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26 अगस्त 2022

मेजर बलवंत हिंदी उपन्यासकार

मेजर बलवंत हिंदी उपन्यास साहित्य में कर्नल रंजीत नामक ट्रेड नेम लेखक का एक पात्र था। कर्नल रंजीत के इसी पात्र की लोकप्रियता को देखते हुए किसी ने इसी नाम का लेखक खड़ा कर दिया और अलग अलग लेखकों ने मेजर बलवंत नाम से उपन्यास लिखे। मेजर बलवंत के नाम से किस किस लेखक ने लिखा है और वो कौन थे इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।

उपन्यासकार मेजर बलवंत के उपन्यास सूची:-
1. समुद्र का हत्यारा
2. फ्लैट नंबर 102
3. मौत की शाम
4. एजेंट जीरो
5. होटल गोल्डन स्टार
6. खूनी नक्शा
7. ब्ल्यू हैवन क्लब
8. इन्टरनेशनल षड्यंत्र
9. मौत की शतरंज
10. लावारिश लाश
11. ब्लैकमेलर की हत्या
12. जहरीले इंसान
13. जुङवा लाशें
14. आखिरी डकैती
15. ब्लैक बाॅस
16. फ्लैट में लाश
17. खूनी बंगला
18. निर्दोष अपराधी
19. कत्ल की रात
20. अपराधी की मौत
21. रिपोर्टर की हत्या
22. कैदी नंबर 314
23. खूनी रिश्ते
24. लाश का प्रतिशोध
25. मौत का सिलसिला
26 जल्लाद
27 बैंक रॉबरी
28 रिसीवर
29 इंटरनेशनल मिशन
30 खूनी चक्रव्यूह
31 फोटो का कत्ल
32 मूर्तियों की मौत
33 गुनाह का लावा
34 आग ही आग
35 कातिल फरिश्ता
36 नर्क का राजा 
37 दौलत की लंका
38 मैं इंतकाम लूंगा
39 षडयंत्र
40 कार में लाश
41 मौत ही मौत
42 टेलीफोन जासूस
43 मर्डर रिपोर्ट
44 साढ़े तीन मिनट
45 देवी दीदी
46 इकबाल-ए- जुर्म
47 मौत का व्यापार
48 थाने में डकैती
49 गोली और चीख
50 मजबूर कातिल
51 पाप का चक्रव्यूह

उपरोक्त जानकारी के अलावा किसी पाठक मित्र के पास कोई जानकारी हो तो कॉमेंट के जरिए हमारे साथ सांझा जरूर करे।।

15 अगस्त 2022

एम० एल० पाण्डेय हिंदी उपन्यासकार

हिंदी उपन्यास साहित्य में बाबू देवकीनंदन खत्री के बाद जिन लेखकों का नाम आता है उनमें अकरम इलाहबादी, इजहार असगर, आदिल रशीद,इब्ने शफी आदि का नाम आता है। इन्ही उपन्यासकारों में एक उपन्यासकार है श्री एम० एल० पाण्डेय...

एम० एल० पाण्डेय जी कौन थे कहा से थे इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है परंतु इनके उपन्यास तिलिस्मी जासूस कार्यालय न० १, कोफ्ता गिरा, इलाहाबाद ३ से मुख्य रूप से प्रकाशित होते रहे हैं। इसके अलावा मधुप जासूस नामक पत्रिका में भी इनकी रचनाएं प्रकाशित हुई है।
श्री एम० एल० पाण्डेय जी की उपन्यास सूची :-
१ रेतीला खज़ाना
२ काला नकाब पोश
३ हीरो की चोरी
४ इंसानी कुर्बानी
५ नाना पुत्र (सम्पूर्ण)
६ खूनी राजकुमारी
७ नीली छतरी (सम्पूर्ण)
८ सुबह का तारा
९ कैद न० ५५ (सम्पूर्ण)
१० मृत्युवाहक आँख
११ जयंत की फांसी
१२ प्रेतों का डेरा
१३ जादुई तलवार
१४ दो मुंहा शत्रु
१५ बर्मी गुंडे
१६ कैदी राजकुमार
१७ खजाने की खोज
१८ कबूतरी
१९ मांतेजुमा की बेटी
२० जाम्बासुर का नाती 
२१ तिलिस्म में हलचल
२२ भयानक चीख
२३ नारी की हत्या
२४ कुचली खोपड़ी
२५ तिलिस्मी दीवार
२६ तीन खून (सम्पूर्ण)
२७ काला मोती
२८ सात की गिनती
२९ फरार कैदी
३० सातवीं रात
३१ रत्नमय कुंए की लूट
३२ स्वर्ग लोक के हत्यारे
३३ बोलता हुआ मुर्दा
३४ तिलिस्मी लड़ाइयां
३५ सरकारी मेल की लूट
३६ दूसरा शिकार (सम्पूर्ण)
३७ फुयांचू के कारनामे
३८ ऐय्यारो का जाल
३९ जम्बासुरी चादर
४० पीताम्बर की प्रेमिका
४१ तिलिस्मी वन
४२ आनंदसिंह की रिहाई
४३ खूनी अदा
४४ निर्दोष अपराधिनी
४५ तूफान
४६ घातक संजीवनी
४७ बदमाशों का चक्कर
४८ शाही अंगूठी
४९ अजय का साहस
५० फुमांचू की वापसी
५१ हारी रोशनी
५२ पन्ता प्रेयसी
५३ भीरू भील (सम्पूर्ण)
५४ यूनानी गुंडा
५५ मृत्यु गुफ़ा
५६ मार्गिक भेड़िया
५७ चार चांडाल
५८ जिब्राल्टर का खूनी
५९ चित्रकार की लड़ाई
६० नजर की चोट
६१ सी-सूं की जागीर
६२ चार लाश
६३ हत्यारा
६४ खूनी हींग
६५ फुमांचु का प्रतिशोध
६६ दुष्ट फुमांचू
६७ जादुई दर्पण
६८ सुधा (सम्पूर्ण)
६९ दुष्टा का चंगुल
७० खूनी षडयंत्र
७१ मृत्यु संघर्ष
७२ दंतिले सर्पों वाला दल
७३ अदभुत मनुष्य
७५ अंतिम बलिदान

किसी भी पाठक मित्र के पास कोई जानकारी हो तो वो कॉमेंट के जरिए हमारे साथ सांझा करे...

03 अगस्त 2022

अनिल मोहन (प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार)

अनिल मोहन - हिंदी उपन्यास जगत में एक ऐसा नाम जिसे किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। 
                   अनिल मोहन जी

अनिल मोहन हिंदी उपन्यास जगत (लुगदी साहित्य) में एक बेहद प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। जासूसी, थ्रिलर एवं फैंटेसी पर आधारित उपन्यास लिखना इनकी विशेषता है। इनका पूरा नाम अनिल मोहन भारद्वाज है और ये दिल्ली में विकासपुरी क्षेत्र के निवासी हैं। 

हिंदी उपन्यास जगत में एक समय ऐसा भी था जब सिर्फ सुरेंदर मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा और अनिल मोहन की तिकड़ी ही मुख्यतः छाई हुई थी। उस समय मार्केट में बिकने वाले हिंदी उपन्यासों में अधिकांश उपन्यास इन तीनों के ही होते थे। उस दौरान अनिल मोहन के किसी भी उपन्यास की छपते ही 50,000 प्रतियां बिक जाती थीं। 

अनिल मोहन जी को लिखने का शगल तो शुरू से ही था परंतु कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते- होते उनका ये शगल उन्हें हिंदी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में खींच लाया। परंतु उस समय किसी भी नए लेखक के लिए शुरुआत में ही स्वयं के नाम से उपन्यास प्रकाशित करवा पाना बहुत कठिन होता था। प्रकाशक पहले नए लेखक को प्रेत लेखन में अवसर देकर परखता था। फिर अगर लेखक की लेखनी में दम हो, उसकी किस्मत अच्छी हो और प्रकाशक भी बढ़िया हो तो कुछ वर्षों में लेखक का स्वंय के नाम से उपन्यास प्रकाशित हो जाता था। बहुत से लेखकों का तो अपना उपन्यास प्रकाशित करवाने का सपना अधूरा ही रह गया था।

हमारे पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार अनिल जी ने भी अपने लेखन कैरियर के प्रथम 11 से 12 वर्षों तक प्रेत लेखन ही किया था और सिर्फ प्रेत लेखक के रूप में ही उन्होंने लगभग 300 से अधिक उपन्यास लिखे थे। उन्होंने अपना पहला उपन्यास इब्ने कफ़ी के नाम से लिखा, प्रेत लेखक के रूप में उन्होंने विभिन्न प्रकाशकों के लिए काम किया और कई ट्रेड नाम वाले लेखकों के नाम से प्रेत लेखन किया जैसे कि  नागपाल, राजवंश, मेजर बलवंत, मीनाक्षी माथुर कर्नल रंजीत इत्यादि। 

आखिरकार 1988 में वो समय भी आया जब अनिल जी का प्रथम उपन्यास "सबसे बड़ा हत्यारा" उनके नाम से प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास जब मार्केट में आया तो पाठकों ने इसे पसंद किया। इसके बाद अपने हर उपन्यास के प्रकाशन के साथ अनिल जी पाठकों के दिल में अपनी जगह बनाते गए और सफलता की सीढियां चढ़ते चले गए। अनिल जी के स्वयं के नाम से अब तक 250 से भी अधिक उपन्यास विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित किये जा चुके हैं। इनके काफी उपन्यास रीप्रिंट हो चुके हैं तथा इन्होंने कई उपन्यास अमेजन की वेबसाइट पर किंडल एडिशन में भी रिलीज किए हैं। कुछ प्रकाशकों ने इनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए इनकी अनुमति के बिना इनके कुछ उपन्यासों के रीप्रिंट तथा ऑडियोबुक्स रिलीज करने की कोशिश भी की थी जिसे अनिल मोहन ने कानूनी कार्रवाई के माध्यम से रुकवा दिया था।

अनिल मोहन के पसंदीदा लेखक अंग्रेजी उपन्यासकार जेम्स हेडली चेस हैं। अनिल जी एक वर्ष में 9 से 10 उपन्यास तक लिख देते थे। काफी वर्षों तक उन्होंने उपन्यास लिखने की ऐसी गति बरकरार रखी जिस कारण उनके द्वारा लिखे उपन्यासों की संख्या अधिक है। 

विभिन्न पाठकों के साथ अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स (व्हाट्सएप, टेलीग्राम, फोन, मुलाकात इत्यादि) पर हुए वार्तालाप के दौरान हमने ये पाया कि कई पुराने पाठकों के अनुसार अनिल मोहन ने प्रेत लेखन सहित कुल मिलाकर लगभग 700 से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं। हमारे लिए इस आंकड़े की पुष्टि करना कठिन है क्योंकि उस जमाने में हिंदी उपन्यासों का रिकॉर्ड अधिक गंभीरता से सहेजकर नही रखा जाता था। स्वयं अनिल जी के लिए भी उनके द्वारा लिखे गए उपन्यासों के नाम तथा उनकी संख्या की सही पुष्टि कर पाना कठिन होगा।

अनिल मोहन द्वारा रचे गए मुख्य पात्रों की लिस्ट में देवराज चौहान, मोना चौधरी, अर्जुन भारद्वाज, आर. डी. एक्स. (राघव धर्मा एक्स्ट्रा की तिकड़ी), विजय बेदी और जुगल किशोर के नाम उपस्थित हैं। साथ ही यादगार सहायक पात्रों की लिस्ट में सोहनलाल, जगमोहन, पारसनाथ, महाजन, महादेव, वानखेड़े, नगीना, गजाला, फकीर पेशीराम जैसे नाम शामिल हैं। 

अगर उपन्यास श्रृंखलाओं की बात करें तो अनिल मोहन ने देवराज चौहान, मोना चौधरी, अर्जुन भारद्वाज, आर डी एक्स, जुगल किशोर तथा विजय बेदी सीरीज के उपन्यास लिखे हैं। ये सब उपन्यास मुख्यत: जासूसी, थ्रिलर और फैंटेसी श्रेणी के हैं। इनमें से देवराज चौहान तथा मोना चौधरी सीरीज के उपन्यास पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं। अनिल जी ने सबसे अधिक उपन्यास देवराज चौहान श्रृंखला में लिखे हैं जो कि इनकी सबसे सफल श्रृंखला है। उपरोक्त लिखित उपन्यास श्रृंखलाओं के अलावा अनिल मोहन ने बिना किसी श्रृंखला वाले थ्रिलर उपन्यास भी लिखे हैं।

आपको अनिल मोहन द्वारा रचित काफी सारे उपन्यास ऐसे मिलेंगे जो पार्ट्स में लिखे गए हैं। एक ही कहानी 2, 3 या उससे भी ज्यादा उपन्यासों में जाकर पूरी होती है। उनकी ऐसी कई कहानियां अभी तक पूरी नहीं हो पाई क्योंकि बचे हुए पार्ट्स वाले उपन्यास या तो प्रकाशित नहीं हुए या फिर अनिल जी कहानी के बचे हुए पार्ट्स लिख ही नहीं पाए। इसका कारण चाहे जो भी रहा हो, अधूरी बची कहानियों को पूर्ण करने की उम्मीद आज भी कई पाठक अनिल मोहन से लगाए बैठे हैं।

पात्रों के अनुसार अनिल मोहन जी के उपन्यासों की लिस्ट निम्नलिखित हैं:

महादेव :-
घर का शेर
मोहरा
दौलत के खिलाड़ी
फायर
जहाज नंबर 302
लूटमार
दूसरा चेहरा
फिरौती

 वानखेडे:-
दिन दहाड़े लूट
जान के दुश्मन
खूंखार
जांबाज
डकैती
टक्कर
विधि का विधान
दौलत का ताज
आतंक का पहाड़
एक रुपये की डकैती
301 करोड़ की चाबी
डकैती के बाद
गिरोहबाज
पहरेदार
जालिम
विस्फोट
अंडरग्राउंड
हथियार
एक डकैती ऐसी भी
तबाही
दौलत मेरी मुठी में
एक दिन का हिटलर
फायर
बदमाशों की टोली
कमांडो
सरकारी शैतान
मिशन डकैती मास्टर
डकैती तेरे नाम की
ठेकेदार
यारी दौलत से
दौ लत मेरी माँ
गुर्गा
हैवान
आर.डी.एक्स 
गुरु का गुरु
हाईजैकर
संगीन डकैती
वर्दी का नशा
मुखबिर
बबूसा
डकैती का अलार्म
कॉन्ट्रैक्ट
लाइसेंस टू किल
मिशन प्राइम मिनिस्टर
हांगकांग में डकैती
किस्मत का सुलतान

सोहनलाल:-
पाप का घड़ा
बारूद का ढेर
डंके की चोट
दोलत के दांत
धोखाधड़ी
पहरेदार
हमला
जालिम
बादशाह
विस्फोट
अंडरग्राउंड
तबाही
एक दिन का हिटलर
जहाज नंबर 302
जीत का ताज
ताज के दावेदार
कमांडो
कौन लेगा ताज
रफ्तार
डाका
पहली चोट
सरकारी शैतान
दूसरी चोट
तीसरी चोट
महामाया की माया
चौकीदार
मिशन डकैती मास्टर
डकैती तेरे नाम की
ठेकेदार
यारी दौलत से
जुआरी
दोलत मेरी माँ
27 सेकंड
देवदासी
इच्छाधारी
हिस्सेदार
नागराज की हत्या
विष मानव
दौलत का जहाज
मास्टर
गुड्डी
मंत्र
गुर्गा
केकड़ा
गिरोह
आर.डी.एक्स 
गुरु का गुरु
माई का लाल
हाईजैकर
जथुरा
पोटेबाबा
यू टर्न
महाकाली
बंधक
सबसे बड़ा हमला
किस्मत का सुल्तान
नसीब के पत्ते
नागमणि
नरबलि
100 माइल्स
डॉन जी
नागिन
सबसे बड़ा गुंडा
वर्दी का नशा
मैं हूं देवराज चौहान
जिंदा आंखें
मुखबिर
मिस्ड कॉल
बबूसा
बबूसा और राजा देव
डकैती का जादूगर
लाइसेंस टू किल
वो कौन था
हांगकांग में डकैती

गजाला:-
ज्वालामुखी
खूंखार
जांबाज
आतंक का पहाड़
जिन्न
हाईजैकर


उनके श्रृंखलाबद्ध रूप में लिखे गए उपन्यासों की लिस्ट निम्नलिखित है :-

2 उपन्यास वाली श्रृंखलाएं:-
हमला, जालिम
ज्वालामुखी, खूंखार
100 माइल्स, डाॅन जी
सबसे बड़ा गुण्डा, मैं हूँ देवराज चौहान
एक रुपये की डकैती, डकैती के बाद
बारूद से मत खेलो, दौलत के दांत
अंडरवर्ल्ड, गैंगवार
अनोखी दुल्हन, दुल्हन मेरी मुट्ठी में
दौलत मेरी माँ, जीना इसी गली में
पहरेदार, सुलग उठा बारूद
फिक्स्ड गेम, डबल प्ला‌‌न
ऑपरेशन टू किल, ऑपेरशन 24 कैरेट
खबरी, अघोरी

3 उपन्यास वाली श्रृंखलाएं:-
दिल्ली का दादा, दरिंदे, हिंसक
जथूरा, पोतेबाबा, महाकाली
बंधक, सबसे बड़ा हमला, वांटेड अली
नागिन, नरबलि, नागमणि
डकैती का जादूगर, हांगकांग में डकैती, लाइसेंस टू किल
ताज के दावेदार, कौन लेगा ताज, जीत का ताज
पूर्वजन्म, यज्ञ, मायाजाल

4 उपन्यास वाली श्रृंखलाएं:-
पहली चोट, दूसरी चोट, तीसरी चोट, महामाया की माया
गोला बारूद, भूखा शेर, आदमखोर, निशानेबाज
सरगना, मास्टर, गुड्डी, मंत्र
देवदासी, इच्छाधारी, नागराज की हत्या, विष मानव
नब्बे करोड़, 36 दिन, सच का सिपाही, डमरू

6 उपन्यास वाली श्रृंखला:-
बबूसा, बबूसा और राजादेव, बबूसा खतरे में, बबूसा का चक्रव्यूह, बबूसा और सोमाथ, बबूसा और खुंबरी


अगर आपके पास अनिल मोहन जी के बारे में कोई और जानकारी उपलब्ध हो तो कॉमेंट्स के माध्यम से हमारे साथ शेयर करें। हमेशा की तरह हमें आपके कॉमेंट्स की प्रतीक्षा रहेगी।

20 जनवरी 2022

वेद प्रकाश शर्मा - हिंदी उपन्यासकार



साथियों, वैसे तो वेद प्रकाश शर्मा जी को किसी परिचय की आवश्यकता नही है पर हमारा ये पोस्ट उन्हीं पर आधारित है। 

वेद प्रकाश शर्मा जी हिंदी लोकप्रिय साहित्य (लुगदी साहित्य) में अपने समय के सबसे प्रसिद्ध उपन्यासकारों में से एक रहे हैं। इनका जन्म वर्ष 1955 में मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ था और निधन वर्ष 2017 में कैंसर की बीमारी के कारण हुआ था। इनके परिवार में इनकी पत्नी, तीन पुत्रियां तथा एक पुत्र है। इनके पुत्र शगुन शर्मा भी एक उपन्यासकार हैं और अब तक 30 से भी अधिक उपन्यास लिख चुके हैं। 

वेद जी ने अपने 40 से भी अधिक वर्षों के लेखन कैरियर में 170 से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं। वेद जी ने अपना कैरियर भूत लेखक (घोस्ट राइटर) के रूप में आरंभ किया था और कुछ वर्ष पश्चात इनके उपन्यास स्वयं के नाम से भी प्रकाशित होने लगे। 1973 में प्रकाशित "दहकते शहर" उपन्यास वेद जी का स्वयं के नाम से प्रकाशित हुआ प्रथम उपन्यास था। यहां से वेद जी सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए और शीघ्र ही अग्रणी लेखकों में इनका नाम लिया जाने लगा। वेद जी मुख्यत: थ्रिलर, सस्पेंस एवं जासूसी श्रेणी के उपन्यास लिखते थे। इन सभी श्रेणियों में इनके बहुत से उपन्यास सफल रहे हैं और पाठकों द्वारा सराहे गए हैं। बहू मांगे इंसाफ, गैंडा, विजय और केशव पंडित, कोख का मोती, विजय के सात फेरे, कैदी नंबर 100, शाकाहारी खंजर, मंगल सम्राट विकास, चकमा, लल्लू, एक मुट्ठी दर्द तथा ऐसे और भी अनेक उपन्यास इनके सफल उपन्यासों की सूची में शामिल हैं। खासकर "वर्दी वाला गुंडा" उपन्यास इनका अब तक का सफलतम और सर्वाधिक बिकने वाला उपन्यास रहा है। 

 जब वेद जी का "वर्दी वाला गुंडा" उपन्यास प्रकाशित हुआ तो इसने उस समय के उपन्यास बिक्री के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। कई बार इसका रिप्रिंट किया गया। बहुत सी जगहों पे इसके पोस्टर भी लगे और खूब धूम मची इस उपन्यास की। लोकप्रिय साहित्य के किसी उपन्यास के लिए ये एक प्रेरणादायक और अनूठा मुकाम था।

अब अगर पात्रों की बात की जाए तो वेद जी ने विकास, केशव पंडित और विभा जिंदल जैसे प्रसिद्ध पात्रों का सृजन दिया। हालांकि वेद जी केशव पंडित को लेकर ज्यादा उपन्यास नही लिख पाए थे परंतु उनका "केशव पंडित" पात्र हिंदी उपन्यास जगत ने इतना प्रसिद्ध हुआ था कि अनेक प्रकाशकों ने केशव पंडित के नाम की सफलता को भुनाने के लिए अपने भूत लेखकों से केशव पंडित के उपन्यास लिखवा कर मार्केट में बेचने शुरू कर दिए। केशव पंडित की प्रसिद्धि का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक लंबे समय तक केशव पंडित के नाम से छपने वाले नकली उपन्यास भी अच्छे-खासे बिकते रहे। 
वेद प्रकाश शर्मा जी पहले से ही वेद प्रकाश कंबोज जी को अपना गुरु और प्रेरणा मानते थे। वेद जी ने कंबोज जी के विजय, रघुनाथ, अल्फांसे, सिंगही, बागारोफ जैसे पात्रों को अपने अंदाज में बेहद सफलता से प्रस्तुत किया है। 

पहले वेद जी के उपन्यास अलग-अलग प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित किए जाते थे। बाद में वेद जी ने वर्ष 1985 में अपने प्रकाशन संस्थान "तुलसी पॉकेट बुक्स" की स्थापना की और फिर उनके बाकी उपन्यास यहीं से प्रकाशित हुए। इनके लगभग 70 के करीब उपन्यास तुलसी पॉकेट बुक्स से ही प्रकाशित हुए हैं। 
वेद जी के कई उपन्यासों पर हिंदी फिल्में भी बन चुकी हैं जैसे कि सबसे बड़ा खिलाड़ी, अनाम, इंटरनेशनल खिलाड़ी, बहू मांगे इंसाफ। इनके केशव पंडित नामक पात्र पर बालाजी टेलीफिल्म्स द्वारा एक टीवी सीरियल भी बनाया जा चुका है। इसके अलावा वेद जी ने बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ कुछ और प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया था। 

"अतरंगी रे" फिल्म के इस दृश्य में अक्षय कुमार वेद जी का उपन्यास "सुपरस्टार" हाथ में लिए हुए हैं और उसे पढ़ रहे होते हैं। एक और दिलचस्प बात ये है कि सुपरस्टार उपन्यास वेद जी द्वारा अपने समय के प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना के जीवन से प्रेरित होकर लिखा गया था और राजेश खन्ना जी रिश्ते में अक्षय कुमार के ससुर हैं। यहां पर आपको ये भी बता दें कि अक्षय कुमार पहले भी वेद जी के उपन्यासों पर आधारित कुछ फिल्मों में काम कर चुके हैं।

वेद जी को उनके उत्कृष्ट लेखन कार्य के लिए "मेरठ रत्न" तथा "नटराज भूषण" जैसे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। 

वेद जी पाठकों द्वारा दिए गए प्यार को ही सबसे महत्त्वपूर्ण मानते थे। वेद जी शुरू से ही पाठकों की उपन्यासों के प्रति रुचि तथा उनकी नब्ज अच्छी तरह से पहचानते थे और इसी कारण अपने पाठकों पर उनकी पकड़ हमेशा बेहद मजबूत रही थी। आज भी बहुत से पाठक उनके उपन्यास बेहद चाव से पढ़ते हैं और उन्हें याद करते हैं। 

वेद जी द्वारा लिखे गए उपन्यासों ने लाखों-करोड़ों पाठकों का मनोरंजन किया है। हिंदी लोकप्रिय साहित्य में उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। इस आलेख के माध्यम से हम वेद जी को भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 

वेद प्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित उपन्यासों की सूची :-
1 दहकते शहर
 2 आग के बेटे
 3 खूनी छलावा 
 4 छलावा और शैतान 
 5 महाबली टुम्बकटू
 6 विकास दी ग्रेट 
 7 प्रलयकारी विकास 
 8 एक मुठ्ठी दर्द 
 9 विकास और मैकांबर
10 विकास मैकांबर के देश में
11 मैकांबर का अंत
12 अपराधी विकास
13 मंगल सम्राट विकास 
14 विनाश दूत विकास 
15 विकास की वापसी 
16 विजय और विकास 
17 पहली क्रांति 
18 दूसरी क्रांति 
19 तीसरी क्रांति 
20 क्रांति का देवता 
21 इंकलाब का पुजारी 
22 सबसे बड़ा जासूस 
23 चीते का दुश्मन 
24 सुमन
25 सी. आई.ए. का आतंक 
26 बदसूरत 
27 प्रिंसेस जैक्सन का देश 
28 पाकिस्तान का बदला 
29 विश्व विजेता 
30 हीरों का बादशाह 
31 अर्थी मेरे प्यार की  
32 रहस्य के बीच
33 तीन तिलंगे 
34 आग लगे दौलत को  
35 शहीदो की चिता 
36 खून की धरती
37 तिरंगा झुके नहीं
38 वतन की कसम 
39 सिंगही और मर्डर लैंड 
40 देवकांता संतति भाग-1-2 
41 देवकांता संतति भाग-3-4
42 देवकांता संतति भाग-5-6
43 देवकांता संतति भाग-7-8
44 देवकांता संतति भाग-9-10
45 देवकांता संतति भाग-11-12
46 देवकांता संतति भाग-13-14
47 लाश कहाँ छुपाऊ 
48 कानून मेरे पीछे 
49 आलपिन का खिलाडी
50 वतन 
51 गुलिश्तां खिल उठा  
52 आयरन मैन 
53 कोबरा का दुश्मन
54 सफ़ेद चूहा 
55 खून दो आजादी लो
56 बिच्छू 
57 हिन्द का बेटा
58 देश न जल जाये
59 कानून बदल डालो
60 फ़ासी दो कानून को
61 जला हुआ वतन
62 चीख उठा हिमालय
63 दौलत है ईमान मेरा
64 आ बैल मुझे मार
65 धरती बनी दुल्हन
66 विश्व युद्ध की आग 
67 चकमा
68 खून ने रंग बदला
69 रूक गयी धरती 
70 कर्फ्यू
71 शेर का बच्चा
72 जजमेंट
73 हत्यारा कौन
74 मत रो माँ
75 लाखों हैं लाल मेरे
76 हिंसक 
77 दरिंदा 
78 गैंडा
79 क़त्ल ए आम 
80 जय हिन्द
81 वन्दे मातरम 
82 दौलत पर टपका खून 
83 एक कब्र सरहद पर 
84 रणभूमि
85 गन का फैसला
86 राखी और सिन्दूर
87 माटी मेरे देश की
88 एक और अभिमन्यु 
89 सारे जहां से ऊँचा 
90 सभी दीवाने दौलत के 
91 इंकलाब जिंदाबाद 
92 दूध ना बख्शूंगी 
93 धर्मयुद्ध 
94 बहू मांगे इन्साफ 
95 साढ़े तीन घंटे 
96 अलफांसे की शादी 
97 कफ़न तेरे बेटे का 
98 विधवा का पति 
99 हत्या एक सुहागन की 
100 कैदी न. १०० 
101 इंसाफ का सूरज 
102 दुल्हन मांगे दहेज़ 
103 सुलग उठा सिन्दूर 
104 मेरे बच्चे मेरा घर 
105 आज का रावण 
106 नसीब मेरा दुशमन 
107 बहु की आवाज
108 शीशे की अयोध्या
109 औरत एक पहेली
110 केशव पंडित 
111 कानून का पंडित 
112 कानून का बेटा  
113 विजय और केशव पंडित 
114 कोंख का मोती 
115 मांग में अंगारे
116 बीवी का नशा
117 साजन की साजिश 
118 सबसे बड़ी साजिश
119 भगवान नंबर दो 
120 सुहाग से बड़ा 
121 चक्रव्यहू 
122 जुर्म की माँ 
123 कुबड़ा  
124 नाम का हिटलर 
125 कानून नहीं बिकेगा 
126 दौलत मांगे खून 
127 दहेज़ में रिवाल्वर 
128 जादू भरा जाल 
129 वर्दी वाला गुंडा 
130 जिगर का टुकड़ा
131 लल्लू
132 रैना कहे पुकार के
133 भस्मासुर
134 मेरा बेटा सबका बाप 
135 पागल 
136 मि. चैलेंज 
137 वो साल खद्दरवाला 
138 कातिल होतो ऐसा 
139 शाकाहारी खंजर 
140 मदारी
141 फंस गया अलफांसे 
142 पंगा 
143 कारीगर 
144 ट्रिक 
145 कठपुतली 
146 एक थप्पड़ हिंदुस्तानी 
147 पाक-साफ़ 
148 गूंगा 
149 डमरूवाला 
150 असली खिलाडी 
151 शिखंडी 
152 रामबाण 
153 दूर की कौड़ी 
154 काला अंग्रेज 
155 फिरंगी 
156 खलीफा 
157 शंखनाद 
158 क्यूंकि वो बीवियां बदलते थे 
159 वेदमंत्र 
160 अंगारा 
161 शेखचिल्ली 
162 हत्यारा मंगलसूत्र 
163 केशव पंडित की वापसी 
164 विजय के सात फेरे 
165 नौकरी डाट कॉम 
166 खेल गया खेल 
167 सुपरस्टार 
168 पैंतरा 
169 कश्मीर का बेटा 
170 चलते पुर्जे 
171 डायन 
172 डायन -2 
173 सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री 
174 अपने कत्ल की सुपारी
175 गद्दार देशभक्त
176 आनर किलींग
177 छठी उंगली
178 भयंकरा

आप सभी के लिए उपलब्ध वेद प्रकाश शर्मा जी के उपन्यास संग्रह की एक झलक!

कमेंट्स के माध्यम से अपने विचार हमारे साथ जरूर शेयर करें।

31 अक्टूबर 2021

नागपाल उपन्यासकार और उपन्यास सूची

नागपाल

नागपाल नाम से काफी उपन्यास प्रकाशित हुए हैं और अक्सर देखने को भी मिल जाते हैं। हालांकि जो उपन्यास हमें मिले हैं, उनमें ना तो कोई लेखकीय देखने को मिला और ना ही लेखक का कोई कॉन्टेक्ट नंबर या एड्रेस। 

                       नागपाल के उपन्यास 

अब ये लेखक कौन थे, कहाँ से थे, इनके बारे में कोई भी जानकारी कहीं पर उपलब्ध नहीं है। 
क्या नागपाल वास्तव में एक असली लेखक थे अथवा सिर्फ एक छदम नाम जिसकी आड़ में प्रकाशक ने अलग अलग लेखकों से अपनी सहूलियत के अनुसार लिखवाया! 

इनके उपन्यासों के बारे में जो थोड़ी-बहुत जानकारी हमें मिलती है, उनके अनुसार नागपाल नाम से अनिल मोहन भी बहुत घोस्ट राइटिंग (प्रेत लेखन) कर चुके हैं। नागपाल की त्रिकाल पांडे सीरीज के उपन्यासों को ही किरदार बदल कर देवराज चौहान सीरीज के उपन्यासों के तौर पर लिखा गया है। 

       राधा पॉकेट बुक्स में प्रकाशित कुछ उपन्यास की सूची

नागपाल के उपन्यास मुख्य रूप से राधा पॉकेट बुक्स, मेरठ से प्रकाशित हुए हैं। उपरोक्त उपन्यासकार के उपन्यासों की सूची निम्न है:- 
1 दौलत मेरी है ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
2 जुर्म की जंजीर ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
3 नकली चेहरा ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
4 चोरों का राजा ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
5 झूठ का जाल ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
6 धमाका ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
7 खतरनाक साज़िश ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
8 मौत का तांडव ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
9 चांडाल चौकड़ी ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
10 कौन लेगा दौलत ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
11 तबाही का रास्ता ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
12 पति की साजिश ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
13 काला कानून ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
14 हत्यारी बहु ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
15 बेगुनाह की मौत ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
16 मासूम की हत्या ( त्रिकाल पांडे सीरीज )
17 खून से रंगे हाथ ( थ्रिलर )
18 हत्यारी दौलत ( थ्रिलर )
19 खूनी फंदा ( थ्रिलर )
20 शोलो का तूफान ( थ्रिलर )
21 नर्क का बादशाह  
22 जुर्म का पहरेदार ( त्रिकाल पांडे सीरीज )

अगर आप में से किसी को भी इनके बारे में कोई जानकारी हो तो वह कॉमेंट के जरिए हमारे साथ जरूर सांझा करे या आप हमे मेल भी कर सकते हैं।

26 जुलाई 2021

रामनारायण पासी - एक छदम लेखक का संघर्ष

आज इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको जानकारी दे रहे हैं लेखक श्री रामनारायण पासी जी के जीवन और उनके संघर्ष के बारे में जिन्होंने विनय प्रभाकर के नाम से बहुत सारे उपन्यास लिखे | जी हाँ, वही विनय प्रभाकर जिनके लिखे उपन्यासों को बहुत से पाठको ने पढ़ा भी और सराहा भी |

रामनारायण पासी जी के बारे में इस जानकारी को शेयर करने के लिए श्री राजेश पासी जी का बहुत बहुत धन्यवाद | 


श्री रामनारायण पासी


तो साथियों, अब आगे की कहानी राजेश जी के ही शब्दों में:- 

वह विनय प्रभाकर भी है और रामनारायण पासी भी और मेरे पापा है !

एक समय था जब मनोरंजन का मुख्य साधन था - उपन्यास। वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे कई उपन्यास लेखक उस समय एक स्टार थे।  

इन्हीं में से एक थे विनय प्रभाकर। विनय प्रभाकर द्वारा लिखे उपन्यास की काफ़ी माँग थी । बहुत से लोग उन्हें पढ़ा करते थे ।

बहुत कम लोगों को पता है विनय प्रभाकर के नाम से लिखने वाले अधिकतर उपन्यास श्री राम नारायण पासी जी ने लिखे थे। विनय प्रभाकर की मेजर नाना पाटेकर सीरीज के तो सारे उपन्यास रामनारायण पासी जी ने ही लिखे थे ।

बहुत कम लोगों को पता है और मैंने भी कभी पब्लिक प्लेटफार्म पर इसका ज़िक्र नहीं किया कि विनय प्रभाकर के नाम से उपन्यास लिखने वाले रामनारायण पासी जी मेरे पिताजी है ।

विनय प्रभाकर के नाम से तक़रीबन सभी उपन्यास पापा ने ही लिखे थे । इसके अलावा कुछ उपन्यास अर्जुन पंडित और दूसरों के नाम से भी लिखे थे । थ्रिलर और सस्पेंस के साथ साथ प्रकाशक जो भी विषय कहते, हर उस सब्जेक्ट पर लिखने में महारत हासिल थी पापा को ।

पापा ने काफ़ी प्रयास किया कि कुछ उपन्यास उनके नाम से भी छपे, इसलिए प्रकाशकों ने जो कहा वह लिखते गए पर प्रकाशकों ने सिर्फ़ आश्वासन दिया ।

पापा कई पत्र-पत्रिकाओं में भी उस समय लिखते रहते थे । मुंबई में थे तो फ़िल्मों और TV सीरियल के लिए भी उन्होंने प्रयास किया। कई साल फ़िल्म राइटर असोसियशन के मेम्बर भी थे । पर हमारे समाज में पापा के पीढ़ी के लोग बहुत स्वाभिमानी होते है चाहे जो हो जाए, किसी के सामने झुकेंगे नहीं स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगे। और फ़िल्मी दुनिया में तो जगज़ाहिर है अपने स्वाभिमान को साथ लेकर आगे नहीं बढ़ सकते और अगर आप SC समाज से है तो फिर तो कहाँ की बात। पापा को किसी के सामने झुकना, चापलूसी करना, जी हजुरी पसंद नहीं था नतीजा वहाँ भी धोखा मिला । कोई सहायता करने वाला भी नहीं था । इसलिए उन्होंने लिखना ही छोड़ दिया ।

पिछले साल 2019 में पापा रिटायर हुए है और अब मुंबई से जाकर वह हमारे गाँव प्रतापगढ़, सांगीपुर में खेती में कुछ रीसर्च कर रहे है । पापा ने कहा अब लिखने के क्षेत्र में नहीं जाना है, खेती के क्षेत्र में कुछ रीसर्च करने का शौक़ है ।

पापा हमेशा ही कुछ नया सीखने में व्यस्त रहते है । रिटायर होने के कुछ साल पहले कम्प्यूटर और लैप्टॉप चलाने में भी दक्षता हासिल कर ली । अभी कुछ महीना पहले कार ड्राइविंग करना भी सिख लिया है, वह भी बिना ड्राइविंग क्लास गए ।

पापा की वजह से मैं भी थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ । और मेरा लिखा भी लोग पसंद करते है । बचपन से ही उन्हें बहुत पढ़ते और लिखते देखता रहा । पापा की वजह से ही लिखने पढ़ने में मुझे भी इंट्रेस्ट हुआ और पापा की वजह से ही मुझमें भी लेखन के थोड़े गुण आ गए है।

उस समय पापा को कोई सहयोग करने वाला नहीं था इसलिए तक़रीबन 40 से ज़्यादा किताबें लिखने के बावजूद पापा को कोई पहचान नहीं मिल पाई। विनय प्रभाकर, अर्जुन पंडित जैसे नाम को तो लोग देश भर में जानते थे पर रामनारायण पासी को लोग नहीं जानते और इस तरह समाज की एक और प्रतिभा दब गई।



तो ये थी श्री रामनारायण पासी जी के जीवन तथा उनके संघर्ष की कहानी उनके बेटे राजेश पासी जी के शब्दों में |


उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर आपका उपन्यास जगत के एक अलग तरह के चेहरे से परिचय हुआ होगा |  

आप कमैंट्स के माध्यम से हमें अपनी राय से अवगत करवा सकते है|


21 जून 2021

राज भारती (प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार)


राज भारती जी अपने समय के बहुत मशहूर उपन्यासकार थे | राज भारती जी का ओरिजिनल नाम करतार सिंह था । वो पंजाबी सिख थे और उनका सात सदस्यीय भरा-पूरा परिवार था । बाद में उन्होंने दाढ़ी-मूँछ कटवा ली थी । राज भारती जी पश्चिम दिल्ली के पटेल नगर में रहते थे | उनका स्वर्गवास 27 सितम्बर 2011 को हुआ ।





राज भारती जी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में नौकरी करते थे । उनको लिखने का जूनून था । अपने इसी जूनून के कारण उन्होंने 1978 में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की नौकरी छोड़कर हिंदी पल्प फिक्शन लेखन में अपना करियर बनाया ।

राज भारती जी की पत्नी सरोज कांता जी ने राज भारती जी के लेखन के प्रति जूनून को इन शब्दों में व्यक्त किया था "वो पश्चिम दिल्ली के पटेल नगर में स्थित अपने घर में चाय पीते हुए पात्रों की कल्पना करते रहते थे। वो देर रात में लिखते थे । जब वो लिखते थे तो अपनी ही दुनिया में चले जाते थे - एक ऐसी दुनिया जिसे सिर्फ वो ही जानते और समझते थे ।"

इनका लिखने का जूनून ऐसा था कि एक समय पर इन्होने हॉरर के अलावा सब लिखना छोड़ दिया और चार वर्षों में राज भारती के रूप में 40 से भी अधिक हॉरर उपन्यास लिख डाले ।

राज भारती (करतार सिंह) जी ने सभी तरह के उपन्यास लिखे पर उनके फैंटसी और हॉरर नोवेल्स बहुत फेमस हुए थे । राज भारती जी ने अपने आप को हिंदी उपन्यास लेखन के पटल पर एक अग्रणी हॉरर और फैंटसी लेखक के रूप में स्थापित किया और इस श्रेणी में वो पाठको की पहली पसंद बन गए थे | इनके उपन्यासों की खासियत थी कि ये स्टोरी कुछ इस प्रकार लिखते थे कि पाठक का मन अधिकतर नावेल कम्पलीट करके के ही मानता था |


उन्होंने विभिन्न धाराओं (असामान्य और अलौकिक घटनाएं, पौराणिक कथाएँ, साई-फाइ, हॉरर, ऐतिहासिक घटनाओं इत्यादि) का अध्ययन किया और इनके मिश्रण से भूत-प्रेत, पिशाच और आत्माओँ से युक्त मायावी दुनिया की रचना कर पाठको को इस दुनिया की सैर करवाई | ऐसे कुछ उपन्यासों के नाम है:- स्वाहा, प्रेत की दुल्हन, पिशाच कन्या, रक्त भैरवी, पिशाच सुंदरी, प्रेत जाल इत्यादि.. | 


उनके हॉरर उपन्यासों की बिक्री अन्य हॉरर लेखकों के मुकाबले अधिक होती थी | उनके उपन्यास आज भी डिमांड में है | बहुत से पाठक उनके उपन्यासों का उदाहरण देकर प्रकाशकों से वैसे ही नए डरावने उपन्यासों की मांग भी करते है | उनके उपन्यासों को छापने वाले पुराने प्रकाशकों का मानना है कि राज भारती जैसा लेखक दुबारा मिलना बहुत कठिन है |


राज भारती जी ने कई पैन नामों से उपन्यास लिखे थे | उनका पहला उपन्यास सामाजिक उपन्यास "मुस्कुराहट कैद है" था जो करतार सिंह क्वारा के नाम से छपा था। राज भारती जी ने वेदप्रकाश कांबोज की विजय रघुनाथ सीरीज के पात्र को लेकर लिखना शुरू किया था। उन्होंने S KUMAR के नाम से भी काफी जासूसी उपन्यास लिखे और सावन के नाम से सामाजिक उपन्यास भी लिखे थे।


अपनी अलग पहचान बनाने के बाद उन्होंने थ्रिलर उपन्यास, अग्निपुत्र सीरीज, कमलकांत सीरीज, इंद्रजीत सीरीज, आनंद बेदिल सीरीज, अभय वर्मा सीरीज, गोकुल पांडे सीरीज, हॉरर, करण धारीवाल सीरीज, प्रीतम शौरी सीरीज, सागर सीरीज, सागर पुत्र सीरीज, शालियार खान सीरीज, समीर साहनी सीरीज, संग्राम सीरीज आदि बहुत सी सीरीज राज भारती के नाम से लिखी। इनमे अग्निपुत्र, कमलकांत और संग्राम सीरीज ने राज भारती जी को नई और विशिष्ट पहचान दिलवाई । 


जितनी अधिक सीरीज और पात्रों की रचना राज भारती जी ने की है, उतनी शायद ही किसी अन्य लेखक ने की होगी ।


अग्निपुत्र सीरीज एक ऐसे अमर प्राणी अग्निपुत्र पर आधारित है जो न जाने कितनी सदियों से जीवित है | आसमान के सितारे उसके दोस्त है, | आग उसे जलाती नहीं बल्कि शक्ति प्रदान करती है | समुद्र उसे अपनी गोद में पनाह देता है | वायु उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती | अग्निपुत्र बहुत बलशाली है | उसके जिस्म अभेद्य है जिस पर किसी हथियार का प्रभाव नहीं होता है | केवल जादू ही उसकी कुछ हद तक कमजोरी है पर जादू भी उसे कोई शारीरिक या मानसिक हानि नहीं पहुंचा सकता है | अग्निपुत्र सीरीज में अग्निपुत्र प्रोफेसर और उसकी दो बेटियों को अपनी सदियों की गाथा सुनाता है।


अग्निपुत्र सीरीज के उपन्यास :-

1 मायाजाल

2 महामाया 

3 महादंड 

4 महाकाल

5 खुदा का बेटा

6 महाबली

7 महाक्रोधी

8 महारथी

9 महायोगी

10 महामंत्र

11 महादह

12 महापाप

13 महाविनाश

14 महासंग्राम

15 महाकांड

16 अग्निपुत्र

17 अग्निकुंड

18 रक्तपात

19 रक्तमंदिर

20रक्त धारा

21 रक्तसिंदुर

22 रक्तसागर

23 शांग्रिला

24 रक्तपिपासु

25 रक्तरेखा

26 रक्तआहुति

27 रक्तकलश

28 रक्तकुंडली

29 रक्तसुंदरी

30 रक्त आत्मा

31 रक्त मुंड

32 रक्त सुरा

33 मृत्युंजय

34 रक्तांचल

35 रक्त देव

36 रक्त भैरवी

37 रक्त मंथन

38 मृत्युराग

39 मृत्युदश

40 मृत्युधाम

41 मृत्युजाल

42 मृत्युरथ

43 मृत्युद्वार

44 शाही रक्कासा

45 मिस्त्र की शहजादी

46 सफेद कबूतरी

47 मल्लिका का ताज

48 शाही जल्लाद

49 ताजपोशी

50 जादूगरनी

51 दोधारी तलवार

52 तौर ग्रह के हत्यारे

53 तौर ग्रह के देवता

54 तौर ग्रह के बंजारे

55 मंगोल सुंदरी

56 तौर ग्रह के छापामार

57 अभिसारिका

58 सुर्ख सैलाब

59 सरहदी भेड़िए

60 शिकारी मलिका

61 तौर के लुटेरे

62 रेगिस्तानी कबीले की मलिका 

63 हुंकार

64 आमरा

65 आमरा का इंतजाम

66 विनाश चक्र

67 बिल्ला हरुमा

68 शिंगुर के दरिंदे

69 शाबा

70 शंखनाद



कमलकांंत सीरीज में भँवरे जैसी फितरत वाला मुख्य नायक कमलकांत आपराधिक संगठनो से टकराता है | इन संगठनो के पास विचित्र शक्तियां भी होती है | कमलकांत को ये दुश्मन लगभग नेस्तनाबूद कर देते है और उसे मरा हुआ मान लेते है | पर एक दिन कमलकांत फिर वापिस आता है और इनके सर पर तलवार बनकर लटकने लगता है | सीरीज में कमलकांत के जीवन में विभिन्न लड़किया/प्रेमिकाएं भी आती हैं और इन में से लगभग सभी के पास कोई न कोई शक्ति होती है | आरंभ के तीन उपन्यास ( चक्रव्यूह, चक्रवात, त्रिशूल ) उस समय ये सीरीज इतनी प्रसिद्ध नही हो पाई थी। लेकिन जब मनोज पब्लिकेशन ने इस सीरीज के 4थे उपन्यास जोरावर को प्रकाशित किया तो पहली बार इस सीरीज की बुक को क्रम नंबर दिए गए। दिल तो कातिल है उपन्यास के बाद चिड़ीमार नामक उपन्यास अनाउंस किया था लेकिन दुर्भाग्यवश वो पूरा होने से पहले ही राजभारती जी हमारे बीच नहीं रहे। 


कमलकांत सीरीज के उपन्यास :-

1 चक्रव्यूह

2 चक्रवात

3 त्रिशूल

4 जोरावर

5 खूनी आंखे कातिल हाथ

6 कहर आंखों का 

7 हाईकमांड

8 नीली आंखों के गुलाम

9 मौत का साज

10 अजनबी लोग अनजाने खतरे

11 नागिन

12 छछूंदर

13 गोली की रफ्तार

14 होश उड़ा दूंगा

15 काली बिल्ली

16 बवंडर

17 काठ की हांडी

18 नाक का बाल

19 खुदा खैर करे

20 अंधा खलीफा

21 करामती शे

22 तिगनी का नाच

23 तेरी गर्दन मेरे हाथ

24 मौत खड़ी तेरे द्वारे

25 विषकन्या

26 हिसाब बराबर

27 कातिल माने ना

28 काम तमाम

29 सारे दिमाग मेरे शिकार

30 दिल तो कातिल है

चिड़ीमार (अप्रकाशित)



संग्राम सीरीज में आपको मुख्य किरदार संग्राम के हंगामे और उसकी रक्त-रंजित आत्मकथा पढ़ने को मिलेगी | संग्राम कविता से प्रेम करता है और उसकी तलाश में भटक रहा है | ये सीरीज संग्राम की आपबीती की कहानी है जिसने अकेले ही संगठित कुख्यात माफिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और अंडरवर्ल्ड में कोहराम मचा दिया |


सागरपुत्र सीरीज के उपन्यास :-

1 सागर पुत्र

2 आतिश

3 समुंद्र मेरी मुट्ठी में

4 आक्रोश

5 अखनातून

6 सागर सम्राट

7 मादम गारथा के शिकारी


शालयार खान सीरीज के उपन्यास :-

1 शालयार खान

2 शाहबाज

3 दरिंदा

4 कहर

5 दोजख

6 बारूद

7 शिकस्त

8 बेरहम

9 शहंशाह

10 शतरंज

11 फतवा

12 ऐलान ए जंग

13 लावा


विजय सीरीज के उपन्यास :-

1 एक कत्ल और सही 

2 लाश का प्रतिशोध

3 शिकार शैतान के

4 कत्ल एक कातिल का

5 जरूरत है कातिल की

6 सितारों का बादशाह रेगिस्तान के शिकारी

7 सितारों का बादशाह रेगिस्तान का षड्यंत्र

8 सितारों का बादशाह रेगिस्तान के लुटेरे

9 सितारों का बादशाह रेगिस्तान का नक्शा

10 रक्तद्विप तोरा तोरा तोरा

11 रक्तद्वीप तोरा तोरा तोरा का खजाना

12 रक्तद्विप तोरा तोरा तोरा के पुजारी

13 दहशत पिरामिडों का आतंक

14 दहशत कालापहाड़

15 शुक्रग्रह की शहजादी

16 मौत एक गद्दार की

17 मृत्युदूत

18 जिंदा का कब्रिस्तान

19 कत्ल न होने दूंगा 

20 मौत के खरीददार

21 लाश का अपहरण

22 रूहो की राजकुमारी

23 निशाना चूक ना जाये

24 काली नकाब

25 मौत सस्ती है

26 पिस्तौल के खिलाड़ी

27 कत्ल होने दो

28 लाल तिल

29 कतले आम

30 हसीन लाश

31 तमचा जान

32 शैतान के शिकार

33 कामिला लेबनान में हंगामा

34 कामीला मौत का सम्राट

35 बॉबी का कातिल

36 शिकार

37 मौत ने पुकारा

38 सफेद बिच्छू

39 उस रात से पहले

40 जुनून मौत का

41 सुनहरा मौती

42 मौत आती है

43 मौत की बस्ती

44 पान का बादशाह

45 नीली आंखों वाली लड़की ऑपरेशन ब्लास्ट

46 नीली आंखों वाली लड़की

47 सुनहरी नागिन

48 हीरो की घाटी

49 मौत ही मौत

50 आंधी मौत

51 काली बस्ती काले लोग

52 हथियार फैंक दो

53 मौत मेरे पीछे

54 कातिलों के बीच

55 तीसरी आंख

56 कातिलों की बस्ती

57 शैतान की ओलाद

58 मौत के फरिश्ते

59 हत्यारों की बस्ती

60 काला बिच्छू

61 सन्नाटे का कातिल

62 जान के दुश्मन

63 मौत का उपहार

64 अधूरी लाशे

65 अंतरिक्ष का खुदा


राज भारती जी की लिखी सागर और विजय सीरीज से ये 3 पार्ट भी बहुत फेमस हुए थे:-

1 तोरा तोरा तोरा

2 तोरा तोरा तोरा के पुजारी

3 तोरा तोरा तोरा का खज़ना


राज भारती जी आज हमारे बीच नहीं है पर अपने उपन्यासों के माध्यम से वे सदा पाठकों के हृदय में बसे रहेंगे।


16 जून 2021

गोपाल राम गहमरी (प्रसिद्ध जासूसी लेखक)


लेखक: गोपाल राम गहमरी (1866 ई. - 1946 ई.)


हिंदी के धुरंधर जासूसी उपन्यास लेखक 'गोपाल राम गहमरी' का जन्म पौष कृष्ण गुरुवार संवत 1923 (1866) ई. में बारा, जिला गाजीपुर में हुआ। गोपाल राम गहमरी के पिता का नाम राम नारायण था।



उनके पूर्वज फ्रांसीसी सेंट के व्यापारी थे। गहमरी जब छह मास के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया और उनकी मां इन्हे लेकर आपने मायके गहमर चली आयी। गहमर में ही गोपाल राम का लालन पालन हुआ। प्रारंभिक शिक्षा संस्कार यही संपन्न हुए। गहमर से अतरिक्त लगाव के कारण उन्होंने बाद में आपने नाम के साथ आपने ननिहाल को जोड़ लिया और गोपाल राम गहमरी कहलाने लगे।


गोपाल राम गहमरी ने 1871 में गहमर, गाजीपुर से मिडल की परीक्षा पास की। फिर वे गहमर स्कूल में 4 वर्ष तक छात्रों को पढ़ाते रहे और खुद भी उर्दू और अंग्रेजी का अभ्यास करते रहे, क्योंकि कम उम्र होने और धनाभाव के कारण आगे की पढ़ाई नही कर सकते थे। इसके बाद पटना मर्म स्कूल में भर्ती हुए, जहां इस शर्त पर प्रवेश हुआ कि उत्तीर्ण होने पर मिडल पास छात्रों को तीन वर्ष पढ़ना होगा। आर्थिक स्थिति अच्छी ना होने के कारण इस शर्त को स्वीकार कर लिया लेकिन बीच में ही पढ़ाई छोड़कर गहमरी जी बेतिया महाराजा स्कूल में हेड पंडित (हेड मास्टर) की जगह पर कार्य करने चले गए। बलिया रहकर कुछ दिनों तक 'बंदोबस्त' का काम भी देखा और सन 1888 ई. में सब कामों से छूटी कर कुछ दिनों प्रथम श्रेणी में नार्मल की परीक्षा पास की। इसके तुरंत बाद 1889 ई. में रोहतास गढ़ में हेडमास्टर नियुक्त हो गए। मगर यहा भी वे टिक कर नही रह पाए और एक साल तक काम करने के बाद बंबई के प्रसिद्ध प्रकाशक सेठ गंगाविष्णु खेमराज के आमंत्रण पर 1891 ई. में बंबई चले गए।


गहमरी जी जब रोहताश गढ़ में थे तो वही से पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाओं को भेजा करते थे। जब बंबई में रहने लगे तो वहां भी उनकी कलम गतिशील रही। यह अलग बात है कि वे वहा भी अधिक दिनों तक नहीं टिक सके। वहां आपने अनुकूल अवसरों को ना देखकर, वहा से त्यागपत्र देकर कालाकांकर चले आए। कालाकांकर (प्रतापगढ़,यू.पी.) से निकलने वाले दैनिक हिंदुस्तान के गहमरी जी नियमित लेखक थे। इसके साथ ही उस समय के श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाएं 'बिहार बंधु' , 'भारत जीवन' , 'सार सुधानिधि' में भी नियमित लिखते थे। जब 1892 में गहमरी जी राजा रामपाल सिंह के निमंत्रण पर कालाकांकर चले आए तो यहां वे संपादकीय विभाग से संबद्ध हो गए और एक वर्ष तक रहे।यही पर काम करते हुए बांग्ला सीखी और अनुवाद के जरिए साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास भी किया। उन्होंने 'बनवीर' 'देश दशा' 'चित्रांगदा' आदि बांग्ला नाटकों का अनुवाद किया।


गहमरी जी एक जगह बहुत दिनों तक नहीं  टिकते थे। एक बार फिर सन 1893 में बंबई की ओर उन्मुख हुए और पत्र "बंबई व्यापार सिंधु" का संपादन करने लगे। लेकिन पत्र का दुर्भाग्य कहे या गहमरी जी का यह पत्र छह माह बाद बंद हो गया। फिर उन्होंने एस. एस. मिश्र के पत्र भाषा भूषण का संपादन करने लगे। यह मासिक पत्र था जो शीघ्र ही बंद हो गया जिसका कारण आर्थिक, प्रशासनिक ना होकर दंगा होना था। इसके पश्चात मंडला आकर मासिक पत्र 'गुप्तकथा' का कार्य भार संभाला पर अर्थभाव के कारण यह पत्र भी असमय बंद हो गया। गहमरी जी पुन बंबई पहुंच गए और खेमराज जी के 'श्री वेकेंटेश्वर समाचार' नाम के पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया। यह पत्र गहमरी जी के कुशल संपादन में थोड़े समय में ही लोकप्रिय हो गया। इसी दौरान प्रयाग से निकलने वाले प्रदीप (बांग्ला) ने ट्रिब्यून के संपादक नागेंद्र नाथ गुप्ता की एक जासूसी कहानी हिरार मूल्प प्रकाशित हुई थी। गहमरी जी ने उसका हिंदी अनुवाद कर श्री वेंकटेश्वर समाचार में कई किश्तों में प्रकाशित किया। यह जासूसी कहानी पाठको को इतना रुचिकर लगी कि कई पाठको ने इस पत्र की माहकता ले ली।

उस दौर में जासूसी ढंग की कहानियों में पाठको की गहरी रुचि जग रही थी। इसमें कथा में रहस्य और रोचकता ऐसी होती की पाठकों के भीतर एक तरह की जिज्ञासा जगाती और पाठकों को पढ़ने को विवश कर देती | 

गहमरी जी पाठकों के मन मस्तिष्क को समझ चुके थे। 'हीरे का मोल' के अनुवाद की लोकप्रियता और 'जोड़ा जासूस' लिखकर पाठको को प्रतिक्रिया से वे अवगत हो चुके थे। इस लोकप्रियता के कारण वे कई तरह को योजनाएं बनाने लगे। वे यह भी समझ चुके थे कि जासूसी कहानियां के जरिए पाठको का विशाल वर्ग तैयार किया जा सकता है। गहमरी जी पूरी तैयारी के साथ जासूसी लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। 1899 में ही वह घर आकर जासूस निकालना चाहते थे, किंतु बाल मुकुंद गुप्त के पुत्र की शादी के कारण 'भारत मित्र' का संपादन कार्य उन्हे संभालना पड़ा। इसकी वजह से 'जासुस' का प्रकाशन थोड़े समय के लिए स्थगित हो गया। उनकी इच्छा थी कि 'सरस्वती' के साथ ही 'जासूस' का भी प्रकाशन हो , लेकिन यह इच्छा उनके मन में ही रह गई। इस तरह जासूस का प्रकाशन जनवरी 1900 में सरस्वती के साथ ना होकर चार माह बाद मई 1900 में हुआ । गहमरी जी ने 'भारत मित्र' के संपादन के दौरान ही जासूस के निकालने की सूचना दे दी थी। इसका लाभ यह हुआ कि सैंकड़ों पाठको ने प्रकाशित होने से पहले ही पत्रिका की ग्राहकी ले ली।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि हिंदी में जासूस शब्द के प्रचलन का श्रेय गहमरी जी को है। उन्होंने लिखा है कि 1892 ई. से पूर्व किसी पुस्तक में जासूस शब्द नही दिया गया है। उन्होंने अपनी पत्रिका का नामकरण ऐसे किया जिससे आम पाठक आसानी से उसकी विषय वस्तु को समझ सके। 

जासूस शब्द से हालाकि यह बोध होता है की इसमें जासूसी ढंग की कहानियां ही प्रकाशित होती होगी, लेकिन ऐसी बात नहीं थी। उसके हर एक अंक में एक जासूसी कहानी के अलावा समाचार विचार और पुस्तकों की समीक्षाएं भी नियमित रूप से छपती थी। 

जासूस निकालने के लिए उन्हे धन की आवश्यकता थी इसकि पूर्ति उन्होंने मनोरमा और मायाविनी लिख कर की 'जासूस' का पहला अंक बाबू अमीर सिंह के हरिप्रकाश प्रेस से छप कर आया और पहले ही महीने मे विपीपी से पौने दो सौ रुपए की प्राप्ति हुई एव यह उस जमाने मे भी प्री बुकिंग से मिलने वाली राशि थी। इसने अपने विशेषांक मे भी लोकप्रियता की सारी हदो को पार करते हुए शिखर को छु लिया था। अपने प्रवेशाक मे जासूस का परिचय कुछ इस अंदाज मे पेश किया " डरिये मत यह कोई भाकोआ नहीं है धोती सरका कर भागिए मत यह कोई सरकारी सी आई डी नहीं है। है क्या ? क्या है यह? है यह पचास पन्नों की सुंदर सजाई मासिक माहवारी किताब जो हर एक मे बड़े चुटीले बड़े रसीले बड़े चटकीले बड़े गरबीले बड़े नशीले मामले छपते है। हर महीने बड़ी पचीली बड़ी छ्क्करदार बड़ी दिलचस्प घटनाओ से बड़े फड़कते हुए अच्छी शिक्षा और उपदेश देने वाले उपन्यास निकलते है। कहानी की नदी ऐसे लहराती है किस्से का झरना ऐसे सरसराता है की पढ़ने वाले आनंद के भंवर मे डूबते - उतराने लगते है। 

यह था गोपालराम गहमरी की मासिक पत्रिका जासूस का विज्ञापन जो उनके ही संपादन मे आने वाले अखबार भारत मित्र मे आया था। जिसने उक्त के हिसाब से बाज़ार मे हलचल पैदा कर दी थी नतीजा यह हुआ था की प्रकाशित होने से पहले ही सैकड़ों पाठक इसकी वार्षिक सदस्यता ले चुके थे। किसी पत्रिका के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार घटित हुआ था। यह 1900 की बात है।


गहमरी जी का कहना था कि जिसका उपन्यास पढ़कर पाठक ने समझ लिया कि सब सोलहों आने सच है उसकी लेखनी सफल परिश्रम समझनी चाहिए। गहमरी जी ने अपने रचनाओ मे पाठकों की रुचि का विशेष ध्यान रखते थे कि वे किस तरह की सामग्री पसंद करते थे। साहित्य के सन्दर्भ में उनके विचार भी उच्च कोटि के थे। वे साहित्य को भी इतिहास मानते थे उनका मानना था कि साहित्य को जिस युग में रचा जाता है उसके साथ उसका गहरा संबंध होता है। वे उपन्यास को अपने समय का इतिहास मानते थे गुप्तचर बेकसूर की फांसी, केतकी की शादी, हम हवालात मे तीन जासूस, चक्करदार खून ठन ठन गोपाल, गेरुआ बाबा मरे हुए कि मौत आदि रचनाओं में केवल रहस्य रोमांच ही नहीं है ब्लकि युग की संगतिया और विसंगतिया भी मौजूद है। समाज की दशा और दिशा का आकलन भी है यह कहकर की जासूसी और मनोरंजक रचनाये है उनकी रचनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता है न उनके योगदानों से मुंह मोड़ा जा सकता है। गहमरी जी की बाद की पीढ़ी को जो लोकप्रियता मिली उसका बहुत कुछ श्रेय देवकी नंदन खत्री और गहमरी जी को जाता है। इन्होंने अपने लेखन से वह स्थितियां बना दी थी कि लोगों का पढने की ओर रुझान बढ़ गया था। गहमरी जी ने अकेले सैकड़ों कहानिया उपन्यासों के अनुवाद किए।

यह भी एक विचित्र संयोग है कि तिलिस्मी साहित्य के साथ साथ जासूसी की भी अचानक बाढ़ आ गई और भी पाठकों ने सराहा और अपनाया हिंदी में जासूसी उपन्यासों के प्रणेता गोपाल राम गहमरी हैं।


देवकी नंदन की चंद्रकांता (1892) और नरेंद्र मोहिनी (1893) के थोड़े अन्तराल बाद अद्भुत लाश(1896) गुप्तचर (1899)के साथ गहमरी भी उदित हुए। 

इन जासूसी उपन्यासों की बढ़ती लोकप्रियता से प्रेरित होकर गहमरी ने प्रभूत मात्रा में साहित्य रचा जासूसी साहित्य के प्रभाव से समकालीन हिन्दी लेखक भी अपने को विरत न रख सके और इसी अवधि में ऐसी अनेकानेक रचनाये सामने आई। यथा रुद्रदत्त शर्मा कृत वर सिंह दरोगा (1900) किशोरी लाल गोस्वामी कृत जिन्दे की लाश (1906) जयराम सिंह कृत लंगड़ा खूनी (1908) जंग बहादुर सिंह कृत विचित्र खून (1909) शेर सिंह कृत विलक्षण जासूस (1911) चन्द्रशेखर पाठक कृत अमीर अली ठग (1911) शशि बाला (1911)और शिव नारायण द्विवेदी कृत अमर दत्त (1911)आदि। उन्हें गहमरी के समान ख्याति नहीं मिली।


गोपाल राम गहमरी पेशे से पत्रकार थे वे अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने घमरी मे बाल गंगाधर तिलक के पूरे मुकदमे को अपने शब्दों मे दर्ज किया था भिन्न-भिन्न समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में संपादकीय योगदान के कारण उनकी गिनती हिन्दी पत्रकारिता के विकास युग आदि युग मे प्रमुख संपादको में किया जाता है। बाद के दिनों में वे काशी चले आये और बनारस के बेनियाबाग के पास भवन बनाकर वहीं रहने लगे और साथ ही अखबारों और पत्रिकाओं में रोचक संस्मरण लिखते रहे। बनारस में ही, 80 वर्ष की आयु में 20 जून,1946 ई. को उनका देहांत हो गया|


इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के अनुसार बीते कई वर्षो से 'गहमर' में उनके सम्मान में कई साहित्यिक आयोजन किये गए एवं उस दौरान कई "लेखकों एवं साहित्यकारों" को सम्मानित भी किया गया। साथ ही ऐसे आयोजनों के दौरान 'पुस्तक मेले' का भी आयोजन किया गया। 'गहमरी जी' को सम्मानित करते हुए 'गहमर' में उनके नाम पर एक पुस्तकालय भी है ----"गोपाल राम गहमरी पुस्तकालय" | यह पुस्तकालय पूर्ण रूप से अभी भी अस्तित्व में है, लेकिन इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण वहाँ पाठको की गतिविधि बहुत कम हो चुकी है।


बाबू गोपाल राम गहमरी के लिखे हुए मौलिक जासूसी उपन्यास हैं :-

1. बेकसूर की फांसी 

2. सरकती लाश 

3. बेगुनाह का खून 

4. जमुना का खून 

5. डबल जासूस 

6. खूनी कौन है 

7. मायाविनी 

8. लड़की की चोरी 

9. जादूगरनी मनोरमा 

10. थाना की चोरी 

11. भयंकर चोरी 

12. जासूस की भूल 

13. अंधे की आँख 

14. जासूस की चोरी 

15. जाल राजा 

16. मालगोदाम में चोरी 

17. डाके पर डाका 

18. डॉक्टर की कहानी 

19. जासूस पर जासूस 

21. जाली काका 

22. देवी सिंह 

23. लड़का गायब 

24. जासूस चक्कर में 

25. खूनी का भेद 

26. भोजपुर की ठगी 

27. बलिहारी बुद्धि 

28. योग महिमा 

29. अजीब लाश 

30. गुप्त भेद 

31. गुप्तचर 

32. गाड़ी में खून 

33. किले में खून 

34. गुप्तभेद 

35. भयंकर चोरी 

36. रूप सन्यासी 

37. लटकती लाश 

38. कोतवाल का खून

39. हम हवालात में 

40. खूनी 

41. ठगों का हाथ 

42. लाश किसकी है 

43. आँखों देखी घटना 

44. मटोपटो 

45. हत्या कृष्णा 

46. अपराधी की चालाकी 

47. सुन्दर वेनी 

48. अपनी राम कहानी 

49. विकट भेद 

50. जासूस की विजय 

51. मुर्दे की जाँच

52. मेम की लाश 

53. जासूस की जवांमर्दी 

54. जासूसी पर 

55. जैसा मुँह वैसा थप्पड़ 

56. सरवर की सुरागरसी 

57. खूनी की चालाकी 

58. चांदी का चक्कर 

59. गुसन लाल दरोगा 

60. भीतर का भेद 

61. धुरंधर जासूस 

62. हमारी डायरी 

63. खूनी की खोज 

64. जासूस की डायरी 

65. जासूस की बुद्धि 

66. कैदी की करामात 

67. देवी नहीं दानवी 

68. सोहनी गायब 

69. डॉक्टर की कहानी 

70. केश बाई 

71. केतकी की शादी 

72. नीमा 

73. अर्थ का अनर्थ 

74. मरे हुए की मौत 

75. देखी हुई घटना 

76. जासूस जगन्नाथ 

77.भयंकर चोरी 

78. नगद नारायण 

79. डकैत कालूराम 

80. भयंकर भेद 

81. स्वयंवरा 

82. भंडाफोड़ 

83. रहस्य विप्लव 

84. होली का हरझोग 

85. जमींदारों का जुल्म...इत्यादि 🙏


✍️ आशुतोष मिश्रा