का एक एजेंट सूरज यादव उन ‌लोगों की तलाश में है जो भारत की आंतरिक ‌सुरक्षा से जुङी महत्वपूर्ण फाइलें अन्य देशों तक पहुंचाते हैं। 

इसी सिलसिले में जांच करते हुए सूरज यादव देश के गृहमंत्री से भी जा टकराता है। सूरज यादव की जिंदगी का यही निर्णय, गृहमंत्री से टकराना, उसके जीवन में तूफान खड़ा कर देता है। सूरज यादव गृहमंत्री पर इल्जाम तो लगा देता है पर उसे सही साबित नहीं कर पाता। इस चक्कर में उसकी नौकरी पर भी तलवार लटक जाती है । दूसरी तरफ गृहमंत्री से छीने गये महत्वपूर्ण कागजात भी सूरज डकैती मास्टर देवराज चौहान को गलतफहमी में सौंप देता है।

यही से ये कहानी एक नया मोड़ ले लेती है और सूरज यादव के मित्र इंस्पेक्टर मेहता की जान भी चली जाती है। अपने मित्र की मौत का बदला लेने के लिए, स्वयं को बेगुनाह साबित करने के लिए और असली मुजरिम को सामने लाने के लिए सूरज यादव जा टकराता है कानून के दुश्मनों से!!

द्वितीय कहानी है देवराज चौहान द्वारा एक गोल्ड वाॅल्ट को लूटने की लेकिन यह कहानी इस उपन्यास में पूर्ण ही नहीं होती‌। उपन्यास में इस कहानी का सिर्फ कुछ आधार ही बताया गया है।

"एक वजह से गोल्ड वाॅल्ट में आज तक डकैती करने की किसी की हिम्मत नहीं हुयी और वह वजह थी बीस फीट की गैलरी। सारी सुरक्षा व्यवस्था तोङकर अगर गोल्ड वाॅल्ट के भीतर पहुंच भी जाया जाए तो बीस फीट की गैलरी रूपी मौत के रास्ते को पार करके वाल्ट के उस दरवाजे तक नहीं पहुंचा जा सकता, जिसके पास करोड़ों अरबों की दौलत मौजूद है।"

क्या इंस्पेक्टर सूरज यादव अपनी नौकरी को बचा सका?
क्या सूरज यादव को वो कागजात देवराज चौहान से हासिल हो सके?
आखिर इस षड्यंत्र के पीछे कौन था जो देश के महत्वपूर्ण कागजात गद्दारों को दे रहा था?
क्या देवराज चौहान ने उन कागजातो का फायदा उठाया या उन्हे सही हाथो में पहुंचाया?
इन सभी सवालों के आपको जवाब मिलेंगे पहरेदार उपन्यास को पढ़ कर..

उपन्यास में एक जासूस की जिंदगी को लेकर बहुत अच्छी बात कही गई है -
"हम लोग जिस धंधे में हैं, उसमें तभी तक जिंदगी बची रह सकती है जब तक मन की बात मन में रहे। सीक्रेट एजेंट उस वक्त तलवार की धार पर आ बैठता है जब उसकी मूवमेंट की खबर दुश्मनों को मिलने लगती है।"

उपन्यास में अगर गलतियों की बात करें तो बहुत ज्यादा गलतियाँ नजर आती है जो कि एक अच्छी-खासी कहानी को भी खराब कर देती है:

1. इस उपन्यास को जबरन देवराज चौहान सीरीज का उपन्यास बनाने की कोशिश की गयी है। जबकि इसे सिर्फ थ्रिलर के तौर पर प्रस्तुत किया जाता तो भी  बढ़िया था।
2. उपन्यास में दो कहानियाँ हैं - मुख्य कहानी सूरज यादव की व दूसरी कहानी देवराज चौहान की। सूरज यादव की कहानी इस उपन्यास में खत्म हो जाती है, वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।
3. उपन्यास में खलनायक का किरदार बहुत कम व बहुत कमजोर दिखाया गया है। गृहमंत्री से दुश्मनी करने वाला मात्र एक सामान्य सा व्यक्ति बन कर रह गया।
4. सूरज यादव CBI का एक होनहार एजेंट है, पर वह गृहमंत्री वाले केस में निर्णय ऐसे लेता है जैसे कोई अति उत्साहित नवयुवक हो।
5. अगर ये प्वाइंट बताता हूं तो उपन्यास के बारे में स्पॉइलर होगा जो की नही होना चाहिए। अगर आप उपन्यास को पढ़ते हैं तो अंत के क्लाइमेक्स में आप उसे देख सकते है।

अनिल मोहन के पहरेदार उपन्यास का द्वितीय भाग  सुलग उठा बारूद है, लेकिन दोनों उपन्यासों का मुझे आपस में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
जहां  पहरेदार  में सूरज यादव की कहानी खत्म हो जाती है वहीं देवराज चौहान की कहानी  सुलग उठा बारूद में समाप्त होती है। सुलग उठा बारूद उपन्यास अभी तक अप्रकाशित है। जिसके बारे में आपको अगली पोस्ट में सूचित कर देंगे।

उपरोक्त लिखित गलतियों को नजरअंदाज करते हुए अगर समग्र दृष्टि से देखे तो कहानी के स्तर पर प्रस्तुत उपन्यास बहुत रोचक है। रोचकता भी ऐसी कि पाठक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता। यहाँ तक कि देवराज चौहान के आगमन से उपन्यास में रोचकता और भी बढ जाती है।
अनिल मोहन व देवराज चौहान के प्रशंसकों के लिए यह एक पठनीय उपन्यास है।

रेटिंग: 7/10

14 फ़रवरी 2022

27 सेकेंड - अनिल मोहन


उपन्यास: 27 सेकंड 
उपन्यास सीरीज: देवराज चौहान सीरीज
लेखक: अनिल मोहन 
पेज संख्या: 270
 
                         उपन्यास कवर 

"उस तबाही को आने में सिर्फ 27 सेकंड ही बचे थे"
उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर पेज) पर प्रिंट की गई उपरोक्तलिखित टैग लाइन एक उत्सुकता सी जगाती है!

उपन्यास से लिया गया एक छोटा सा अंश: 
** "गुड! जैसा हमने प्लान बनाया था, वैसा ही हो रहा है।" घड़ी में से निकली आवाज कानों में पड़ी।
"यस सर।" 
"कार पर नजर रख रहे हो?" 
"जब तक वो चिप उसके कपड़ों में है, वो मुझे स्क्रीन पर नजर आता रहेगा।" **

इस उपन्यास का आरंभ होता है मार्केट की गैलरी के एक दृश्य से, जहां कुछ गुंडों से बचकर भाग रहा एक डरा-घबराया हुआ आदमी एक मोड़ पर मुड़ते ही वहां खड़े देवराज चौहान से टकरा जाता है और दोनो नीचे गिर पड़ते हैं। देवराज उससे भागने का कारण पूछता है और कारण जानने के बाद उस व्यक्ति को बचाने के लिए देवराज उसे छुपा देता है। जगमोहन के वापिस आते ही वो तीनों वहां से निकल जाते हैं। 

** "नही। मैने कोई गलत काम नहीं...।"
"कार में बैठ जाओ।" 
वो अनिश्चित सा खड़ा देवराज चौहान को देखता रहा। देवराज चौहान उसे। 
कुछ पल बीते कि वो व्यक्ति एकाएक कार की तरफ दौड़ा और पीछे वाला दरवाजा खोलकर फुर्ती से भीतर जा बैठा। दरवाजा बंद कर लिया। **

आगे वार्तालाप के दौरान वो व्यक्ति अपना नाम हर्षा यादव बताता है। एक सुरक्षित जगह पहुंचकर हर्षा दोनो को अपनी साथी मीनाक्षी से मिलवाता है। कुछ हिचकिचाहट के बाद हर्षा पूरा मामला देवराज और जगमोहन को बताना शुरू करता है। इस दौरान हर्षा जैसे ही जॉर्ज लूथरा और उसकी एक खतरनाक साजिश के बारे में बताता है, देवराज और जगमोहन चौंक उठते है। जॉर्ज लूथरा का नाम तथा पूरा मामला सुनने के पश्चात देवराज गंभीर हो जाता है। फिर देवराज इस बारे में कुछ करने का हर्षा और मीनाक्षी को आश्वासन देता है। 

** "फोन पर खबर कर देंगे।" जगमोहन ने कहा।
"कब तक?"
"एक-दो दिन में।" देवराज चौहान उठता हुआ बोला - "तुम्हारे पास हमारा फोन आ जाएगा कि काम हो सकता है या नही। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।" **

वहीं दूसरी तरफ सिक्का नाम का एक आदमी सोहनलाल से मिलता है और एक डकैती के सिलसिले में बात करने के लिए देवराज चौहान से मिलना चाहता है। सोहनलाल सिक्का की बात सुनने के बाद उसे कहता है कि पहले वो देवराज से इस बारे में बात करेगा और फिर उससे मिलेगा। सिक्का सोहनलाल की बात मान लेता है। सोहनलाल जगमोहन और देवराज चौहान से इस बारे में बात करने के लिए मिलता है। 

** सिक्का ने उसकी आंखों में झांका। 
"क्या मतलब?" 
"अगर इस काम के लिए देवराज चौहान तैयार हुआ तो फिर बात करूंगा तेरे से।" 
"तो ऐसा बोल।" मुस्करा पड़ा सिक्का - "देवराज चौहान तैयार... **

तो साथियों, यहां से शुरू होता है एक जानलेवा टकराव जिसमें दोनों तरफ से शातिर खिलाड़ी मैदान में उतर आते हैं और एक दूसरे को पराजित करने के लिए चाल पर चाल चलते हैं। टकराव आगे बढ़ने के साथ चुनौतियां और जान जाने का खतरा भी हर पल बढ़ता चला जाता है।

कौन थे हर्षा यादव और मीनाक्षी? वो गुंडे हर्षा के पीछे क्यों लगे थे? 
जॉर्ज लूथरा कौन था? उसका नाम सुनकर देवराज चौहान और जगमोहन चौंक क्यों उठे? 
हर्षा यादव और मीनाक्षी की पूरी बात सुनने के बाद देवराज चौहान ने क्या योजना बनानी आरंभ की? 
सिक्का किस डकैती के सिलसिले में सोहनलाल के माध्यम से देवराज चौहान से मिलना चाहता था? 
आखिर ये 27 सेकंड का क्या चक्कर था? ये 27 सेकंड  इतने महत्त्वपूर्ण क्यों थे और किस योजना में किसके द्वारा इनका उपयोग किया जाना था? 
क्या अंजाम हुआ इस जानलेवा टकराव का? 
किस-किस को अपनी जिंदगी गंवानी पड़ी इस टकराव में?
देवराज और जगमोहन के लिए खतरा इतना अधिक कैसे बढ़ गया? 
इस टकराव के समानांतर ही ऐसा और क्या घटित हो रहा था जिसे स्वयं देवराज, जगमोहन और सोहनलाल भी समझ नही पा रहे थे?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको यह उपन्यास पढ़कर मिल सकते हैं। 

कुल मिलाकर उपन्यास पढ़ने में बढ़िया लगा। उपन्यास में कई जगह रोमांचक मोड़ आते हैं। कहानी तेज गति और सस्पेंस से परिपूर्ण है। देवराज, जगमोहन और सोहनलाल का दुश्मन से टकराव अच्छा बन पड़ा है। दुश्मन द्वारा चली जाने वाली चालें और चालें चलने का तरीका पसंद आया। 

उपन्यास में आप देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल के साथ हर्षा यादव, रामदेव, मीनाक्षी, विनायक, सिक्का, जॉर्ज लूथरा, राजन, विम्मी, धींगड़ा, मुसीबर खान, पाटे खान, नूरा, साजन सिंह, राजा, सूरी इत्यादि पात्रों से मिलेंगे। हर्षा और मीनाक्षी के पात्र बढ़िया लगे। अन्य पात्र भी अपनी जगह ठीक लगे।

उपन्यास का मुखपृष्ठ (कवर पेज) कहानी के अनुरूप ही डिजाइन किया गया है। सफेद कागज पर उपन्यास की प्रिंटिंग अच्छी की गई है और शाब्दिक गलतियां भी अधिक नहीं हैं। 

मेरे विचार से अनिल मोहन का यह उपन्यास पाठकों को एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए। उपन्यास पढ़ते समय कहीं ठहराव या बोरियत का अनुभव होने की संभावना कम ही है।

कमेंट्स के द्वारा हमें अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

रेटिंग: 8/10

15 जनवरी 2022

हाईजेकर - अनिल मोहन


उपन्यास : हाइजैकर 
उपन्यास सीरीज : देवराज चौहान सीरीज 
लेखक : अनिल मोहन 
पेज संख्या : 336 
                                     उपन्यास कवर

उपन्यास से लिया गया एक अंश:
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और कश लेकर शांत स्वर में कह उठा - "मैं पहले ही इंकार कर चुका हूं कि मैं कोई काम करने के मूड में नहीं हूं।"
लुकास मुस्करा पड़ा। बोला - "मुझे तुम जैसे लोग पसंद हैं।" इसके साथ ही वो उठा और गाउन की जेब से रिवॉल्वर निकालकर जगमोहन के पास पहुंचा और उसके सिर पर रिवॉल्वर की नाल लगाकर मीठे स्वर में कह उठा - "अब क्या इरादा है देवराज चौहान?"
देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी। 
जगमोहन के दांत भिंच गए।
जेम्स वर्ली हड़बड़ाकर कह उठा....

कहानी की शुरुआत होती है ग्रीस के एक नाइट क्लब के दृश्य से जहां देवराज चौहान और जगमोहन आनंदमय शाम बिता रहे हैं। अचानक देवराज की वहां एक पुराने परिचित जेम्स वर्ली से मुलाकात होती है। जेम्स देवराज को अपने बॉस लुकास से मिलने का अनुरोध करता है जो कि संयोग से इसी नाइट क्लब का मालिक होता है। मुलाकात के दौरान लुकास देवराज को एक काम करने के लिए कहता है पर देवराज मना कर देता है। लुकास गुस्से में आकर जगमोहन को बंधक बना लेता है और देवराज को काम करने के लिए मजबूर करता है। जेम्स लुकास को समझाने की कोशिश करता है पर लुकास उसकी एक नही सुनता। मजबूरीवश देवराज लुकास की मांग पूरी करने की योजना बनाने में जुट जाता है पर साथ ही जेम्स की सहायता से जगमोहन को छुड़ाने और लुकास को सबक सिखाने की योजना पर भी काम शुरू कर देता है। 

देवराज चौहान भी मुस्कराया। 
"गन है तुम्हारे पास?" 
"इंतजाम हो जाएगा। तुम्हारा प्लान क्या है?" जेम्स वर्ली ने पूछा।
"जल्दी बताऊंगा प्लान भी।"
"लुकास को कब फोन करोगे?" 
"पांच-छ: दिन बाद। उसे इंतजार करने दो।"

इसी बीच भारत में मुंबई की ओर जा रहे एक हवाईजहाज को देवराज चौहान और उसके साथी हाईजैक कर लेते हैं और एक यात्री की हत्या भी कर देते हैं। देवराज चौहान और उसके साथी हवाईजहाज को जबरदस्ती एक सुनसान सड़क पर उतरवा कर उसमे से स्टील के चार बक्से निकाल लेते हैं और बक्से अपनी वैन में डाल कर वहां से भाग जाते हैं। वैन लेकर वो लोग पहले से ही देखकर रखी हुई एक सुरक्षित जगह "मिसेज डिसूजा के घर" पर जबरन अधिकार कर लेते हैं और कुछ दिन के लिए वहीं छुप जाते हैं। 

"मुझे मत मारना।" मिसेज डिसूजा का स्वर कांप उठा - "मैं मर गई तो नीटू जीते जी मर जाएगा। उसे कौन देखेगा?" आंखों में आंसू आ गए।"
"तो तुम्हें हमारा यहां रहना मंजूर है!" 
"ह..हां."
हुसैन ने रिवॉल्वर हटा ली। 
मिसेज डिसूजा गहरी-गहरी सांसें लेने लगी। आंखों में आए आंसुओं को साफ किया।

हाईजैक और स्टील के बक्सों की लूट की खबर सुनते ही सरकार में हड़कंप मच जाता है। गृहमंत्री जी तुरंत इंस्पेक्टर वानखेड़े और कुछ महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों के साथ मीटिंग करते हैं। गृहमंत्री जी कोई कदम उठा पाएं, इससे पहले ही राष्ट्रपति महोदया देश की सबसे खतरनाक सरकारी इन्वेस्टिगेशन संस्था "जिन्न" को इस केस की जांच करने का आदेश दे देती हैं। 

"फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी।" गृहमंत्री जी के होंठों से निकला - "आपका मतलब कि जिन्न को?" 
"जी हां। हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है। जिन्न यानि कि फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी इस काम में दखल देगी। बेहतर होगा कि आप वानखेड़े साहब के अलावा किसी और को इस काम में न डालें।" 
"मैं समझ गया राष्ट्रपति महोदया।" इसके साथ ही लाइन कट गई।

जिन्न संस्था तुरंत एक्शन में आ जाती है और उसी समय इमरजेंसी मीटिंग बुलाई जाती है। इधर हवाईजहाज के हाईजैक में देवराज का हाथ होने का समाचार सुनते ही नगीना और सोहनलाल भी परेशान हो जाते हैं और अपने स्तर पर इसकी छानबीन शुरू कर देते हैं। इस छानबीन के दौरान उनका जिन्न और इंस्पेक्टर वानखेड़े से भी आमना-सामना होता है।

ग्रीस में लुकास को देवराज चौहान से ऐसा क्या काम निकलवाना था कि उसने जगमोहन को बंधक बना लिया? 
क्या देवराज चौहान जगमोहन को लुकास से छुड़वा सका और लुकास को सबक सिखा सका? 
ऐसा क्या था उन स्टील के बक्सों में जिसके लिए देवराज चौहान ने भारत में हवाईजहाज को हाईजैक कर लिया?
हाइजैक हुए हवाईजहाज से स्टील के बक्सों की लूट की खबर सुनकर सरकार में हड़कंप क्यों मच गया - वो भी ऐसा हड़कंप कि जिन्न जैसी संस्था को इस केस में दखल देना पड़ा? 
देवराज चौहान ग्रीस में लुकास के लिए काम कर रहा था और इसी समयावधि में भारत में हवाईजहाज का हाईजैक भी कर रहा था - आखिर ये क्या चक्कर था? 
क्या नगीना और सोहनलाल इस गुत्थी को सुलझा सके?
मिसेस डिसूजा और नीटू की क्या भूमिका थी इस सारे घटनाक्रम में? 
क्या जिन्न संस्था इस केस को हल कर पाई?  

इन सभी प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर प्राप्त कर सकते हैं।

उपन्यास में आपको देवराज चौहान तथा जगमोहन की संक्षिप्त से थोड़ी ही अधिक भूमिका के अलावा नगीना, सोहनलाल, जेम्स वर्ली, लुकास, नील, वीरेंद्र, मिसेज डिसूजा, नीटू, चींटा, हुसैन, संतराम, नवाब, सोया, जगजीत, इंस्पेक्टर वानखेड़े और जिन्न के कुछ विशेष एजेंट (नारंग, कपूर, मदनलाल, नीरा आदि) जैसे पात्रों के बारे में पढ़ने को मिलेगा। सहायक पात्रों में मुझे जेम्स वर्ली एवं चींटा के पात्र तथा जिन्न के एजेंटों की कार्यशैली अच्छी लगी। अन्य पात्र कहानी में अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

उपन्यास में शाब्दिक त्रुटियां गिनी चुनी ही हैं पर उससे कहानी के प्रवाह पर कुछ अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। 

अब कहानी के बारे में बात करते हैं! न सिर्फ उपन्यास की कहानी का आधार कमजोर है बल्कि अनेक जगहों पर पन्ने भरने के लिए संवादों को और कहानी को अनावश्यक रूप से खींचा गया है। लेखक ने कहानी में कल्पना का कुछ अधिक ही उपयोग किया है जिस कारण कहानी अपनी मजबूती खो देती है। 
हालांकि ये उपन्यास देवराज चौहान सीरीज का है पर इसमें देवराज चौहान का पात्र सिर्फ शुरू और अंत में ही नजर आता है, बाकी सारा उपन्यास तो सिर्फ देवराज चौहान के नाम के सहारे ही लिख दिया गया है। 
मेरे अनुसार अनिल मोहन एक लेखक के तौर पर देवराज चौहान सीरीज के इस उपन्यास के साथ न्याय नहीं कर पाए। अगर ये उपन्यास देवराज चौहान सीरीज के स्थान पर एक सामान्य थ्रिलर के रूप में प्रस्तुत किया जाता तो थोड़ा ठीक रहता। 
ये उपन्यास अगर आप न भी पढ़ें तो मेरे विचार से एक पाठक के तौर पर आप कुछ नही खोएंगे। 

अपने कमेंट्स के द्वारा हमें अपनी राय से अवश्य अवगत करवाएं।

रेटिंग: 4.5/10

21 अक्टूबर 2021

गनमैन - अनिल मोहन

उपन्यास 📖 - गनमैन
लेखक 📝 - अनिल मोहन
पृष्ठ 📃 - २५६

                               पुराना कवर

                                नया कवर

गनमैन - अनिल मोहन द्वारा रचित एक्शन से भरपूर उपन्यास जिसमे मशहूर डकैती मास्टर देवराज चौहान एक बार फिर आपके सामने हाजिर है तूफानी स्टाइल और अपने ख़ास दरिंदगी भरे अंदाज में।

उपन्यास के मुख्य पात्र कुछ इस प्रकार हैं:

देवराज चौहान - आपका अपना मशहूर डकैती मास्टर।

मोहनलाल - कनपटियों के पूरे बाल सफेद अलबत्ता सिर के बाल सिर्फ बीस प्रतिशत ही सफेद थे। पचपन साल की उम्र में भी वह चुस्त समझदार और सुलझा हुआ इंसान लग रहा था।

भगवान दास ठकराल - मुंबई की मुख्य हस्ती, खरबों की दौलत का इकलौता मालिक। कभी ठकराल फैक्ट्री में काम करने वाला बेहद मामूली इंसान हुआ करता था। कुछ करने की ललक थी उसमे, उसने किया और आज एक खरबपति था।

गौतम चंद - पचास वर्षीय सख्तजान व्यक्ति, सिर पर छोटे छोटे बाल, छोटी मूंछें, साढ़े पांच फुट लम्बाई बला का फुर्तीला। अपराध की दुनिया में अपना करियर शुरू किया। काबिल इतना कि जब भगवान दास ठकराल को सिक्योरिटी चीफ की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने गौतम चंद को अपना सिक्योरिटी चीफ बनाया। गौतम चंद ने भी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया और भगवान दास को कई बार मौत से बाल-बाल बचाया।

ममता कालिया - जवान खूबसूरत हसीना जो दिल्ली से मुंबई फिल्मो में अपनी शर्तों पर काम करने आई थी। मोहनलाल उस पे अपना दिल हार बैठा था और वो भी मोहनलाल को पसंद करती थी। 

इसके अलावा नगीना और रंजन भाटिया का किरदार भी देखने को मिलता है पर इनकी भूमिका कुछ संवादों तक ही सीमित है। किरदार कम है जिसके कारण कहानी पर अच्छी पकड़ बनती है। 

कहानी की शुरुआत होती है देवराज चौहान और नगीना के वार्तालाप से:

"क्या सोचने लगे?" नगीना ने देवराज चौहान को निहारते हुए पूछा।
"नगीना!" सोचों से बाहर आकर देवराज चौहान ने नगीना की चेहरे पे निगाह टिका दी "जगमोहन के पास मौजूद सारा पैसा अब तक प्रयोगशाला पर लग चुका होगा या फिर समाप्त होने वाला होगा। मैं अपने अरबों रूपया प्रयोगशाला पर लगा चुका हूँ। उधर प्रयोगशाला के लिए जगमोहन को पैसों की कभी भी जरूरत पड़ सकती है। मैं नहीं चाहता की प्रयोगशाला की प्रगति का काम रुके। मैं जल्द-से-जल्द प्रयोगशाला को चालू हालत में देखना चाहता हूँ और इसके लिए हमें अभी बहुत ज्यादा दौलत चाहिए।"
नगीना की आँखों में व्याकुलता के भाव उभरे..

 देवराज चौहान किसी टापू पर एक वैज्ञानिक लैब का निर्माण करवा रहा है जो आने वाले समय में गजाला से टक्कर लेने के लिए बनवाई जा रही थी। गजाला वैज्ञानिक शक्तियों के सहारे विश्वसाम्राज्ञी बनना चाहती है। इसीलिए देवराज चौहान जगमोहन को लैब का काम सौंपता है। 
जगमोहन को टापू पर काफी समय हो जाता है और इधर देवराज को चिंता होती है कि कैसे भी करके काम नही रुकना चाहिए। इसलिए देवराज चौहान सोचता है कि  कोई बड़ा हाथ मारे। वह तलाश करता है कि किस जगह पर डकैती डाले। पर अचानक एक दिन उसे एक सुपारी मिलती है जो कोई मोहनलाल नाम का व्यक्ति देता है। 

"पच्चीस करोड़ रुपये.." 
क्षण भर के लिए देवराज चौहान जड़-सा रह गया।
टकटकी बांधे वह मोहनलाल को देखता रह गया। मस्तिष्क में हैरानी का बवंडर उठ खड़ा हुआ था। एक हत्या की कीमत पच्चीस करोड़। देवराज चौहान को भारी गड़बड़ का अहसास हुआ।

आप सोच सकते हैं कि आखिर एक मर्डर के लिए कोई कितनी रकम दे सकता है - 10 लाख, 50 लाख या 1 करोड़! पर यहां तो एक मर्डर के 25 करोड़ मिल रहे थे।
 
देवराज चौहान जब ये सुनता है तो उस सुपारी के लिए हाँ कर देता है पर इसके साथ ही मोहन लाल से कहता है कि कोई भी काम हाथ में लेने से पहले, मैं जिसके लिए काम कर रहा हूं, उसके बारे में जानकारी लेता हूं। यहां पर मोहनलाल फिर देवराज चौहान को एक ऑफर देता है कि तुम मुझसे या अपने किसी भी तरीके से मेरे बारे में पता नही करोगे, बदले में 25 करोड़ और यानी कि कुल 50 करोड़ रुपये तुम्हारे। देवराज चौहान इसके लिए मंजूरी दे देता है और फिर शुरू होता है ठकराल की सुपारी का खेल!


क्या देवराज चौहान ठकराल को खत्म कर पाया ?
क्या सच में मोहनलाल देवराज चौहान के साथ कोई खेल खेल रहा था ?
सिर्फ एक मर्डर के लिए 25 करोड़ की सुपारी क्यों मिली देवराज चौहान को ?
क्या देवराज चौहान अपनी कोशिश में कामयाब हो सका या इस बार उसे नाकामी का मुंह देखना पड़ा ? 
ऐसे ही और भी काफी सवाल है जिनके जवाब आपको मिलेंगे सिर्फ गनमैन को पढ़ कर!


उपन्यास तेज रफ़्तार और एक्शन थ्रिलर से भरपूर है। एक बार पढ़ना शुरू किया तो खत्म किए बिना नहीं छोड़ा जाता। जैसे कि अनिल मोहन जी के अधिकतर उपन्यास यादगार होते है, ये भी वैसा ही एक उपन्यास है - काफी समय तक याद रहने वाला।
अगर कवर के बारे में बात करे तो कवर अच्छा है। पुराने कवर अच्छे रहते थे। अगर उपन्यास कभी रिप्रिंट हुआ तो उम्मीद है कवर काफी आकर्षक और बढ़िया बनाया जा सकता है।

रेटिंग :- 7/10

29 सितंबर 2021

दांव - अनिल मोहन

उपन्यास 📖 : दांव 
लेखक ✍ : अनिल मोहन 
पृष्ठ संख्या 📃 : 241

अनिल मोहन के खास स्टाइल में लिखा गया एक ख़ास उपन्यास।


इसी उपन्यास से एक अंश : 👇

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। करोड़ों की बैंक डकैती की रकम पास होने पर मैं जगतार से बचने की खातिर पुलिस के पास चली जाऊं?"

"तो फिर मरो | यह दौलत दूसरों के काम आएगी।" जुगल किशोर ने सपाट स्वर में कहा “अक्ल से काम लो बेवकूफ! वह पुलिस वाला तुम्हें गारंटी देता है कि उसे तुमसे सिर्फ जगतार के खिलाफ गवाही और सबूत चाहिए। वह जानता है कि तुम्हारे पास सूटकेसों में कोई कीमती सामान है। इस पर भी वह तुम्हें कुछ नहीं कह रहा और छोड़ने की गारंटी देता है तो तुम्हें...।”

"बकवास करता है वह।" दांत भींचे वह दबे स्वर में चीख उठी “तुम पुलिस वालों को नहीं जानते। इनकी बातों पर मैं विश्वास करके बरबाद नहीं होना चाहती। यह मेरी दौलत छीन लेंगे। उसके बाद या तो मुझे जेल में ठूंस देंगे, या फिर मेरी हत्या करके लाश कहीं फेंक देंगे। फिर खुद ही मेरी लाश का पंचनामा करके लावारिस करार देकर, जलाकर सारा किस्सा खत्म कर देंगे। मैं तुमसे कह रही हूं - मेरा भला करो। इन हालात से मुझे निकालो। जगतार से मुझे बचाओ। और तुम मेरे खैरख्वाह बनकर मुझे आत्महत्या करने की सलाह दे रहे हो कि मरकर मैं सारे झंझटों से मुक्ति पा जाऊंगी।" जुगल किशोर के होंठों से गहरी सांस निकल गई।

दांव उपन्यास जुगल किशोर नाम के पसंदीदा पात्र का है जिससे आप दो-एक उपन्यासों में पहले भी मिल चुके हैं और उसके कमीनेपन के किस्सों से बखूबी वाकिफ हैं। उसी जुगल किशोर से इस उपन्यास में आपकी मुलाकात होगी। 

चलिए, बढ़ते हैं अब कहानी की तरफ | रात के तीन बजे एक सुनसान जगह पर बनी बैंक में डकैती होती है और डकैती की दौलत के करोड़ों रुपए दो सूटकेस में बंद होते हैं। डकैती चार लोग करते हैं जिसमें एक खूबसूरत हसीना सुजाता सेठ भी शामिल होती है। सुजाता अपने साथियों को दगा देकर डकैती के करोड़ों रुपए लेकर भाग जाती है। इसे अब जुगल किशोर की किस्मत कहें या बदकिस्मती कि करोड़ों की दौलत लेकर भागती इसी खूबसूरत शह सुजाता सेठ से वह लिफ्ट मांग बैठता है जिसे डकैती की दौलत अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी थी। इस तरह इत्तफाक से जुगल उन लोगों के बीच में जा फंसता है जो बैंक डकैती के पश्चात डकैती के माल को छीनने के लिए एक दूसरे का गला काटते फिर रहे थे और जहां हर कोई एक दूसरे को रौंदते हुए करोड़ों की दौलत को पा लेना चाहता था । अनजाने में जुगल किशोर भी इस मौत से भरी दौड़ में शामिल हो गया था। 

क्या महाठग जुगल किशोर को वो करोड़ों की दौलत मिल पाई?

क्या करोड़ों की दौलत को तलाश करते सुजाता सेठ के साथी जगतार को सुजाता सेठ मिल पाई ?

क्या इंस्पेक्टर दत्ता दौलत की खुशबू पा सका? 

बनवारी लाल और प्रदीप गोयल जैसे ठगों से सुजाता ने दौलत को कैसे बचाया ?

इन्ही सब सवालों के जवाब जानने के लिए ज़रूर पढ़ें "दांव"।

उपन्यास तेज रफ्तार है और कई दिलचस्पी भरे हालात से गुजरने के बाद पाठक के दिमाग में अपनी छाप छोड़ जाता है । मुझे यकीन है कि दांव आपको बहुत पसंद आएगा। 

एक बार जरूर पढ़िए जुगल किशोर का एक और कारनामा... दांव और देखिये कि इस बार उसने क्या दांव चला !!

07 सितंबर 2021

अंडरग्राउंड - अनिल मोहन

 उपन्यास 📚: अंडरग्राउंड 

लेखक 📝: अनिल मोहन

पेज संख्या 📃: 460 (Kindle)

उपन्यास खरीदने का लिंक: अमेज़ॉन


एक ही दौलत को, एक ही वक़्त पर

कई लोग लूटने का प्रोग्राम बना चुके थे



उपन्यास से ही एक अंश:

"तुम?" देवराज चौहान के होंठों से निकला।

"हाँ... मैं...।"

"लेकिन तुम यहाँ कैसे?" कहते हुए देवराज चौहान ने विक्रम शर्मा की लाश पर नजर मारी, "और यह...।"

"इसे छोड़ो।" नशे की तरंग में रूपसिंह कह उठा--- "मैं तुम्हारा कसूरवार था। क्योंकि तुमसे लाखों रुपया ले लिया और तुम्हारा काम बनता-बनता मैंने बिगाड़ दिया। इन करोड़ों रूपयों पर तुम्हारा हक है, मेरी वजह से ये तुम्हारे हाथों से दूर हो गए थे और अब मेरी वजह से वापस आ गए। तुम्हारी अमानत जीप में पड़ी है, ले लो...।" कहने के साथ ही रुपसिंह ने आगे बढ़कर गन देवराज चौहान के हाथों में थमा दी।

देवराज चौहान रूपसिंह को देखे जा रहा था।

"मेरा जो काम अधूरा रह गया था, वह पूरा हुआ। मैं इस मामले से दूर हो जाना चाहता हूँ। कुछ इस तरह कि जैसे इन बातों से मेरा कभी वास्ता ही न रहा हो।"

"तुम यहाँ तक केसे पहुँचे?" देवराज चौहान ने शांत स्वर में पूछा।

"ये बात सोहनलाल से पूछ लेना। मैं चलूं...?"

देवराज चौहान मुस्कुराया। हौले से सिर हिला दिया।


भीड़ भरे चौराहे पर बनी बैंक की शाखा में एक निश्चित दिन करोड़ों की रकम आती थी जिसे इधर-उधर लाने पहुंचाने का काम गनमैन सुखराम और ड्राइवर विलायती राम करते थे। परंतु अब अचानक ही दोनों उस करोड़ों की रकम को उड़ाने की फिराक में थे क्योंकि सुखराम को बीवी के इलाज के लिए एक मोटी रकम की जरूरत थी तो ड्राइवर विलायती राम के बेटे का किसी ने अपहरण कर लिया था और उस से मोटी फिरौती मांगी गई थी । 

इधर देवराज चौहान अपने खास साथी जगमोहन के साथ बैंक वैन पर हाथ डालने की फिराक में था । वहीं पैंतीस हजारी का मालिक, अपने बाप का भी सगा न होने वाला जुगल किशोर भी कछुए की तरह इस दौड़ में शामिल था । 

तय वक्त पर भीड़ भरी सड़क पर देवराज चौहान वैन पर हाथ डालता है और वैन और उसमे मौजूद करोड़ों की दौलत कब्जे में कर लेता है । लेकिन एक गलती की वजह से वैन हाथ से निकल जाती हैं और फिर शुरू होता है वैन को तलाशने का काम, जो कि भूसे के ढेर में सुई को ढूंढने जैसा था ।


क्या देवराज चौहान वैन को ढूंढ पाया या फिर कोई और इस बार हाथ साफ कर गया?

इस बार आपने 35हजारी ने क्या कारनामा किया?

विक्रम शर्मा को किसने मारा?

क्या मिसेज कपूर को दौलत की खुशबू मिल पाई ? 

क्या इंस्पेक्टर वानखेड़े देवराज चौहान को गिरफ्तार कर पाया ?

रूपसिंह और सोहनलाल के साथ चिपके दौलत को तलाश करते जुगल किशोर के हाथ क्या आया ?

इन सभी सवालों के जवाब आपको मिलेंगे अनिल मोहन जी के उपन्यास अंडरग्राउंड को पढ़ कर।


उपन्यास तेज रफ्तार है और खास कर इसका अंत लाजवाब है ।

उपन्यास में जगमोहन और मिसेज कपूर के सीन आपको गुदगुदाएंगे खास कर के उनका पांच सौ का नोट बहुत याद आएगा । 

जहां एक ओर विक्रम शर्मा का किरदार आपको चौंकाएगा, वहीं रूपसिंह को भी आप आसानी से भुला नहीं पाएंगे । 


एक बार आपको जरूर पढ़ कर देखना चाहिए!!


02 सितंबर 2021

सूरमा - अनिल मोहन

उपन्यास 📖:- सूरमा

लेखक 📝:- अनिल मोहन

पेज 📄:- 482

प्रकाशक:- सूरज पॉकेट बुक्स

 उपन्यास खरीदने का लिंक - एमेजॉन लिंक


चंडीगढ़ हाईवे पर जीरकपुर के पास देवराज चौहान और जगमोहन की कार पेंचर हो जाती है । पेंचर लगाने वाला सूरमा नाम का व्यक्ति फटेहाल है । पैसे की तंगी ने उसे मोहताज बना रखा है ऊपर से वो अपनी खूबसूरत बीवी से तंग है जो की हमेशा पैसे को लेकर उसे सताती रहती है । उसका कहना है की अगर सूरमा उसे ढेर सारा पैसा देगा तभी वो उसको राजा बनाएगी । (राजा कैसे बनाएगी ये आपको उपन्यास पढ़ कर पता चल जाएगा)।

उधर जगमोहन वहीं पास में एक बैंक को देख कर उसमे डकैती की योजना बना लेता है और देवराज चौहान को तैयार कर लेता है । वो लोग वहीं पास में ही सरकारी क्वाटर्स में एक फैमिली की तरह रहने लगते हैं । सूरमा को वो अपने इस प्लान में शामिल करते हैं और सूरमा की बीवी देवराज चौहान की बीवी बन कर क्वाटर्स में रहने आ जाती है । तय दिन के मुताबिक डकैती होती है । लेकिन किया कराया सब पानी में । बिल्ली मुंह मार जाती है और फिर उपन्यास में तू कोन मैं खा मखा वाले जुगल किशोर की एंट्री होती है । साथ में है खूबसूरत बला जो अपने बाप की भी सगी नहीं। 


उपन्यास तेज रफ्तार है और एक बार उठाने के बाद रखने का मन नहीं करता । सूरमा का किरदार शुरू से अंत तक लाजवाब है। सरकारी क्वाटर्स के सीन दिलचस्प और मजेदार हैं । खास कर के बैंक के चपरासी बलबीर का वहां आना जाना और नोक झोंक जबरदस्त है। कुल मिला कर अनिल मोहन जी के खास स्टाइल में दिल से लिखा गया उपन्यास है ये ।


ये उपन्यास याद दिलाता है की किस्मत कहीं से भी छप्पर फाड़ कर इंसान को दौलतमंद बना सकती है । अपने सूरमा महाशय इस बात का उदाहरण हैं । 


वक्त निकाल कर ज़रूर पढ़े ।