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17 जून 2021

साक्षात्कार - नीलम जासूस कार्यालय

आज आप सबके लिए पेश है नीलम जासूस कार्यालय, दिल्ली के ओनर श्री सुबोध भारतीय जी के साथ हुई हमारी दिलचस्प बातचीत और कुछ सवाल जवाब जैसे आज के जमाने में एक प्रकाशक को क्या-क्या करना पड़ता है इत्यादि !!

1. सबसे पहले तो आप आपने परिचय दीजिए और आपने प्रकाशन संस्थान के बारे में बताए ? 
बंधू, मेरा नाम सुबोध भारतीय है, दिल्ली में ही जन्मा, पला, बड़ा हूँ। स्वभावतः में एक कलाकार हूँ, मेरी रूचि गायन, पाठन के अतिरिक्त लेखन में भी है, मुझे आप एक छोटा मोटा लेखक भी कह सकते हैं। वैसे में पिछले ४० वर्षों से मुद्रण व्यवसाय से जुड़ा हुआ हूँ। मेरी प्रकाशन संस्था का नाम नीलम जासूस कार्यालय है, जो लोकप्रिय साहित्य के सुनहरे दौर की वापसी के लिए कटि बद्ध है.


2. आप एक साल में लगभग कितनी किताबें पब्लिश करते हैं ? आप सिर्फ हिंदी साहित्य को ही प्रकाशित करते हैं या इंग्लिश साहित्य भी प्रकाशित करते हैं ?
अभी हमें एक साल नहीं हुआ है 10 महीने से भी कम समय में हम अब तक 40 किताबें प्रकाशित कर चुके हैं। इरादा तो 100 पुस्तकों का था पर Lockdown से काफी बाधा पहुंची है। 

हम हिंदी के साथ इंग्लिश में भी पुस्तकें प्रकाशित करने का इरादा रखते है। कोई पुस्तक हमारे अनुरूप होगी तो ज़रूर प्रकाशित करेंगे। 

3. आपके हिसाब से हिंदी साहित्य की कितनी कॉपी बिक जाती है ?
अभी हम नए हैं इस लिए ये कहना मुश्किल है की कितनी कॉपी बिक जाती है पर अब तक के अनुभव से इतना पता चला है की किताबें अब हज़ारों में नहीं सैकड़ों में बिकती हैं। जैसे अब फिल्मो की सिल्वर या गोल्डन जुबली नहीं होती सिर्फ कुछ दिन चलती हैं। 

4. आज के नए जमाने में आप पुराने समय में लुगदी साहित्य बोले जाने वाले उपन्यासों के प्रकाशन और इनकी पब्लिसिटी को कैसे मैनेज करते हैं ?
लुगदी साहित्य के लिए हम उन लेखकों को अप्रोच करते हैं जो आज कल नहीं छप रहे पर पुस्तक प्रेमी उनको अब भी दुबारा पढ़ना चाहते हैं। इसी लिए जर्जर अवस्था में, गले हुए कागज़ वाला 10 रूपये वाला नावेल 200 रूपये में खरीद रहे है। उसी या उस से कम कीमत में हम उन प्रेमियों को नया शानदार कागज़ पर छपा हुआ नावेल दे रहे हैं। वही हमारे लिए मौखिक पब्लिसिटी का आधार बन जाता है। सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म मार्केटिंग में काम आते हैं और उसके बाद रिटेलर भी अपने नखरे छोड़ कर हमें अप्रोच करता है।

5. नई पीढ़ी के लेखकों और पुरानी पीढ़ी के लेखकों में आपको क्या फर्क लगता है ?
सबसे बड़ा फ़र्क़ हमारे जीवन मूल्यों और भाषा का है। पुराने दिग्गज लेखक अश्लीलता परोसने से बचते थे, अगर ऐसा करना मजबूरी हो सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करते थे। उस समय के लेखकों की भाषा साहित्यिक श्रेणी में रखी जा सकती है पर आज तो भाषा का पूरा स्वरुप अंग्रेजी प्रधान हो गया है। नयी पीढ़ी के कम लेखकों में ही गहरायी है । 

6. काफी सारे पुराने प्रकाशन अब बंद हो गए हैं या बंद होने के कगार पर है फिर आप इसे कैसे मैनेज कर रहे है ?
हम सिर्फ पुराने लुगदी साहित्य प्रेमियों के दम पर प्रकाशन कर पा रहे हैं। उनका अपने प्रिय लेखकों के साथ भावनात्मक लगाव है। ज़्यादातर पाठक 45 वर्ष से अधिक के हैं, उनकी बालपन या जवानी की यादें इस साहित्य से जुडी हुई हैं। उस दौर में रेडियो,टेलीविज़न के बाद सबसे बड़ा टाइम पास ये नोवेल्स ही हुआ करते थे।

7. सुना है आपका प्रकाशन भी पुराना है पर काफी समय बंद रहा और अब आपने इसकी फिर से शुरुआत की है इसमें आपको क्या क्या समस्या आई ?
मेरे पिता स्वर्गीय सत्य पाल वार्ष्णेय अपने समय के सुविख्यात प्रकाशक थे जिनका दौर 1959 से 1969 तक चला। वेद प्रकाश कम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, कुमार कश्यप आदि लेखक इनके लिए नियमित नए उपन्यास लिखा करते थे। बचपन में मै इन सभी लेखकों के उपन्यास पढ़ा करता था। मगर जब होश संभाला तो पिताजी का प्रकाशन संस्थान बंद हो चुके थे, कुछ पारिवारिक बंटवारे और कुछ परिस्थितियों के कारण। मन में एक सोया हुआ अरमान रहा अपने पिता की प्रकाशन संस्था नीलम जासूस कार्यालय को पुनर्जीवित करने का। कम्बोज जी, शर्माजी के सुपुत्र वीरेंदर भाई के साथ परशुराम शर्माजी के सहयोग और प्रोत्साहन से ईश्वर ने ये सुनहरा अवसर दिया अपना सपना साकार करने का, सभी का आभारी हूँ। मेषु कम्बोज और राम पुजारी मेरे सगे छोटे भाइयों से भी बढ़ कर हैं जो हर पल मेरे साथ खड़े रहते है।

जहां तक समस्या की बात आयी हमें थोड़ा संदेह था की अब इनके ग्राहक नहीं होंगे या बहुत कम होंगे तब व्यावसायिक रूप से ये शुद्ध घाटे का सौदा होता। पर पहले सेट की घोषणा के साथ ही जिस तरह का रिस्पांस मिला हमारे हौसले बुलंद हो गए। अब तो हमारे पाठकों का वर्ग दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है।

8. उपन्यासों की कला/विद्या को जीवित रखने और फिर से पापुलर करने के लिए क्या क्या किया जाना चाहिए.. और इसमें एक प्रकाशक को क्या भूमिका निभानी चाहिए आपकी नजरों में ?
प्रकाशक का खुद एक अच्छा पाठक होना ज़रूरी है पहली बात, तभी वो सही उपन्यासों का चयन कर पाएंगे । दूसरे जब १० या २० रूपये की पुरानी कीमत वाला उपन्यास जब आप १५० या २०० रूपये की कीमत में आप बेचना चाहते हैं तो आपको सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी देनी होगी जिस से पाठक उसकी कीमत के बारे में कोई शिकवा ही न कर सके। तीसरी बात सब्र की है ये धंधा अब पूरी तरह से बदल चुका है धैर्य से बाज़ार का रुख देखना होगा। सोशिल मीडिया का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल ही दोबारा पाठकों को जोड़ पायेगा जो इस साहित्य को फिर से पॉपुलर कर सकता है। 

जहा तक प्रकाशक की भूमिका की बात है उसे नीयत साफ़ रखनी होगी, लेखकों और पाठकों दोनों के प्रति। वैसे आज के युग में प्रकाशन ऐसा ही है-एक आग का दरिया है और डूब के जाना है । 

9. इंटरनेट के आने से किताबो को क्या फायदा या नुकसान उठाना पड़ा ?
सबसे बड़ा नुकसान लोगों का किताबों से फोकस हट गया। मनोरंजन के असंख्य साधन उपलब्ध हो गए। नयी पीढ़ी को तुरंत वाला मनोरंजन चाहिए जो नेट से मिल जाता है, यही किताबों के बड़े नुकसान का कारण है।

10. आजकल काफी सारे पाठक हिंदी साहित्य से विमुख हो रहे है और इंग्लिश साहित्य, वेब सीरीज, स्मार्ट फोन की ओर जा रहे है आपकी नजरों में इसका क्या कारण है ?
इसका जवाब वही है - आज सबको हर चीज़ इंस्टेंट चाहिए जो इंटरनेट देता है | समय बदल रहा है और इस भागती दौड़ती दुनिया में किताब पड़ना तो एक ठहराव है जो इस युग के अधिकांश लोगों को नहीं भाता। 

11. आपके हिसाब से हिंदी साहित्य को दुबारा शिखर पर कैसे लाया जा सकता है ?
मुश्किल है पर असंभव नहीं है। इसकी शुरुआत स्कूली शिक्षा ही करनी होगी। आज जब किसी अभिभावक का बच्चा हिंदी में कम नंबर लता है तो वह शर्मिंदा होने की बजाय गर्व से इस बात को बताता है। जब बच्चा पूछता है डैडी उनहत्तर कितने होते हैं तो वह गर्व से हँसता हैं। ये अप्रोच गलत है आप जापान या चीन में ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते वो लोग अपनी मातृभाषा से प्यार और गर्व करते हैं।

12. क्या आपकी राय में सरकार को हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार में कोई कदम उठाना चाहिए ? अगर हा तो क्या कदम उठाए जाने चाहिए ?
सरकार को हिंदी का साहित्य सस्ता और सुलभ करना चाहिए। जो सार्वजानिक लाइब्रेरी की परंपरा थी उसका विस्तार करना चाहिए तथा हिंदी का प्रसार करने वाले प्रकाशकों को सस्ती दर पर कागज़ उपलब्ध करना चाहिए। 

13. सभी प्रकाशक शुरू के दो तीन महीने अपनी किताबो को हार्डकॉपी या पेपरबैक में देते है। उसके बाद किंडल एडिशन.. आप अपनी प्रकाशन की बुक का किंडल एडिशन क्यों नहीं देते जबकि काफी सारे प्रकाशक मानते है ई-बुक में आमदनी ज्यादा है ।
सबसे पहले आपको ये बात समझनी होगी की हार्ड कॉपी जब तक एक निश्चित मात्रा में नहीं बिकेगी प्रकाशक की लागत वापस नहीं आएगी। दुसरी बात लेखक को रॉयल्टी तभी मिलनी शुरू होगी जब प्रकाशक प्रॉफिट में आएगा। इस से पहले अगर ई-बुक निकाल दी गयी तो वो मुफ्त में वायरल हो कर सारे व्यापर को ध्वस्त कर देगी। जो पुस्तक अपनी लागत निकाल कर लेखक को भी रॉयल्टी दे चुकी है और अब उसकी हार्ड कॉपी भी मुश्किल से बिक रही है उसी पुस्तक की ई-बुक  निकालनी चाहिये। 

प्रकाशक यदि कॉपीराइट फ्री लेखकों के किंडल एडिशन या ई-बुक निकालता है उसको जो भी मिल रहा है सब प्रॉफिट ही है। न प्रिंटिंग और कागज़ की लागत और न ही लेखकों को रॉयल्टी देनी पड़ेगी।

सुबोध भारतीय जी का शुक्रगुजार हूँ कि इन्होंने अपना बहुमूल्य समय हमे दिया और हमारे सवालों का जवाब दिया । अपने व्यस्त टाइम टेबल और तीन-तीन उपन्यासों के प्रकाशन कार्य में व्यस्त होते हुए भी जो इन्होंने हमारे लिए समय निकाला, उसके लिए इनका हार्दिक आभार।

नीलम जासूस ने पुराने दिग्गज लेखकों को रिप्रिंट करना शुरू किया है । नीलम जासूस भविष्य में नए लेखकों को मौका भी देना चाहता है । बशर्ते लेखक की लेखनी में दम होना चाहता है। हाल फिलहाल में नीलम जासूस से सुरेश चौधरी जी का नया उपन्यास 'दंगा' आ रहा है ।
साथ ही नीलम जासूस कार्यालय आप सभी के लिए इसी हफ्ते तीन उपन्यास लेकर आ रहा है । अगर आपके नजदीकी बुक स्टॉल पर ना उपलब्ध हो तो आप नीलम जासूस कार्यालय से संपर्क करके इन उपन्यासों को ले सकते है।

सुबोध भारतीय
मोबाइल नंबर (व्हाट्सएप): 9310032466
नीलम जासूस कार्यालय - नई बोतल में पुरानी शराब




सुनहरे दौर के नगीने 

13 जून 2021

साक्षात्कार - बृजेश शर्मा (पैन नेम - अजिंक्य शर्मा)

आज आप सबके लिए प्रस्तुत है प्रख्यात लेखक ब्रजेश कुमार शर्मा जी का साक्षात्कार | ब्रजेश जी छतीसगढ़ के महासमुंद शहर में निवासरत हैं | इन्होने अपनी पेन नेम 'अजिंक्य शर्मा' से कई बेहतरीन जासूसी उपन्यासों की रचना की है और उपन्यास जगत की नयी पीढ़ी के लेखकों में से अपनी एक पहचान कायम कर चुके हैं |


ब्रजेश कुमार शर्मा

सवाल 01: सबसे पहले तो हम आपका परिचय जानना चाहेंगे - आपका नाम, आपकी एजुकेशन, आप कहाँ से है और आपकी रुचि किन चीजों में है ?

मेरा नाम ब्रजेश कुमार शर्मा है। मैंने मैथ्स से B.Sc. की है और विज्ञान में मेरी गहन रुचि है।  

मैं छतीसगढ़ के महासमुंद शहर में निवासरत हूं। मेरी रुचि किताबें पढ़ने, संगीत सुनने और नई-नई जगहों पर घूमने में है।

मैं स्थानीय अखबार में संवाददाता के रूप में कार्यरत हूं। साथ ही अजिंक्य शर्मा के पैन नेम से जासूसी उपन्यास भी लिखता हूं।


सवाल 02: आप आपने वास्तविक नाम की जगह पैन नेम से क्यों लिखते हैं ?

ये सवाल मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि मैं पैन नेम से क्यों लिखता हूं। आप कह सकते हैं कि मैं इस मामले में प्रेमचंद जी, सर जेम्स हेडली चेईज व अन्य वरिष्ठ लेखकों से प्रेरित हूं, जिन्होंने अपने मूल नाम से न लिखकर पैन नेम से लिखा।

प्रमुख वजह यही थी कि मैं काफी विविधतापूर्ण लिखना चाहता हूं। अलग-अलग जोनर की किताबें एक ही नाम से लिखने से कन्फ्यूजन की स्थिति निर्मित न हो इसलिए मैंने जासूसी उपन्यास पैन नेम से लिखना शुरू किया।


सवाल 03: आप इस फील्ड में कैसे आए और आप किस से प्रेरित हुए लेखन को लेकर ?

जासूसी उपन्यासों में मेरी काफी रुचि रही है। लेकिन 2005 के आसपास तक ही मैंने अधिकांश उपन्यास पढ़े थे। उसके बाद उपन्यास पढ़ना तो कम हो गया लेकिन रुचि अब भी बरकरार है।

इसी बीच मोबाइल के बढ़ते प्रयोग के बाद पुस्तकालयों की संख्या कम होने से मुझे लगने लगा कि उपन्यास छपना बंद हो गए। बाद में सोशल मीडिया पर किताबों से सम्बंधित ग्रुप्स से जुड़ने पर मुझे एहसास हुआ कि अब भी जासूसी उपन्यासों में रुचि रखने वाले लोग हैं। और वे चर्चा भी करते हैं कि अब जासूसी लेखक कम ही रह गए हैं। 

इसी से प्रेरित होकर मैंने अपना पहला उपन्यास 'मौत अब दूर नहीं' लिखा और किंडल पर प्रकाशित किया। मुझे उम्मीद नहीं थी कि उस उपन्यास को इतना पसंद किया जाएगा। अच्छा प्रतिसाद मिलने से फिर मैंने दूसरा उपन्यास 'पार्टी स्टार्टेड नाओ!' लिखा, जो कि एक स्लैशर थ्रिलर है। मैं इस उपन्यास में एक नई तरह की कहानी लिखना चाहता था और मौत अब दूर नहीं की तरह ही इसका भी अच्छा प्रतिसाद मिलने से फिर मैंने आगे भी लिखना जारी रखा और हर उपन्यास में पाठकों को कुछ नया देने की कोशिश की। 

मुझे खुशी है कि पाठकों ने मेरे प्रयासों को सराहा भी और मुझे निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि अन्य कई साथी लेखकों की तरह ही मैं भी जॉब करता हूं, जिससे लेखन के लिए समय निकालना मुश्किल होता है लेकिन फिर भी पाठकों के प्यार और प्रोत्साहन से प्रेरणा मिल रही है।


सवाल 04: कृपया अपनी संघर्ष गाथा के बारे में बताइये मतलब अपना पहला उपन्यास आपने कैसे लिखा? उसे लिखते समय और प्रकाशित करने में आपको क्या क्या परेशानियां आई ?

जैसा कि मैंने बताया, मेरा पहला उपन्यास 'मौत अब दूर नहीं' है, जो एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री है। किताब लिखना सुनने में तो बहुत आसान लगता है लेकिन जब मैंने लिखना शुरू किया, तब मुझे एहसास हुआ कि लेखकों को कितनी मुश्किल होती होगी। कई जगह कहानी थम जाती है और आगे सोचना मुश्किल हो जाता है। और भी कई तरह की समस्याएं आतीं हैं।

पुस्तक प्रकाशित कराना तो आजकल बहुत आसान हो गया है लेकिन असली चीज तो कंटेंट ही है। कई प्रकाशन पेड या फ्री सर्विस देते हैं, जिनसे किताब छपवाईं जा सकती है। वर्तमान में मेरी किताबें किंडल पर ही उपलब्ध हैं। आगामी 2-3 महीने में उन्हें हार्डकॉपी में लाने की योजना है क्योंकि पाठक लगातार हार्डकॉपी की मांग कर रहे हैं।


सवाल 05: आपका पसंदीदा उपन्यास और लेखक कौनसा है जिस से आपको हमेशा लिखने की प्रेरणा मिली ?

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी मेरे आदर्श रहे हैं, जिन्होंने हिंदी में इतना उत्कृष्ट लेखन किया है कि अंग्रेजी उपन्यासकारों को भी पीछे छोड़ दिया। मुझे उनके उपन्यास इतने पसंद हैं कि उनके कई उपन्यास मैंने 2-4 बार पढ़े हैं और कुछ उपन्यास तो 15-20 से भी अधिक बार पढ़े हैं। उनकी प्रशंसा करने के लिए तो सौ पन्ने भी कम पड़ जाएंगे।

मुझे शर्मा जी के राजेश, जगत, जयन्त, जगन-बन्दूकसिंह के लगभग सभी उपन्यास बहुत पसंद हैं। उनके सामाजिक उपन्यास भी बेहद पसंद हैं, जिनमें अपने देश का अजनबी, नयनतारा, पिंजरे का कैदी, पी कहां, एक रात आदि शामिल हैं। आदरणीय श्री शर्मा जी ने विभिन्न क्षेत्रों में एक से बढ़कर एक उपन्यासों की रचना की। उनकी लेखनी तो जिस विषय को छू देती थी, उस पर सोने जैसा उपन्यास लिख देते थे। वे भारत के स्टीवन स्पीलबर्ग की तरह ही थे, जिन्होंने अलग-अलग विषयों पर शानदार फिल्में बनाई हैं।

इंग्लिश लेखकों में मुझे डैन ब्राउन, माइकल क्रिस्टन आदि लेखक पसंद हैं।


सवाल 06: जिस विधा में आप लिख रहे है, आपकी नजर में उसका भविष्य क्या है?

जासूसी उपन्यास लेखन का क्षेत्र कुछ वर्ष पूर्व तक सिमटने लगा था लेकिन श्री संतोष पाठक जी, श्री शुभानन्द जी, श्री इकराम फरीदी जी, श्री कंवल शर्मा जी, श्री अनिल गर्ग जी जैसे लेखकों ने ऐसे समय में लिखकर जासूसी लेखन को नई ऊर्जा प्रदान की और अब ये जासूसी लेखन में शीर्ष लेखकों में शामिल हैं। अगर कुछ लेखकों के नाम मुझसे मिस हो गए हैं तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं। फिर बाद में और भी लेखक जुड़ते रहे। वर्तमान में कई लेखकों के उपन्यासों की बेहद सराहना की जा रही है, जिससे यही लगता है कि जासूसी लोकप्रिय साहित्य एक बार फिर स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसर है।

हॉरर भी जासूसी साहित्य से जुड़ा हुआ विषय मानें तो श्री चंद्रप्रकाश पाण्डे जी के हॉरर उपन्यास भी बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं।


सवाल 07:  सुना है कुछ दिनों में आपकी नई किताब आने वाली है | आप अपने पाठकों को उसके बारे में कुछ बताना चाहेंगे कि आपकी नई किताब किस तरह की है और किस विषय पर आधारित है ?

मेरी नई किताब जो मेरा आठवां उपन्यास है, थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री है और हर बार की तरह इसमें भी मैंने कुछ अलग लिखने की कोशिश की है। उम्मीद है 'द ट्रेल' की तरह ही ये भी पाठकों के विश्वास पर खरी उतरेगी।


सवाल 08: सुना है अभी तक की आपकी बुक्स (उपन्यासों) में सबसे बड़ी बुक आपने 'द ट्रेल' लिखी पर कुछ पाठको को अच्छी नही लगी या उनको आपसे कुछ शिकायत रही | आप उन्हे क्या जवाब देना चाहेंगे ?

'द ट्रेल' सचमुच मेरा अब तक का सबसे लंबा उपन्यास रहा है। ये उपन्यास एक लाख से भी अधिक शब्दों का है। मेरे ही दो उपन्यास 'अनचाही मौत' और 'पार्टी स्टार्टेड नाओ' दोनों को मिला भी दिया जाए, तब भी उनमें इतने शब्द नहीं हैं।

द ट्रेल के लंबे होने के मामले में भी पाठकों की अलग-अलग प्रतिक्रिया रही। कई पाठकों ने कहा कि उपन्यास कब खत्म हो गया, पता ही नहीं चला। इतने लंबे उपन्यास के बारे में जब पाठक ऐसा कहें तो ये सचमुच ही मेरे जैसे नए लेखक के लिए काफी प्रोत्साहित करने वाली बात है, जिसके लिए मैं सभी पाठकों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं।

कुछ पाठकों ने उपन्यास के अंत के एक प्रसंग को गैर जरूरी तो कुछ पाठकों ने जरूरत से ज्यादा लम्बा भी बताया। उन पाठकों की शिकायत को भी सर-आंखों पर लेते हुए मैं कहना चाहूंगा कि असल मैं उपन्यास इससे भी ज्यादा लम्बा था और इसे और अधिक लम्बा रखने से बचने के लिए ही करीब 20-30 पेज कम किए थे।


सवाल 09: आपके अभी तक 7 उपन्यास आ चुके है आप इनमे से किसे अपनी सबसे अच्छी रचना समझते है ?

ये कहना तो मेरे लिए मुश्किल है क्योंकि एक पिता के लिए ये बताना मुश्किल होता है कि वो अपनी कौन सी संतान को सबसे ज्यादा प्यार करता है। व्यवसायिक रूप से देखें तो 'काला साया' और 'द ट्रेल' ही मेरे अब तक के सबसे सफल उपन्यास रहे हैं।


सवाल 10: Pulp Fiction का भविष्य आने वाले समय में कैसा होगा.... उनकी चुनौती.....?

पल्प फिक्शन के सामने कई प्रमुख चुनौतियां हैं। अच्छा लेखन होना चाहिए। पायरेसी पर रोक लगनी चाहिए। और पूरी तरह रोक न लग सके तो कम से कम कमी तो आनी चाहिए। मोबाइल, इंटरनेट जैसे मनोरंजन के साधनों से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा है, जिन्होंने एक समय तो पल्प फिक्शन को काफी पीछे छोड़ दिया था।

यदि इसी प्रकार अच्छे लेखकों ने लिखना जारी रखा और पाठक संख्या बढ़ती रही तो पल्प फिक्शन का भविष्य आने वाले समय में और भी अच्छा हो सकता है। हमने पल्प फिक्शन का स्वर्णिम युग देखा है। क्या पता हीरक युग देखना अभी बाकी हो।


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|| साक्षात्कार के लिए बृजेश कुमार शर्मा जी का ह्रदय से धन्यवाद ||