उपन्यास: पहरेदार
लेखक: अनिल मोहन
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
पेज संख्या:240
अनिल मोहन द्वारा लिखित उपन्यास 'पहरेदार' एक ऐसा उपन्यास है जिसमे दो अलग-अलग कहानियाँ है जो कि देवराज चौहान के कारण एक बार आपस में मिलती हैं और फिर अलग-अलग हो जाती हैं।
यहां पर विशेष बात ये है कि मुख्य कहानी जो कि एक इंस्पेक्टर सूरज यादव पर केन्द्रित है, वो तो इसी उपन्यास में संपूर्ण हो जाती है परंतु देवराज चौहान वाली कहानी अधूरी ही रह जाती है।
उपन्यास से लिया गया एक अंश:
* गृहमंत्री जी ने इंटरकॉम पर अपने सिक्योरिटी चीफ इंस्पेक्टर सूरज यादव को बुलाया।
इंस्पेक्टर सूरज यादव दिल्ली पुलिस का होनहार, बेहद सख्त और अपने फर्ज को जान पर भी खेलकर अंजाम देने वालों में से था। सूरज यादव की काबलियत को पहचानने पर ही, उसका रिकॉर्ड देखने के पश्चात ही गृहमंत्री जी ने उसे अपनी सेवा में लिया था। उनकी सुरक्षा में ढेर सारे खतरनाक कमांडोज थे। लेकिन गृहमंत्री जी को इंस्पेक्टर सूरज यादव पर पूरा भरोसा था। *
'पहरेदार' एक ऐसे जाबांज इंस्पेक्टर की कहानी है जो सत्य के लिए गृहमंत्री तक को गोली मारने से पीछे नहीं हटता। CBI का एक एजेंट सूरज यादव उन लोगों की तलाश में है जो भारत की आंतरिक सुरक्षा से जुङी महत्वपूर्ण फाइलें अन्य देशों तक पहुंचाते हैं।
इसी सिलसिले में जांच करते हुए सूरज यादव देश के गृहमंत्री से भी जा टकराता है। सूरज यादव की जिंदगी का यही निर्णय, गृहमंत्री से टकराना, उसके जीवन में तूफान खड़ा कर देता है। सूरज यादव गृहमंत्री पर इल्जाम तो लगा देता है पर उसे सही साबित नहीं कर पाता। इस चक्कर में उसकी नौकरी पर भी तलवार लटक जाती है । दूसरी तरफ गृहमंत्री से छीने गये महत्वपूर्ण कागजात भी सूरज डकैती मास्टर देवराज चौहान को गलतफहमी में सौंप देता है।
यही से ये कहानी एक नया मोड़ ले लेती है और सूरज यादव के मित्र इंस्पेक्टर मेहता की जान भी चली जाती है। अपने मित्र की मौत का बदला लेने के लिए, स्वयं को बेगुनाह साबित करने के लिए और असली मुजरिम को सामने लाने के लिए सूरज यादव जा टकराता है कानून के दुश्मनों से!!
द्वितीय कहानी है देवराज चौहान द्वारा एक गोल्ड वाॅल्ट को लूटने की लेकिन यह कहानी इस उपन्यास में पूर्ण ही नहीं होती। उपन्यास में इस कहानी का सिर्फ कुछ आधार ही बताया गया है।
"एक वजह से गोल्ड वाॅल्ट में आज तक डकैती करने की किसी की हिम्मत नहीं हुयी और वह वजह थी बीस फीट की गैलरी। सारी सुरक्षा व्यवस्था तोङकर अगर गोल्ड वाॅल्ट के भीतर पहुंच भी जाया जाए तो बीस फीट की गैलरी रूपी मौत के रास्ते को पार करके वाल्ट के उस दरवाजे तक नहीं पहुंचा जा सकता, जिसके पास करोड़ों अरबों की दौलत मौजूद है।"
क्या इंस्पेक्टर सूरज यादव अपनी नौकरी को बचा सका?
क्या सूरज यादव को वो कागजात देवराज चौहान से हासिल हो सके?
आखिर इस षड्यंत्र के पीछे कौन था जो देश के महत्वपूर्ण कागजात गद्दारों को दे रहा था?
क्या देवराज चौहान ने उन कागजातो का फायदा उठाया या उन्हे सही हाथो में पहुंचाया?
इन सभी सवालों के आपको जवाब मिलेंगे पहरेदार उपन्यास को पढ़ कर..
उपन्यास में एक जासूस की जिंदगी को लेकर बहुत अच्छी बात कही गई है -
"हम लोग जिस धंधे में हैं, उसमें तभी तक जिंदगी बची रह सकती है जब तक मन की बात मन में रहे। सीक्रेट एजेंट उस वक्त तलवार की धार पर आ बैठता है जब उसकी मूवमेंट की खबर दुश्मनों को मिलने लगती है।"
उपन्यास में अगर गलतियों की बात करें तो बहुत ज्यादा गलतियाँ नजर आती है जो कि एक अच्छी-खासी कहानी को भी खराब कर देती है:
1. इस उपन्यास को जबरन देवराज चौहान सीरीज का उपन्यास बनाने की कोशिश की गयी है। जबकि इसे सिर्फ थ्रिलर के तौर पर प्रस्तुत किया जाता तो भी बढ़िया था।
2. उपन्यास में दो कहानियाँ हैं - मुख्य कहानी सूरज यादव की व दूसरी कहानी देवराज चौहान की। सूरज यादव की कहानी इस उपन्यास में खत्म हो जाती है, वहीं देवराज चौहान की कहानी अधूरी रह जाती है।
3. उपन्यास में खलनायक का किरदार बहुत कम व बहुत कमजोर दिखाया गया है। गृहमंत्री से दुश्मनी करने वाला मात्र एक सामान्य सा व्यक्ति बन कर रह गया।
4. सूरज यादव CBI का एक होनहार एजेंट है, पर वह गृहमंत्री वाले केस में निर्णय ऐसे लेता है जैसे कोई अति उत्साहित नवयुवक हो।
5. अगर ये प्वाइंट बताता हूं तो उपन्यास के बारे में स्पॉइलर होगा जो की नही होना चाहिए। अगर आप उपन्यास को पढ़ते हैं तो अंत के क्लाइमेक्स में आप उसे देख सकते है।
अनिल मोहन के पहरेदार उपन्यास का द्वितीय भाग सुलग उठा बारूद है, लेकिन दोनों उपन्यासों का मुझे आपस में कोई तालमेल नजर नहीं आता।
जहां पहरेदार में सूरज यादव की कहानी खत्म हो जाती है वहीं देवराज चौहान की कहानी सुलग उठा बारूद में समाप्त होती है। सुलग उठा बारूद उपन्यास अभी तक अप्रकाशित है। जिसके बारे में आपको अगली पोस्ट में सूचित कर देंगे।
उपरोक्त लिखित गलतियों को नजरअंदाज करते हुए अगर समग्र दृष्टि से देखे तो कहानी के स्तर पर प्रस्तुत उपन्यास बहुत रोचक है। रोचकता भी ऐसी कि पाठक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता। यहाँ तक कि देवराज चौहान के आगमन से उपन्यास में रोचकता और भी बढ जाती है।
अनिल मोहन व देवराज चौहान के प्रशंसकों के लिए यह एक पठनीय उपन्यास है।
रेटिंग: 7/10
रोचक। पुस्तक के प्रति उत्सुकता जगाता आलेख।
जवाब देंहटाएंअनिलमोहन जी के अन्य उपन्यासों की तरह बहुत ही रोचक उपन्यास है। आपने काफी अच्छे पॉइंट्स बताये है। काफी अछि समीक्षा की है आपने। सुलग उठा बारूद का इंतजार रहेगा।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन उपन्यास, बेहतरीन समीक्षा,देवराज के नावेल की बात ही अलग है,
जवाब देंहटाएंबहुत रोचक समीक्षा लिखते हो भाई, पढ़ने के बाद लगता है की अब ये नावेल पढ़ ही लेना चाहिए पर तुरन्त किताब का न मिल पाना बड़ा अफसोस दिलाता है।
जवाब देंहटाएंsahi points diye hain aapne. Inspector sooraj ka role badhia tha or devraj ka role jyada nahi tha is novel me.
जवाब देंहटाएं