लेखक : जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा
श्रेणी : सामाजिक / पारिवारिक
पृष्ठ संख्या : 173
प्रकाशक : राधा पॉकेट बुक्स
उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से लिया गया एक छोटा सा अंश:
प्रत्येक सांझ की भांति आज प्रभा के चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान नही थी।
आज वह पूरी तरह गंभीर थी।
मुस्कुराते हुए मोहन ने कहा - "एक शेर सुनाना चाहता हूं - हंसते खेलते महफिल में आए थे 'फिराक'।
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए।"
उपन्यास का आरंभ गुलाब रेस्तरां के दृश्य से होता है जहां प्रेमी युगल मोहन और प्रभा अपनी शादी की तारीख निश्चित होने की खुशी मनाने के लिए मिलते हैं। बातचीत के दौरान मोहन अपनी भाभी पद्म, उनकी सादगी और उनके स्वभाव के बारे में प्रभा को बताता है।
"भाभीजी क्या क्या जानती है, यह तो तुम तभी जानोगी जब इस घर में आ जाओगी। यह सही है कि घर बड़ा था और उसमें रसोई आदि के अतिरिक्त दस कमरे थे। परंतु साठ वर्ष पहले बना हुआ पुराने ढंग का घर था। धीरे-धीरे भाभीजी ने उसे एकदम आधुनिक ढंग का घर बनवा दिया है।"
मोहन अच्छी तनख्वाह पर दिल्ली में सरकारी नौकरी में सिविल इंजीनियर के पद पर कार्यरत है। मोहन के परिवार में उसका बड़ा भाई बलदेव, भाभी पद्म और उनकी छोटी सी बेटी मधु है। बलदेव की पुरानी दिल्ली में फैंसी कपड़ों की बड़ी दुकान है तथा घर पर फैंसी कपड़े बनाने का कारखाना है।
मोहन की होने वाली पत्नी प्रभा एक बेहद संपन्न परिवार से है और बचपन से ही सुख-सुविधाओं में पली-बढ़ी है। प्रभा के परिवार में उसके माता-पिता, बड़ा भाई सुबोध, भाभी माया और उनके बच्चे हैं।
शादी होने के बाद प्रभा मोहन के साथ घर आती है और पद्म प्रेमपूर्वक नई दुल्हन का स्वागत करती है। संपन्न परिवार की प्रभा पद्म और बलदेव की संतोषी प्रवृति और उनके सादगी भरे परिवार को देख एक बार तो विस्मित रह जाती है।
रीति-रिवाज के अनुसार प्रभा पहला फेरा लगाने मायके जाती है और उसके बाद नियमित रूप से मायके जाने लगती है। परंतु मायके के हर चक्कर के साथ ही प्रभा के व्यवहार में कुछ बदलाव आने लगता है और शीघ्र ही परिस्थितियां अलग मोड़ लेने लगती हैं।
परंतु क्या हमेशा ही वातावरण शांत रहना था?
कहा जाता है कि जब रेगिस्तान में जबरदस्त आंधी आने को होती है, उससे पूर्व साधारण हवा भी लगभग बंद हो जाती है। अगर कहा जाए कि कुछ ऐसा ही था तो गलत न होगा।
बढ़िया व्यापार होने के बावजूद बलदेव और पद्म संतोष और सादगी भरे जीवन में कैसे प्रसन्न थे?
मायके के हर चक्कर के साथ ही प्रभा के व्यवहार में बदलाव क्यों और कैसे आने लगा?
क्या परिणाम निकला प्रभा के व्यवहार में हो रहे निरंतर बदलाव का?
कैसा था प्रभा का परिवार और कैसे थे उनके विचार?
शादी के बाद क्या बदलाव आया मोहन की जिंदगी में?
बदलती हुई परिस्थितियों का बलदेव और पद्म पर क्या असर पड़ा?
फिर बलदेव और पद्म ने क्या किया?
ऐसे हालात में क्या प्रभा का परिवार कुछ कर पाया?
इन सब प्रश्नों के उत्तर आप इस उपन्यास को पढ़कर ही प्राप्त कर पाएंगे।
पात्रों की बात करें तो इस उपन्यास में प्रभा, मोहन, बलदेव, पद्म, मधु, सुबोध, माया, नरेश कुमार सेन, सकलानी, यासीन, भोला पंडित, अनवर, मेहता, अजीज, थामस, बिशन सिंह, सोराबजी और डॉक्टर चाची जैसे पात्र पढ़ने को मिलेंगे।
पद्म और बलदेव के किरदार बहुत अच्छे बन पड़े हैं। मोहन और प्रभा भी सही लगे। सहायक पात्रों में नरेश कुमार सेन, माया और सोराबजी बढ़िया लगे।
उपन्यास की कहानी अच्छी है और पारिवारिक मूल्यों के महत्त्व को समझाती है। लेखक ने कहानी में भावुकता को सही तथा नियंत्रित रूप से दर्शाया है। उपन्यास की कहानी यह संदेश भी देती है कि चाहे कोई खुद को कितना ही चतुर माने, गलती उससे भी हो ही जाती है। लेखक के संवादों ने कहानी में कसावट बनाए रखी है और पात्रों को मजबूती प्रदान की है।
मनोरंजन की दृष्टि से सामाजिक और पारिवारिक उपन्यास पढ़ने वाले पाठकों को ये उपन्यास बिल्कुल निराश नहीं करेगा।
मुझे उपन्यास के मुखपृष्ठ (कवर) का डिजाइन सही लगा। उपन्यास की प्रिंटिंग गुणवत्ता ठीक है परंतु कहीं-कहीं पर शाब्दिक गलतियां हैं।
इस उपन्यास के अंत में लेखक ने 67 पृष्ठों का एक लघु उपन्यास "एक साथ तीन प्रेत" भी प्रस्तुत किया है। हॉरर और जासूसी श्रेणी का ये उपन्यास भी पठनीय है। इसकी समीक्षा हम अगले पोस्ट में प्रस्तुत करेंगे।
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रेटिंग: 7.5/10
बहुत सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंकाफी समय से कोई सामाजिक उपन्यास पढ़ने की सोच रहा था। आपने भाभी उपन्यास की काफी अछि रचना प्रस्तुत की है। इसी उपन्यास से सामाजिक उपन्यास पढ़ना शुरू करूँगा।
जवाब देंहटाएंरोचक उपन्यास, रोचक समीक्षा।
जवाब देंहटाएंउपन्यास के प्रति उत्सुतकता जगाता आलेख। जल्द ही इसे पढ़ने की कोशिश रहेगी।
जवाब देंहटाएंबढ़िया समीक्षा सुनील भाई, जल्द ही इसको पहली फुरसत में पढ़ता हूं।
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